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दिल्ली HC की टिप्पणी: सामाजिक कलंक के आधार पर सत्य की पड़ताल नहीं रोकी जा सकती, सच जानने का अधिकार सर्वोपरि

Mon, 06 Jul 2026 07:22 AM IST
Digvijay Singh अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Mon, 06 Jul 2026 07:22 AM IST
सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में परिवार अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें एक व्यक्ति और तीन बच्चों का डीएनए परीक्षण कराने का निर्देश दिया गया था। 

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Delhi High Court said that investigation of truth cannot be stopped on basis of social stigma
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में परिवार अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें एक व्यक्ति और तीन बच्चों का डीएनए परीक्षण कराने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि बच्चे का अपने जैविक माता-पिता को जानने का अधिकार वयस्कों की प्रतिष्ठा या सामाजिक कलंक की आशंकाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

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न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि प्रतिष्ठा सत्य के खिलाफ ढाल नहीं बन सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को वयस्कों के फैसलों का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए। जैविक माता-पिता की पहचान बच्चे की पहचान, गरिमा, भरण-पोषण और अन्य कानूनी अधिकारों के निर्धारण के लिए आवश्यक है। 
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मामला उस व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था, जिसने परिवार अदालत के मार्च 2024 के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने उसे और तीन बच्चों का डीएनए परीक्षण कराने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि वह महिला से विवाहित नहीं है और बच्चों का पिता भी नहीं है। उसका तर्क था कि डीएनए जांच से उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित होगी, क्योंकि उसकी कानूनी पत्नी एक सार्वजनिक पद पर कार्यरत है।
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वहीं, महिला की ओर से पेश वकील ने कहा कि भरण-पोषण से जुड़े मामले के निष्पक्ष निपटारे के लिए डीएनए परीक्षण जरूरी है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की असुविधा या प्रतिष्ठा के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। सत्य सामने लाना और बच्चे के अधिकारों की रक्षा करना न्यायालय की प्राथमिक जिम्मेदारी है।


 
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