'आप' के मंच पर सिर्फ एक कुर्सी, पार्टी में क्या संदेश देना चाहते हैं अरविंद केजरीवाल?
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चुनाव के समय नेताओं के इर्द-गिर्द भीड़ बढ़ जाती है। लेकिन रविवार को जब अरविंद केजरीवाल ने जनता के सामने अपने 10 वायदों का ‘गारंटी कार्ड’ पेश किया तब वे मंच पर बिलकुल अकेले थे। गहरे नीले रंग की कवर से सजे पूरे मंच पर सिर्फ एक कुर्सी लगाई गई थी।
अरविंद केजरीवाल आए, जनता से अपने 10 वादों के गारंटी कार्ड पर हस्ताक्षर कर उसे जारी किया, लगभग 15 मिनट का संक्षिप्त भाषण दिया और चले गए।
ठीक उसी समय पार्टी के राउज एवेन्यू स्थित कार्यालय में आम आदमी पार्टी के कई ऐसे नेता मौजूद थे, जो उनके साथ रैलियों-प्रेस कांफ्रेंस में हमेशा उनके साथ देखे जाते हैं। लेकिन उनमें से कोई भी अरविंद केजरीवाल के साथ मंच पर मौजूद नहीं था। यह महज इत्तेफाक नहीं था। तो फिर मंच पर अकेले आकर अरविंद केजरीवाल किसे और क्या सन्देश देना चाहते थे?
बड़ी चुनावी सभाओं के अवसरों को छोड़ दें, तो विशेष सभाओं और पार्टी के विशेष कार्यक्रमों के अवसरों पर बहुजन समाज पार्टी नेता की नेता मायावती इस तरह जनता के सामने आती थीं। क्या अरविंद केजरीवाल मायावती के नक्शे कदम पर हैं और क्या अपने निर्माण के महज सात-आठ साल में आम आदमी पार्टी बहुजन समाज पार्टी होने की राह पर है?
आम आदमी पार्टी के मंच का गहरे नीले रंग से ढका होना और अपने नामांकन से पहले अरविंद केजरीवाल का रविदास मंदिर का दर्शन करना कतई बेवजह नहीं है। उत्तर प्रदेश में मायावती की राजनीति का आधार मुस्लिम और दलित वोट बैंक रहा है। दिल्ली में यह वर्ग कांग्रेस का परंपरागत वोटर हुआ करता था।
लेकिन जिस तरह यूपी में दलित वोट बैंक पर बसपा और बिहार में आरजेडी और जेडीयू ने दावा ठोंका है, उसी तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल इन वोटरों की पहली पसंद बनकर उभरे हैं। आम आदमी पार्टी के मंच को नीले रंग में रंग कर और जगह-जगह पर बाबा साहब अंबेडकर की छवि लगाकर केजरीवाल अपने इसी दावे को मजबूत करना चाहते हैं।
अरविंद केजरीवाल के एक विशेष सहयोगी जो हमेशा उनके साथ देखे जाते हैं, रविवार को गारंटी कार्ड लांच होने के अवसर पर कार्यालय में उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि इस चुनाव में वोट देते समय मतदाता केवल अरविंद केजरीवाल की छवि और उनके कामों-वायदों को ध्यान में रखे।
कभी-कभी किसी क्षेत्र का उम्मीदवार किसी वजह से कम लोकप्रिय भी हो सकता है। लेकिन उसके दिमाग में केवल ईमानदार अरविंद केजरीवाल की छवि होगी, तो इस तरह के नुकसान को कम किया जा सकता है।
'अधिनायकवादी’ छवि?
वहीं, अरविंद केजरीवाल की पूर्व साथी रह चुकीं शाजिया इल्मी को इसमें उनकी ‘अधिनायकवादी’ छवि नजर आती है। अब भाजपा का दामन थाम चुकीं शाजिया इल्मी ने कहा कि अरविंद केजरीवाल तानाशाही प्रवृत्ति के हैं। वे अपने सामने किसी दूसरे को न सुनना चाहते हैं और न ही देखना चाहते हैं।
यही कारण है कि हिन्दुस्तान के सबसे बेहतरीन लोग (मेधा पाटकर, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, किरण बेदी, पूर्व जस्टिस हेगड़े, योगेंद्र यादव, अंजली दमानिया, प्रोफेसर आनंद आदि-आदि) जो कभी अन्ना आंदोलन में उनके साथ हुआ करते थे, एक-एक कर साथ छोड़ते गये।
इल्मी का कहना है कि अकेले मंच पर दिखकर अरविंद केजरीवाल पूरी पार्टी के दूसरे नेताओं को ये सन्देश देना चाहते थे कि इस पार्टी पर केवल और केवल उनका कब्जा है। जो उनके खिलाफ आवाज उठाएगा, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। कुमार विश्वास जैसे लोग इस बात के प्रमाण हैं।
पार्टी और देश को नुकसान
अन्ना आंदोलन से ही अरविंद केजरीवाल के साथ रहे उनके एक अन्य पूर्व वरिष्ठ सहयोगी ने कहा कि केजरीवाल खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। ठीक उसी तरह जैसे नरेंद्र मोदी ने खुद को भाजपा में स्थापित कर लिया है। उन्होंने कहा कि इसका दुष्परिणाम होता है कि जब पार्टी में कुछ गलत होने लगता है, तो कोई उसके विरोध में आवाज नहीं उठा पाता।
यह व्यवस्था मोदी या केजरीवाल को तो पसंद आती है, लेकिन इसका बड़ा खामियाजा पार्टी को और अंततः देश को उठाना पड़ता है। इससे पार्टी में नेताओं की दूसरी पौध विकसित नहीं होती। ऐसी पार्टी का हाल देर-सबेर बहुजन समाज पार्टी की तरह हो जाता है, जिसके पास जनता को दिखाने के लिए या देने के लिए कुछ नया नहीं होता और वह अपना लोकप्रिय जनाधार खो देता है।
एक प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक की तरह काम कर चुके इस नेता के मुताबिक यह असर प्रशांत किशोर जैसे लोगों का भी हो सकता है, जिन्होंने 2014 के चुनाव में भाजपा का चुनाव प्रबंधन संभाला और मोदी को एक ब्रांड की तरह स्थापित करने की रणनीति पर काम किया। अब प्रशांत किशोर की कंपनी ने आम आदमी पार्टी के चुनाव प्रचार का जिम्मा संभाल लिया है, वही रणनीति यहां भी दिखाई पड़ रही है।