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दिल्ली: 2008 सीरियल बम ब्लास्ट के आरोपी को मिली जमानत, विचाराधीन कैदी के रूप में काट चुका है 12 साल से अधिक समय
Wed, 06 Oct 2021 05:36 PM IST
प्राची प्रियम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: प्राची प्रियम
Updated Wed, 06 Oct 2021 05:36 PM IST
सार
अदालत ने आरोपी को 25 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि वह साढ़े 12 साल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रह चुका है।
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दिल्ली हाईकोर्ट
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
कानूनी अथवा सांविधानिक अधिकारों खत्म होने के बाद मृत्यु समीक्षक के बजाय उन्हें जिंदा रखने के लिए अदालतों को डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए। हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी सीरियल बम धमाकों के मामले में 12 साल से जेल में बंद आरोपी को जमानत प्रदान करते हुए की। याची को 2008 के सीरियल बम धमाकों के मामले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल एवं न्यायमूर्ति अनूप जे भंभानी की खंडपीठ ने कहा याची मोहम्मद हाकिम कथित रूप से बम बनाने के लिए लखनऊ से साइकिल के बॉल बियरिंग लेकर आया था। इनका इस्तेमाल दिल्ली में सीरियल बम धमाकों के लिए किया जाना था। इसके मद्देनजर अगर उसे जमानत पर रिहा नहीं किया जाता है तो त्वरित सुनवाई के उसके अधिकार का उल्लंघन होगा और वह बेकार हो जाएगा।
मामले में आरोपी फरवरी 2009 से हिरासत में था। उसकी जमानत याचिका निचली अदालत ने खारिज कर दी थी। इस आदेश को उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। उसके खिलाफ अवैध गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), भारतीय दंड संहिता, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोप हैं।
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खंडपीठ ने कहा कि अगर मान लिया जाए कि याची को मुकदमे की सुनवाई के बाद आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाएगी तो भी उसने सजा की आधी से ज्यादा अवधि पूरी कर ली है। याची 12 साल से हिरासत में है, 256 गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं और अभी 60 गवाहों के बयान दर्ज होने हैं। मुकदमे की सुनवाई में कितना समय लगेगा उसे फिलहाल छोड़ भी दिया जाए तो याची द्वारा विचाराधीन कैदी के रूप में 12 साल की हिरासत तंत्र को ये बताने के लिए पर्याप्त है कि त्वरित सुनवाई के उसके अधिकार का लगातार उल्लंघन हो रहा है।
'अदालतों को मृत्यु परीक्षक के तौर पर कार्य नहीं करना चाहिए'
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों को कानूनी और सांविधानिक अधिकारों के खत्म होने के बाद मृत्यु परीक्षक के तौर पर कार्य नहीं करना चाहिए। इसके बजाय हमें उन अधिकारों को जिंदा रखने के लिए डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए। इन अधिकारों को दफन होने से बचाने के लिए अदालतों को कदम बढ़ाना चाहिए। जब कानूनी और सांविधानिक अधिकारों की रक्षा की बात हो तो अदालतों को सजग रहना और प्रहरी की तरह कार्य करना चाहिए।
खंडपीठ ने उस तर्क को खारिज कर दिया कि याची को मौत की सजा सुनाई जा सकती है। अदालत ने कहा मृत्युदंड दुर्लभ मामलों में दिया जाता है और इसे स्वाभाविक सजा नहीं मान सकते।
अदालत ने याची को 25 हजार रुपये निजी और इतनी ही राशि के दो जमानती पेश करने शर्त पर रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि आरोपी अपना पासपोर्ट जमा करेगा, बिना अनुमति विदेश नहीं जाएगा और अपने मोबाइल नंबर को चालू रखेगा, गवाहों से संपर्क नहीं करेगा और साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेगा।
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न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल एवं न्यायमूर्ति अनूप जे भंभानी की खंडपीठ ने कहा याची मोहम्मद हाकिम कथित रूप से बम बनाने के लिए लखनऊ से साइकिल के बॉल बियरिंग लेकर आया था। इनका इस्तेमाल दिल्ली में सीरियल बम धमाकों के लिए किया जाना था। इसके मद्देनजर अगर उसे जमानत पर रिहा नहीं किया जाता है तो त्वरित सुनवाई के उसके अधिकार का उल्लंघन होगा और वह बेकार हो जाएगा।
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मामले में आरोपी फरवरी 2009 से हिरासत में था। उसकी जमानत याचिका निचली अदालत ने खारिज कर दी थी। इस आदेश को उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। उसके खिलाफ अवैध गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), भारतीय दंड संहिता, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोप हैं।
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खंडपीठ ने कहा कि अगर मान लिया जाए कि याची को मुकदमे की सुनवाई के बाद आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाएगी तो भी उसने सजा की आधी से ज्यादा अवधि पूरी कर ली है। याची 12 साल से हिरासत में है, 256 गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं और अभी 60 गवाहों के बयान दर्ज होने हैं। मुकदमे की सुनवाई में कितना समय लगेगा उसे फिलहाल छोड़ भी दिया जाए तो याची द्वारा विचाराधीन कैदी के रूप में 12 साल की हिरासत तंत्र को ये बताने के लिए पर्याप्त है कि त्वरित सुनवाई के उसके अधिकार का लगातार उल्लंघन हो रहा है।
'अदालतों को मृत्यु परीक्षक के तौर पर कार्य नहीं करना चाहिए'
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों को कानूनी और सांविधानिक अधिकारों के खत्म होने के बाद मृत्यु परीक्षक के तौर पर कार्य नहीं करना चाहिए। इसके बजाय हमें उन अधिकारों को जिंदा रखने के लिए डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए। इन अधिकारों को दफन होने से बचाने के लिए अदालतों को कदम बढ़ाना चाहिए। जब कानूनी और सांविधानिक अधिकारों की रक्षा की बात हो तो अदालतों को सजग रहना और प्रहरी की तरह कार्य करना चाहिए।
खंडपीठ ने उस तर्क को खारिज कर दिया कि याची को मौत की सजा सुनाई जा सकती है। अदालत ने कहा मृत्युदंड दुर्लभ मामलों में दिया जाता है और इसे स्वाभाविक सजा नहीं मान सकते।
अदालत ने याची को 25 हजार रुपये निजी और इतनी ही राशि के दो जमानती पेश करने शर्त पर रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि आरोपी अपना पासपोर्ट जमा करेगा, बिना अनुमति विदेश नहीं जाएगा और अपने मोबाइल नंबर को चालू रखेगा, गवाहों से संपर्क नहीं करेगा और साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेगा।