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दिल्ली दंगा: कोर्ट ने नौ आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए, कहा- पुलिस की देरी से केस को खारिज करना न्याय की हत्या होगा

Thu, 14 Oct 2021 04:34 PM IST
अनुराग सक्सेना न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनुराग सक्सेना Updated Thu, 14 Oct 2021 04:34 PM IST
सार

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट ने कहा कि पुलिस द्वारा सरकारी गवाहों के बयान दर्ज कराने में देरी जानबूझकर नहीं हुई और यह सिर्फ परिस्थितियों के कारण हुई, जो दिल्ली के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में दंगों के दौरान और बाद में पैदा हुईं।

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Court frames charges against accused in Delhi riots and says miscarriage of justice to throw out case over delay
दिल्ली हिंसा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली की एक कोर्ट ने फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के मामले में दंगा करने और आगजनी करने के नौ आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए अभियोजन पक्ष के मुकदमे को खारिज करना न्याय की हत्या करना होगा कि गवाहों के बयान देरी से दर्ज किए गए।

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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट ने कहा कि पुलिस द्वारा सरकारी गवाहों के बयान दर्ज कराने में देरी जानबूझकर या अवमानना के तहत नहीं हुई और यह सिर्फ परिस्थितियों के कारण हुई, जो दिल्ली के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में दंगों के दौरान और बाद में पैदा हुईं।
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पुलिस के अनुसार, नौ आरोपी कथित रूप से 25 फरवरी 2020 को अवैध रूप से इकट्ठे होने, करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और लूटने, कई घरों, दुकानों, स्कूलों और वाहनों में आग लगाने की घटनाओं में शामिल थे। पुलिस ने चार सरकारी गवाहों के बयानों के आधार पर यह आरोप लगाए थे।

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न्यायाधीश ने बचाव पक्ष के वकील की उस दलील पर आपत्ति जताई कि गवाह विश्वास के योग्य नहीं हैं और वे तैयार किए गए हैं क्योंकि उनके बयान कथित घटना की तारीख के एक महीने के बाद दर्ज किए गए। न्यायाधीश ने कहा कि दंगों के बाद भी कई दिनों तक भय का माहौल रहा और सरकारी गवाह जांच एजेंसी के सामने अपने बयान दर्ज कराने को लेकर डरे हुए थे।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 11 अक्तूबर को अपने आदेश में कहा कि इन परिस्थितियों को देखते हुए इस चरण में आकर इन वकीलों के बयान पर सिर्फ इसलिए विश्वास नहीं जताना और अभियोजन पक्ष के मुकदमे को खारिज करना न्याय की हत्या करना होगा कि गवाहों के बयान एक महीने के बाद दर्ज कराए गए थे।

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को अवगत कराया कि नौ आरोपियों ने बड़े जनसमूह को भय और आतंकग्रस्त कर समाज में वैमनस्य पैदा किया और उनके काम ना सिर्फ राष्ट्रविरोधी थे बल्कि दिल्ली में कानून के नियमों के खिलाफ भी थे।

बचाव पक्ष ने तर्क रखा कि घटना 25 फरवरी 20 की है लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सीसीटीवी फुटेज इस दिन की नहीं है। हालांकि सरकारी वकील ने कहा कि उनका केस सीसीटीवी वीडियो फुटेज पर आधारित नहीं है बल्कि रिकॉर्ड में दर्ज अन्य सबूतों पर आधारित है। इनमें गवाहों द्वारा आंखों देखी घटना का दर्ज बयान भी है।

अदालत ने सभी तथ्यों को देखने के बाद कहा कि सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा), 148 (दंगे, घातक हथियार से लैस), 149 (गैरकानूनी सभा), 380 (चोरी), 436 (आगजनी), 452 (घर में जबरन घुसने) के तहत प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं।

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