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दिल्ली दंगा : नौ आरोपियों पर मुकदमा चलाने का निर्देश
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नई दिल्ली। अदालत ने दिल्ली दंगों के एक मामले में नौ अभियुक्तों के खिलाफ दंगों और आगजनी के आरोप तय कर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया है। अदालत ने आम गवाहों के बयान देरी से दर्ज करने पर मामले को इस आधार पर अलग रखना कानून की हत्या करने के समान होगा।
कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंदर भट ने कहा कि पुलिस द्वारा गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी जानबूझकर या समझ कर की गई नहीं है। दंगों के दौरान और बाद में दिल्ली के उत्तर पूर्व क्षेत्र में व्याप्त स्थिति के कारण यह हुआ था।
पुलिस के अनुसार नौ आरोपी कथित तौर पर गैरकानूनी सभा का हिस्सा थे और उन्होंने करोड़ों रुपये की संपत्ति लूटी, बड़ी संख्या में घरों, दुकानों, स्कूलों और वाहनों को जला दिया।
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अदालत ने चार सरकारी गवाहों के बयानों को विश्वसनीय मानते हुए बचाव पक्ष के वकील द्वारा दिए गए तर्क को अपवाद माना कि सार्वजनिक गवाह विश्वसनीय नहीं है। बचाव पक्ष ने कहा गवाहों को तैयार किया गया है क्योंकि कथित घटना की तारीख के एक महीने बाद उनके बयान दर्ज किए गए थे।
आतंक और सदमे का माहौल था
अदालत ने अभियोग तय करते हुए कहा कि इन दंगों के बाद भी कई दिनों तक आतंक और सदमे का माहौल था और आम गवाह घबरा गए और जांच एजेंसी के सामने घटना के संबंध में अपनी गवाही देने में आनाकानी कर रहे थे।
अदालत ने कहा इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस स्तर पर इन गवाहों के बयानों पर अविश्वास करना और अभियोजन पक्ष के मामले को केवल इस कारण से बंद करना न्याय की हत्या करना होगा कि घटना के लगभग एक महीने बाद उनके बयान दर्ज किए गए।
उन्होंने कहा कि इस अदालत की राय में गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी जानबूझकर की गई प्रतीत नहीं होती है। आरोपी केवल इसके आधार पर राहत का दावा नहीं कर सकते।
राष्ट्रविरोधी थी आरोपियों की गतिविधि
दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया कि नौ आरोपियों ने बड़े पैमाने पर जनता को धमकी देकर और आतंकित करके समाज में वैमनस्य पैदा किया। उनकी कार्यवाही न केवल राष्ट्रविरोधी थी बल्कि दिल्ली में कानून के नियमों को भी चुनौती दे रही है।
बचाव पक्ष ने तर्क रखा कि घटना 25 फरवरी 20 की है लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सीसीटीवी फुटेज इस दिन की नहीं है। सरकारी वकील ने कहा मामला सीसीटीवी फुटेज पर आधारित नहीं है बल्कि गवाहों व अन्य ठोस साक्ष्यों पर है।
अदालत ने सभी तथ्यों को देखने के बाद कहा सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा), 148 (दंगे, घातक हथियार से लैस), 149 (गैरकानूनी सभा), 380 (चोरी), 436 (आगजनी), 452 (अनधिकृत प्रवेश) के तहत प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं।
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कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंदर भट ने कहा कि पुलिस द्वारा गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी जानबूझकर या समझ कर की गई नहीं है। दंगों के दौरान और बाद में दिल्ली के उत्तर पूर्व क्षेत्र में व्याप्त स्थिति के कारण यह हुआ था।
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पुलिस के अनुसार नौ आरोपी कथित तौर पर गैरकानूनी सभा का हिस्सा थे और उन्होंने करोड़ों रुपये की संपत्ति लूटी, बड़ी संख्या में घरों, दुकानों, स्कूलों और वाहनों को जला दिया।
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अदालत ने चार सरकारी गवाहों के बयानों को विश्वसनीय मानते हुए बचाव पक्ष के वकील द्वारा दिए गए तर्क को अपवाद माना कि सार्वजनिक गवाह विश्वसनीय नहीं है। बचाव पक्ष ने कहा गवाहों को तैयार किया गया है क्योंकि कथित घटना की तारीख के एक महीने बाद उनके बयान दर्ज किए गए थे।
आतंक और सदमे का माहौल था
अदालत ने अभियोग तय करते हुए कहा कि इन दंगों के बाद भी कई दिनों तक आतंक और सदमे का माहौल था और आम गवाह घबरा गए और जांच एजेंसी के सामने घटना के संबंध में अपनी गवाही देने में आनाकानी कर रहे थे।
अदालत ने कहा इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस स्तर पर इन गवाहों के बयानों पर अविश्वास करना और अभियोजन पक्ष के मामले को केवल इस कारण से बंद करना न्याय की हत्या करना होगा कि घटना के लगभग एक महीने बाद उनके बयान दर्ज किए गए।
उन्होंने कहा कि इस अदालत की राय में गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी जानबूझकर की गई प्रतीत नहीं होती है। आरोपी केवल इसके आधार पर राहत का दावा नहीं कर सकते।
राष्ट्रविरोधी थी आरोपियों की गतिविधि
दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया कि नौ आरोपियों ने बड़े पैमाने पर जनता को धमकी देकर और आतंकित करके समाज में वैमनस्य पैदा किया। उनकी कार्यवाही न केवल राष्ट्रविरोधी थी बल्कि दिल्ली में कानून के नियमों को भी चुनौती दे रही है।
बचाव पक्ष ने तर्क रखा कि घटना 25 फरवरी 20 की है लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सीसीटीवी फुटेज इस दिन की नहीं है। सरकारी वकील ने कहा मामला सीसीटीवी फुटेज पर आधारित नहीं है बल्कि गवाहों व अन्य ठोस साक्ष्यों पर है।
अदालत ने सभी तथ्यों को देखने के बाद कहा सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा), 148 (दंगे, घातक हथियार से लैस), 149 (गैरकानूनी सभा), 380 (चोरी), 436 (आगजनी), 452 (अनधिकृत प्रवेश) के तहत प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं।