#ladengecoronase : कम होने लगी जांच तो मरीज भी कम, रेलवे का प्रयास और आरडब्ल्यूए की जद्दोजहद
- दो दिन में कोरोना के सैंपल में 30 हजार से ज्यादा की आई कमी
- 70 से 45 हजार पर आई आरटी पीसीआर जांच
विस्तार
देश की राजधानी में तेजी से बढ़ने वाले संक्रमित मरीजों की संख्या अब कम होने लगी है। ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोना की जांच में तेजी से गिरावट हो रही है। बीते दो दिन में कोरोना के सैंपल में 30 हजार से भी ज्यादा की कमी आई है।
बुधवार को स्वास्थ्य विभाग ने जानकारी दी है कि पिछले एक दिन में 78,768 सैंपल की जांच हुई जिनमें से 31.28 फीसदी कोरोना संक्रमित मिले हैं। जबकि इससे ठीक एक दिन पहले मंगलवार को जारी हेल्थ बुलेटिन के अनुसार 86526 सैंपल की जांच में 32.82 फीसदी संक्रमित मिले थे। सोमवार को 90,696 सैंपल की जांच हुई थी जिनमें 26.12 फीसदी संक्रमित मिले थे।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पिछले एक दिन में 24638 नए मामले सामने आए हैं। जबकि 249 मरीजों की मौत हुई है। राहत की बात है कि दिल्ली में पहली बार एक दिन में 24600 मरीजों को डिस्चॉर्ज भी किया गया। हालांकि अस्पतालों से मिली जानकारी के अनुसार भर्ती मरीजों की तीन दिन निगरानी करने के बाद मोडरेट स्थिति वाले मरीजों को घर भेज दिया जा रहा है ताकि वह होम आइसोलेशन में अपना उपचार कर सकें और बिस्तरों की संख्या भी कम न पड़े।
बहरहाल राजधानी में कुल संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 9,30,179 हो चुकी है जिनमें से 8,31,928 मरीज ठीक हुए हैं। वहीं 12,887 मरीजों की मौत हो चुकी है। दिल्ली में मृत्युदर 1.39 फीसदी तक पहुंच चुकी है। हालांकि हर दिन नए मरीजों के बढ़ने से सक्रिय मामले अब 85,364 पहुंच चुके हैं जिनमें से 42768 मरीज अपने घरों में आइसोलेशन में हैं। अस्पतालों की बात करें तो केवल 2426 बिस्तर खाली हैं। 19753 में से 17327 बिस्तर अब तक भर चुके हैं।
70 से 45 हजार पर आई आरटी पीसीआर जांच
दिल्ली में कोरोना की जांच हर दिन कम होती जा रही है। बीते 14 अप्रैल तक दिल्ली में हर दिन 70 हजार से भी अधिक सैंपल की जांच आरटी पीसीआर के जरिए होने लगी थी लेकिन पिछले एक दिन में ही 45088 सैंपल ही जांचें गए। जबकि इससे पहले मंगलवार को 56724 और सोमवार को 68778 तक था।
चार दिन की वेटिंग के चलते जांच हुई कम
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि राजधानी की अधिकांश लैब में जांच की वेटिंग चार दिन तक पहुंच गई है। इसकी वजह से जांच का आंकड़ा कम हुआ है क्योंकि वेटिंग को खत्म करना भी जरूरी है। कई लैब ऐसी हैं जिनकी रिपोर्ट आने में पांच दिन तक का भी वक्त लग रहा है। जबकि कोरोना की दूसरी लहर में जितनी जल्दी रिपोर्ट मिले उतना सबसे जरूरी है क्योंकि शुरूआती दिनों में ही लोगों की तबियत बिगड़ने के कई मामले पता चले हैं।
ऐसे कम हो रही है जांच
दिन कुल जांच आरटीपीसीआर संक्रमण दर
14 अप्रैल 108534 73915 15.92
15 अप्रैल 82569 59401 20.22
16 अप्रैल 98957 64939 19.69
17 अप्रैल 99230 69206 24.56
18 अप्रैल 85620 56015 29.74
19 अप्रैल 90696 56724 26.12
20 अप्रैल 86526 56724 32.82
21 अप्रैल 78768 45088 31.28
(संक्रमण दर के आंकड़ें फीसदी में)
ट्रेनों के 75 कोच में बनाए 1200 बेड्स
दिल्ली में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। अस्पतालों में बेड की कमी की वजह से संक्रमितों को इलाज तक नहीं मिल पा रहा है। बढ़ते संक्रमण केबीच बिस्तरों की कमी को दूर करने के लिए उत्तर रेलवे ने पहल की है। रेलवे ने 75 कोविड केयर आइसोलेशन कोच दो रेलवे स्टेशनों पर तैनात कर दिया है। इसकी खासियत यह भी है कि यहां मरीजों को ऑक्सीजन की सुविधा भी मिलेगी।
