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हाईकोर्ट ने कहा : राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विशिष्ट लोगों के लिए अस्पतालों में बेड आरक्षित रखने ही होंगे

Sat, 22 May 2021 05:41 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली 
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली  Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 22 May 2021 05:41 AM IST
सार

  • अस्पताल रोगियों को बिस्तर देने में वीआईपी संस्कृति के मामले पर दायर याचिका पर अदालत की टिप्प्णी
  • इस मामले पर अगली सुनवाई 24 मई को

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Delhi High Court said Beds have to be reserved in hospitals for the President, Prime Minister and special people
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे कुछ विशिष्ट लोगों के उपचार के लिए अस्पतालों में बेड आरक्षित रखने ही होंगे। अस्पताल में ऐसे विशिष्ट लोगों के लिए बेड आरक्षित करने को नहीं रोका जा सकता। अदालत ने दिल्ली के अस्पतालों में कोविड-19 रोगियों को खाली बेड का पता लगाने के लिए एक केंद्रीयकृत और पारदर्शी प्रणाली की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

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न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ के समक्ष याची ने कहा राजधानी में अस्पताल रोगियों को बिस्तर देने में वीआईपी संस्कृति को अपना रहे हैं। अदालत ने कहा कि वीआईपी यानी यदि भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को इलाज की जरूरत है तो आपको उनके लिए किसी अस्पताल में बिस्तर आरक्षित रखना होगा। ऐसी श्रेणी होनी चाहिए, आप उन्हें ना नहीं कह सकते।
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याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विवेक सूद ने कहा कि निश्चित रूप से यह श्रेणी होनी चाहिए लेकिन वह केवल आम लोगों में वीआईपी संस्कृति का अनुसरण होने की बात कर रहे हैं। खंडपीठ ने कहा हमने पहले ही हुई सुनवाई में इन पहलुओं पर ध्यान दिया है। अदालत ने कहा कि वे याचिकाकर्ता की चिंताओं को समझती है जो वाजिब हैं। अदालत ने अब इस याचिका को 24 मई को आने वाले कोविड-19 से संबंधित अन्य मामलों के साथ सुनवाई करने का निर्णय किया है।
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दिल्ली निवासी मंजीत सिंह ने अपनी याचिका में कहा कि स्वास्थ्य आपातकाल की मौजूदा स्थिति में बिस्तरों की मांग ज्यादा है और उपलब्धता कम। उन्होंने कहा कोई तरीका होना चाहिए जिससे राजधानी में कोविड-19 के रोगियों को बेड का आवंटन मनमाने और अतर्कसंगत तरीके से नहीं हो। उन्होंने हर व्यक्ति को जीने व समानता का अधिकार है लेकिन अस्पतालों में मनमाने तरीके से मरीजों को बेड प्रदान किए जा रहे है।

व्यक्तिगत उपयोग के लिए ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के आयात पर आईजीएसटी लगाना असांविधानिक

उच्च न्यायालय ने कहा कि  व्यक्तिगत उपयोग के लिए ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के आयात पर आईजीएसटी लगाना असांविधानिक है। अदालत ने 85 वर्षीय बुजुर्ग की सरकार के निर्णय को चुनौती याचिका स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की है। याची ने व्यक्तिगत उपयोग के लिए उपहार के रूप में ऑक्सीजन जनरेटर के आयात पर आईजीएसटी लगाने को चुनौती दी गई थी।

न्यायमूर्ति राजीव शकधर व न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की खंडपीठ ने वित्त मंत्रालय द्वारा एक मई को जारी उस अधिसूचना को रद्द कर दिया जिसमें इस प्रकार के ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के व्यक्ति प्रयोग के लिए आयात व गिफ्ट के रूप में मिलने वाले कंसंट्रेटर पर 12 प्रतिशत आईजीएसटी वसूलने का प्रधावधान किया था।

अदालत ने अपनेर फैसले में कहा कि ऐसे मामले में संबंधित व्यक्ति को यह शपथपत्र देना होगा कि ऑक्सीजन कंसंट्रेटर को व्यक्तिगत उपयोग के लिए आयात किया जा रहा है न कि व्यावसायिक उपयोग के लिए। अदालत का यह फैसला निजी इस्तेमाल के लिए उपहार के रूप में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के आयात पर आईजीएसटी लगाने को चुनौती देने वाली याचिका पर आया है।

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह भी पाया कि मंत्रालय ने हालांकि राज्य सरकार या फिर सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्था द्वारा कंसंट्रेटर आयात पर शुल्क में छूट का प्रावधान किया गया है जो 30 जून तक प्रभावित है।

याची ने तर्क रखा था कि उसे कोविड है और यूएस से उसके भतीजे ने इलाज के लिए बतौर गिफ्ट कंसंट्रेटर भेजा था लेकिन उससे आयात शुल्क मांगा जा रहा है जो असंवैधानिक है। यह उसके जीने के अधिकार का हनन है।

एचआरसीटी टेस्ट की दरें तय करने के लिए याचिका दायर

कोविड-19 लक्षणों वाले रोगियों के लिए राजधानी में हाई रेशोलेशन कंप्यूटरीकृत टोमोग्राफी (एचआरसीटी) परीक्षण,स्कैन की दरों को तय करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। अदालत ने याचिका पर 31 मई तय की है।

दरअसल याचिका मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल की अध्यक्षता वाली समक्ष के समक्ष सुनवाई के लिए आई लेकिन उनके अवकाश पर होने के कारण सुनवाई 31 मई तय की गई है। हालही में इस मुद्दे पर एक अन्य खंडपीठ भी दिल्ली सरकार से जवाब मांग चुकी है।

याचिकाकर्ता शिवलीन पसरीचा ने अधिवक्ता अमरेश आनंद के माध्यम से उायर याचिका में कहा कि वर्तमान में दिल्ली  में एचआरसीटी की कीमत अनियमित है और इसकी दरें पांच से साढ़े छह हजार रुपये के बीच है। यह आम व्यक्ति की भुगतान क्षमता से बाहर है। उन्होंने कहा कि एचआरसीटी/सीटी स्कैन/टेस्ट की कीमत को महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रदेश की राज्य सरकारों ने पहले ही बहुत कम कीमत पर तय किया हुआ है जबकि दिल्ली के अस्पताल में ज्यादा कीमत वसूली जा रही है।

याची ने कहा वर्तमान कोविड-19 लहर में कई मामलों में जहां आरटी पीसीआर जांच रिपोर्ट नकारात्मक आ रही हैं वहीं कई रोगियों का एचआरसीटी जांच के बाद कोविड -19 के साथ का ईलाज किया जा रहा है। ऐेसे में वर्तमान परिदृश्य में एचआरसीटी कोविड-19 रोगियों के ईलाज, प्रबंधन और उपचार के लिए बहुत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो गया है।

याची ने कहा कि एचआरसीटी न केवल फेफड़ों में वायरस की मौजूदगी का पता लगाता है बल्कि संक्रमण की गंभीरता को भी दर्शाता है। एचआरसीटी रिपोर्ट में मुख्य रूप से दो निष्कर्ष दिए गए हैं-एक सह-रेड स्कोर (कोविड-19 संक्रमण के संदेह का स्तर) और एक चक्र सीमा (सीटी) मूल्य स्कोर, जो रोग/संक्रमण की गंभीरता और विशिष्टता को निर्धारित करता है। याची ने कहा कि वर्तमान में इन कठिन समय के दौरान लोगों के वित्तीय बोझ को कम करने के लिए दिल्ली सरकार को इस टैस्ट के रेट तय करने का निर्देश दिया जाए।

कालाबाजारी के आरोपी को जमानत

अदालत ने कोविड ईलाज में सहायक रेमडीविसिर इंजेक्शन की कालाबाजारी के आरोप में गिरफ्तार अश्विनी नाम के व्यक्ति को जमानत प्रदान कर दी। अदालत ने कहा कि आरोपी की पत्नी भी कोविड से पीड़ित है ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इंजेक्शन उसके लिए हो।

डयूटी मजिस्ट्रेट पी.भार्गव राय ने बचाव पक्ष के अधिवक्ता कार्तिक डबास के उस तर्क पर सहमति जताई कि उनके मुवक्किल के पास से रेमडीसिविर की एक शीशी बरामद हुई थी और वह अपनी पत्नी के इलाज के लिए लेकर जा रहा था। अदालत ने आरोपी को 15 हजार रुपये के निजी मुचलके व एक अन्य जमानती के आधार पर रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि वह पुन: इस तरह के अपराध में शामिल नहीं होगा व अदालत की हर सुनवाई के शामिल होगा।

बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने आरोपी के माता-पिता की मेडीकल रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि पुलिस ने उनके मुवक्किल को फर्जी मामले में फंसाया है और उससे कोई बरामदगी नहीं करनी। उन्होंने कहा कि बिना कारण पुलिस ने पत्नी के ईलाज के लिए खरीदी दवा को कालाबाजारी का मामला बना दिया। वहीं अभियोजन पक्ष ने कहा कि गंभीर आरोप है ऐसे में जमानत न दी जाए।
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