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दिल्ली दंगा: उचित जांच करने में पुलिस की विफलता लोकतंत्र के प्रहरी को ‘पीड़ा’ देगी

Fri, 03 Sep 2021 12:52 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Fri, 03 Sep 2021 12:52 AM IST
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Court pulled Police up once again for callousness in probe
नई दिल्ली। अदालत ने दिल्ली दंगे की जांच में लापरवाही बरतने पर दिल्ली पुलिस को एक बार फिर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा विभाजन के बाद राष्ट्रीय राजधानी में सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों को जब भविष्य में देखा जाएगा, तो उचित जांच करने में पुलिस की विफलता लोकतंत्र के प्रहरी को ‘पीड़ा’ देगा।
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अदालत ने आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम और दो अन्य को मामले में आरोपमुक्त करते हुए यह टिप्पणी की। उन पर फरवरी 2020 में दिल्ली के चांद बाग इलाके में दंगों के दौरान एक दुकान में कथित लूटपाट और तोड़फोड़ करने का आरोप था। उन पर यूएपीए के तहत आरोप लगाया गया था। वर्तमान में शाह आलम न्यायिक हिरासत में हैं। उसके खिलाफ और कई मामले हैं।
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ये जांच टैक्स के पैसे की बर्बादी
कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने कहा कि यह जांच दिखावा करने वाली व बेमन से की गई है। इस तरह से यह आम जनता के टैक्स के रूप में दिए पैसे की बर्बादी है। यह जांच अदालत को दिखाने के लिए की गई है। इस मामले में आरोपियों के घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर कोई सीसीटीवी फुटेज नहीं है।
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अदालत ने कहा इसके अलावा न किसी गवाह के बयान हैं और न षड्यंत्र करने के कोई साक्ष्य हैं। जब कभी इस तरह के दंगे की जांच के बारे में भविष्य में देखा जाएगा तो पता चलेगा कि जांच में कोई वैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल नहीं किया गया।
अदालत ने कहा इस मामले में सिर्फ खानापूर्ति करने के लिए आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया है। किसी भी गवाह के बारे में पता भी नहीं किया गया। जांच में क्षमता का पूरा अभाव दिखता है। न्यायिक प्रक्रिया में इस तरह की जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती। लंबी जांच के बाद पुलिस ने 5 तकनीकी गवाह पेश किए हैं। इनमें जांच अधिकारी व एक सिपाही ने तीन आरोपियों की पहचान की। सिपाही का लंबे समय के बाद बयान दिया जाना यह बताता है कि उसे प्लांट किया गया है। इस मामले में दोषी का पता लगाने के लिए सही जांच नहीं की गई।
जांच में विफलता पीड़ा देगी
जज विनोद यादव ने कहा मैं खुद को यह देखने से रोक नहीं पा रहा हूं कि दिल्ली में विभाजन के बाद के सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों के पन्नों को जब भविष्य में पलटकर देखा जाएगा, तो नवीनतम वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके उचित जांच करने में जांच एजेंसी की विफलता निश्चित रूप से लोकतंत्र के प्रहरी को पीड़ा देगी।

उन्होंने कहा कि इस मामले में ऐसा लगता है कि चश्मदीद गवाहों, वास्तविक आरोपियों और तकनीकी सबूतों का पता लगाने का प्रयास किए बिना ही केवल आरोपपत्र दाखिल करने से ही मामला सुलझा लिया गया। अदालत ने कहा अभियोजन पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश करने में असफल रहा है जिससे आरोपियों पर अपराध साबित हो सके। ऐसे में वे तीनों को मामले से आरोपमुक्त करते हैं।
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