पिछले साल की तरह ही शकूरबस्ती रेल शेड में 50 कोच लगाया गया है। इन कोचों में 800 बेड की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इसी तरह आनंद विहार रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर वन पर 25 कोच की व्यवस्था की गई है। जहां पर 400 मरीज के लिए बेड की उपलब्ध सुनिश्चित की गई है। रेलवे का कहना है कि जरूरत के अनुसार कोच की संख्या को और बढ़ाई जा सकती है। आपात व्यवस्था के तहत कोविड केयर कोच की संख्या बढ़ाई जाएगी। दिल्ली सरकार की पहल पर यह व्यवस्था की गई है।
उल्लेखनीय है कि पिछले साल भी कोरोना की पहली लहर थी उस समय भी रेलवे की ओर से इन दोनों स्टेशनों पर इस तरह से रेलवे के कोच को आइसोलेशन बेड की तरह तैयार किया गया था। जहां एक हजार से अधिक कोविड मरीजों का इलाज भी किया गया। हालांकि दिल्ली के अन्य आधा दर्जन से अधिक स्टेशनों पर लगाए गए इस कोच में मरीज नहीं पहुंचे थे, जिसके बाद इस कोच को वहां से हटा लिया गया था।
रेलवे निभा रहा है अपना दायित्व
केंद्रीय रेल मंत्री ने ट्वीट कर कहा कि कोविड महामारी में अपना दायित्व निभाते हुए भारतीय रेल ने शकुरबस्ती व आनंद विहार स्टेशन पर 1200 बेड्स की की व्यवस्था की है। जिन्हें आइसोलेशन या ऑक्सीजन बेड्स की तरह उपयोग किया जा सकेगा।
पिछले दिनों पीयूष गोयल ने बतया था कि देशभर में 3 लाख से ज्यादा आइसोलेशन बेड्स की व्यवस्था रेलवे कर सकता है। रेलवे के 16 जोन में इस प्रकार के 4002 कोच को मांग के अनुसार स्टेशनों पर लगया जा सकेगा।
ऑक्सीजन की सुविधा युक्त है
दिल्ली के स्टेशनों पर लगे आइसोलेशन कोच में ऑक्सीजन की सुविधा भी मिलेगी। जहां एक तरफ दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की भारी किल्लत है तो वहीं रेलवे ने स्टेशनों पर लगाए गए कोविड केयर कोच में ऑक्सीजन सिलिंडर की भी व्यवस्था किया है। हालांकि, ऑक्सीजन खत्म होने पर राज्य सरकार के सहयोग से ही पुन रिफिल कराया जाएगा।
ऑक्सीजन के संकट से जूझ रहे आरडब्ल्यूए कैंप
एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र संबोधन में स्थानीय सोसाइटियों से कोरोना को रोकने में मदद करने की अपील की है। इसके लिए दिल्ली की विभिन्न आरडब्ल्यूए भी तैयार हो गई हैं, लेकिन हर दिशा में ऑक्सीजन की कमी रास्ते का रोड़ा बन रही है। इसके लिए आरडब्ल्यूए संगठन जल्द ही केंद्र से मदद की मांग करने को तैयार हैं।
दरअसल, कुछ दिन पहले उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली की आरडब्ल्यूए से अपने स्तर पर छोटे छोटे कैंप लगाकर कोरोना के मरीजों को आइसोलेट करने कर इलाज करने की अपील की थी। इसको देखते हुए विभिन्न जगहों पर कैंप लगा भी दिए गए हैं, लेकिन अब यहां भी ऑक्सीजन का संकट हो रहा है।
ईस्ट दिल्ली ज्वाइंट आरडब्ल्यूए फेडरेशन के अध्यक्ष बीएस वोहरा ने बताया कि सरकार के आदेश के बाद हमारी तैयारी पूरी है, लेकिन जब बड़े अस्पतालों में ही ऑक्सीजन नहीं पहुंच रहा है तो सोसायटी में इसकी कमी को कैसे पूरा किया जाए। उन्होंने कहा कि आरडब्ल्यूए अपने स्तर पर जगह व वॉलंटियर उपलब्ध करा सकती है, लेकिन स्टॉफ की कमी आरडब्ल्यूए के पास भी है। वोहरा ने बताया कि कैंप में ऑक्सीजन नहीं है, डॉक्टर व नर्स का स्टॉफ पूरा नहीं है। ऐसे में किसी भी मरीज का इलाज करना संभव नहीं है। इससे मरीज की जान और संकट में पड़ सकती है।
उन्होंने मांग करते हुए कहा कि दिल्ली की सभी आरडब्ल्यूए को कैंप के लिए डॉक्टर, नर्स व ऑक्सीजन भी उपलब्ध करानी चाहिए, जिससे इस मुश्किल समय में सरकार पर दबाव कम हो सके। नई दिल्ली के आरडब्ल्यूए संगठन समूह यूनाइटेड रेजिडेंट ज्वाइंट फेडरेशन के अध्यक्ष अतुल गोयल ने कहा कि नए आदेश के बाद काम भी शुरू हो गया है। बेड व जगह का इंतजाम भी कर लिया गया है, लेकिन डॉक्टर व ऑक्सीजन हमारे पास नहीं है।
यही वजह है कि कैंप होते हुए भी मरीजों का सोसायटी में इलाज नहीं हो पा रहा है। इसको देखते हुए मजबूरी में मरीज अस्पतालों का रूख कर रहे हैं और अस्पतालों पर भी दबाव बन रहा है। उन्होंन कहा कि यदि कैंपों को बेहतर संसाधन मिल जाए तो अस्पतालों के दबाव को कम किया जा सकता है।