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पत्नी की जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता पति, उठानी होगी पत्नी के भरणपोषण की जिम्मेदारी- अदालत
Sun, 28 Mar 2021 05:48 PM IST
पूजा त्रिपाठी
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: पूजा त्रिपाठी
Updated Sun, 28 Mar 2021 05:48 PM IST
सार
- गुजारे भत्ते के खिलाफ पति की अपील खारिज
- पत्नी को प्रतिभा बर्बाद करने की अपेक्षा नौकरी तलाशने की कोशिश करनी चाहिए
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
विस्तार
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह पति का सामाजिक और वैध कर्तव्य है कि वह अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी को गुजारे के लिए उचित गुजाराभत्ता दे। अदालत ने कहा कि वह अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। अदालत ने उक्त टिप्पणी करते हुए अलग रह रही पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण देने के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।
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प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश स्वर्णकार कांता शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी को भी नौकरी तलाशने की कोशिश करनी चाहिए और योग्य होने के बाद से घर पर बेकार बैठी अपनी प्रतिभा को बर्बाद नहीं करना चाहिए। अदालत ने याची पति को अपनी पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में 20,000 रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया है।
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अदालत ने अपने आदेश में कहा तय कानून के अनुसार अपीलकर्ता (पति) अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के स्तर को बनाए रखने के लिए पति के रूप में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता, जो उसकी पत्नी के प्रति उसका सामाजिक और वैध कर्तव्य है। कानूनन पत्नी भी उसी जीवन स्तर की हकदार है जैसा कि उसका पति रह रहा है।
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सुनवाई के दौरान पति की और से पेश अधिवक्ता ने तर्क रखा कि उनके मुवक्किल की पत्नी अपनी इच्छा से अपने मायके गई है और वापस आने से बिना कारण इंकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि उनका मुवक्किल वर्ष 2019 से नौकरी में नहीं है उसने उच्च शिक्षा के लिए नौकरी छोड़ दी है लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उसकी वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखे बिना ही यह आदेश दिया है।
वहीं पत्नी के अधिवक्ता ने कहा कि उनकी मुवक्किला को ससुराल में प्रताड़ित किया जाता था और उसने घरेलु हिंसा के तहत मामला दर्ज करवाया है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने याची के अंतिम वेतन लेने को आधार बना कर फैसला दिया है जबकि उनकी मुवक्किल बेरोजगार है।
अदालत ने कहा कि पति ने माना है कि उसने शिक्षा के लिए पांच लाख रुपये से ज्यादा फीस जमा करवाई है। अदालत ने कहा फीस के लिए उसने भारी राशि जमा करवाई है वहीं दूसरी तरफ बेरोजगार पत्नी को देने के लिए उसके पास पैसे नहीं है।
अदालत ने कहा कि याची की वेतन में से सर्वप्रथम जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है और उसके बाद ही वह तय कर सकता है कि अन्य राशि कहां खर्च करनी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उच्च शिक्षा प्राप्त करना गलत नहीं है लेकिन एक पति के रूप में उसकी पत्नी के प्रति सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी है जिससे वह भाग नहीं सकता। यह अपीलकर्ता का अपना निर्णय था कि अपनी जिम्मेदारी के बारे में जानने के बावजूद उच्च शिक्षा के लिए उसने अपनी नौकरी छोड़ दी।
अदालत ने कहा कि याची की पत्नी अपने भाई के घर रह रही है और वह इस इंतजार में है कि गुजारे भत्ते के लिए कुछ राशि मिल जाए ताकि वह अपने लिए किराए का घर ले सके।