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व्यवस्था पर सवाल : आखिर एनएसडी के छात्र क्यों हुए आंदोलन को मजबूर, कई सालों से निदेशक के बिना चल रहा संस्थान
Mon, 17 Oct 2022 05:36 PM IST
दुष्यंत शर्मा
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 17 Oct 2022 05:36 PM IST
सार
Delhi News : अगर देश के सबसे बड़े नाट्य विद्यालय में एक बेहद मुश्किल दाखिला प्रक्रिया से गुजर कर आए छात्रों को पहले ही साल झंडा उठाना पड़े और आंदोलन की राह पकड़नी पड़े तो यह वहां की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाता है।
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राषट्रीय नाट्य विद्यालय
- फोटो : NSD
विस्तार
अगर देश के सबसे बड़े नाट्य विद्यालय में एक बेहद मुश्किल दाखिला प्रक्रिया से गुजर कर आए छात्रों को पहले ही साल झंडा उठाना पड़े और आंदोलन की राह पकड़नी पड़े तो यह वहां की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाता है।
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पिछले कई सालों से निदेशक के बगैर चल रहे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में आंदोलन कर रहे छात्र इस बात से परेशान हैं कि उन्हें बार-बार फंड न होने का हवाला दिया जाता है, साथ ही एनएसडी का कोई स्थायी निदेशक तक नहीं है। उनके भीतर की प्रतिभा को निखारने के लिए न तो कोई योजना है, न कार्यक्रम। पूरा का पूरा संस्थान ‘एड हॉक’ आधार पर चल रहा है। केवल छह स्थायी फैकल्टी हैं और बाकी सभी पद खाली हैं।
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दरअसल कोरोना काल के पहले यहां जिस तरह पूरी भव्यता के साथ भारत रंग महोत्सव का आयोजन हुआ, प्रधानमंत्री आए, संस्कृति मंत्री बीच-बीच में तमाम कार्यक्रमों में आते रहे और इस संस्थान को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के वादे हुए, उसके बाद से एनएसडी मंत्रालय के मुख्य आकर्षण का केंद्र रहा। तब निदेशक थे वामन केन्द्रे।
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वामन ने एनएसडी की बेहतरी के लिए बहुत काम किया, तमाम कार्यक्रम किए, लेकिन 2015 में उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रो. सुरेश शर्मा को कार्यकारी निदेशक के तौर पर जिम्मेदारी दे दी गई। सुरेश शर्मा 2018 तक निदेशक रहे, उसके बाद से यहां की अतिरिक्त जिम्मेदारी अस्थाई तौर पर डॉ रमेश चंद्र गौड़ को दे दी गई थी जो मुख्य रूप से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से जुड़े रहे हैं।
... तो अध्यक्ष परेश रावल के पास भी वक्त नहीं
दूसरी तरफ जब एनएसडी के अध्यक्ष परेश रावल को बनाया गया था, तो उन्होंने भी इसकी बेहतरी के लिए बड़े बड़े दावे किए थे, लेकिन छात्रों की तमाम शिकायतों को सुनने का अब उनके पास वक्त नहीं है। जाने माने रंगकर्मी एम के रैना छात्रों के इस आंदोलन के साथ खड़े हैं और एनएसडी को बचाने की बात करते हैं। उन्होंने धरने पर बैठे छात्रों के बीच आकर कहा भी कि इतने बड़े संस्थान की इस सरकार ने जो हालत कर दी है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। केवल 6 पेशेवर शिक्षक हैं, कोई महिला फैकल्टी नहीं है। बगैर निदेशक के चार साल से एनएसडी चल रहा है। मंत्रालय को कम से कम छात्रों की मांगों को गंभीरता से लेना चाहिए।
व्यवस्था पूरी तरह चौपट
छात्रों और कर्मचारियों का कहना है कि यहां स्थायी और पेशेवर निदेशक न होने से पूरी व्यवस्था चौपट हो गई है। यहां के तमाम कार्यक्रम भी मोटे तौर पर आईजीएनसीए ही तय करता है, चूंकि आईडीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी भी रंगमंच से जुड़े रहे हैं, इसलिए गौड़ साहब उनकी मर्जी के बगैर कुछ नहीं करते। इसलिए अब एनएसडी में भी ज्यादातर कार्यक्रम और नाटकों का आयोजन आजादी के अमृत महोत्सव के तहत होता है।
नाटकों के पात्र भी वही होते हैं जो सरकार को पसंद
नाटककार राजेश कुमार कहते हैं कि एनएसडी में अब नया नाटक नहीं खेला जाता, ज्यादातर नाटकों के कंटेंट धर्म और इस सरकार के चिंतन को आगे बढ़ाने वाला होता है, आजादी के अमृत महोत्सव के नाम पर खेले जा रहे नाटकों के पात्र भी वही होते हैं जो इस सरकार को पसंद आते हैं। ऐसे में भला हम एनएसडी से किस तरह के रंगमंच की उम्मीद कर सकते हैं।
- हालांकि मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि एनएसडी के लिए स्थायी निदेशक की प्रक्रिया चल रही है और जल्दी ही वहां कोई न कोई बेहतर निदेशक काम संभाल लेगा।
- छात्रों का कहना है कि निदेशक की नियुक्ति में भेदभाव नहीं होना चाहिए। एक स्वतंत्र व वरिष्ठ रंगकर्मी को इसकी जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।