Ukraine Crisis : खौफ से निकलकर सरजमीं पर पाया सुकून, घर वापसी पर छात्रों ने कही आपबीती
युद्ध का खौफनाक मंजर, तबाह शहर, आसमान में धुएं का काला गुबार और हर पल जान जाने का खतरा। यूक्रेन में फंसे भारतीय बच्चों ने कई दिन और रातें भयावह माहौल में काटी। लंबे इंतजार के बाद रविवार को आखिर वह घड़ी आ गई, जब उनकी स्वदेश वापसी हुई। घर वापसी पर छात्रों ने बताया कि उनके कानों में अब भी गूंज रही है सायरन की आवाज...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
यूक्रेन के कीव एयरपोर्ट पर रूसी हमले का असर भारतीय बच्चों पर पड़ा। पहले फ्लाइट की बुकिंग के बावजूद संकट से बचने का रास्ता नहीं मिला और बाद में जब ट्रेन, बस या दूसरे परिवहन विकल्पों को अपनाया तो बॉर्डर पर इंतजार और परेशानियां झेलनी पड़ीं। हालांकि छात्र-छात्राओं का कहना है कि यूक्रेन से बाहर निकलने के बाद सरकार और दूतावास की तरफ से किए गए इंतजामों से उन्हें काफी सुकून मिला।
फिरोजपुर की छात्रा प्रकृति ने बताया कि लगातार मिसाइल हमले को देखते हुए उनके हॉस्टल पर लगे किसी उपकरण को उतारने के लिए सुरक्षा कर्मियों ने कई बार आवाजें लगाई। नहीं खुलने पर गेट तोड़ दिया गया, नतीजतन तेज आवाज से सभी खौफजदा हो गए। उसने बताया कि बम धमाके और सायरन की आवाज भारत पहुंचने के बाद भी कानों में गूंज रही है।
प्रकृति के आईजीआई एयरपोर्ट पहुंचने से पहले उनके दादा, दादी, पापा, मम्मी और छोटी बहन अगवानी करने पहुंच गई थीं। जैसे ही प्रकृति पहुंची, हर तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम के नारे लगने लगे। मम्मी कंचन ठाकुर ने बताया कि हॉस्टल गेट के टूटने के बाद बेटी से तीन घंटे तक फोन पर बातचीत नहीं हो रही थी तो उनके लिए एक-एक पल बिताना मुश्किल हो गया था।
लगातार टेलीविजन चैनल के सामने बैठी रहीं। वह बेटी के सुरक्षित पहुंचने पर उससे गले मिलकर रोने लगीं।दादा, दादी भी अपनी बिटिया का देखकर अपने आंसुओं को रोक नहीं सके। दरअसल कीव में लगातार हो रहे धमाकों के बीच अचानक प्रकृति की परिजनों से बातचीत बंद हो गई। करीब तीन घंटे बाद फोन पर उसकी खैरियत की सूचना मिली तो राहत मिली।
कीव में प्रवेश करते ही ट्रेन के नजदीक हुआ धमाका
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारतीय बच्चों का यूक्रेन छोड़कर देश लौटने का सिलसिला जारी है। रविवार को आईजीआई एयरपोर्ट पर पहुंची मथुरा के कोसी कलां की रहने वाली यशिका ने बताया कि वह खारकीव में खारकीव नेशनल मेडिकल विश्वविद्यालय में एमबीबीएस पहले साल की छात्रा हैं।
पिछले साल दिसंबर में डॉक्टर बनने का सपना लिए वह खारकीव चली गईं। पढ़ाई चल ही रही थी कि रूस ने यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए खारकीव समेत अन्य शहरों पर हमला कर दिया। 28 फरवरी को हॉस्टल से रेलवे स्टेशन जाने के लिए निकली। 10 किलोमीटर का सफर तय करने के दौरान हर 200 मीटर की दूरी पर तीन बार बम धमाके हुए और वह खौफ से कांप उठी।
बावजूद इसके वह आगे बढ़ती गई और खारकीव रेलवे स्टेशन पहुंची। खारकीव से ट्रेन पकड़कर कीव के रास्ते लवीव पहुंचना था और वहां से बस के सहारे रोमानिया बॉर्डर। यशिका ने बताया कि ट्रेन में बैठकर घर पर वीडियो कॉल से बात कर घरवालों को जानकारी दे रही थी कि वह सही सलामत ट्रेन में बैठ गई है। थोड़ी दूर चलने पर ट्रेन ने कीव की सीमा में प्रवेश किया, तभी ट्रेन के नजदीक बम धमाका हो गया।
ट्रेन में मौजूद सभी लोगों को शांत रहने के लिए कहा गया। एक बोगी में 100 लोगों के बैठने की जगह पर 250 लोग सफर कर रहे थे। सभी एकदम चुप हो गए, लग रहा था कि बम ट्रेन के अंदर ही फूट गया हो और सब खत्म हो गया। एक घंटे बाद ट्रेन लवीव के लिए चली तब लोगों की जान में जान आई। लवीव पहुंचने के बाद बस से वह रोमानिया बॉर्डर पहुंची।
जान संकट में, फिर भी छोड़ी ट्रेन
ओडिशा के जाजपुर की रहने वाली वर्षा राय खारकीव विश्वविद्यालय में एमबीबीएस पांचवें साल की छात्रा है। वह आठ दोस्तों के समूह में अकेली लड़की थी। वर्षा ने बताया कि वह एक मार्च को बंकर से बाहर निकल बॉर्डर पार करने निकली। हर तरफ बमबारी, सड़क पर उठते काले धुएं, जली हुई गाड़ियों को देखकर डर गए और वापस बंकर में आकर रुक गए। इसके बाद सभी दोस्तों ने हिम्मत बांधी और खारकीव से लवीव के लिए निकल गए।
खारकीव में रेलवे स्टेशन पर भीड़ थी। लड़कियों को पहले जाने देने के कारण लड़कों को रोका जा रहा था। मेरी बारी आई तो मैंने दोस्तों के साथ ही रहने का फैसला किया और ट्रेन छोड़ दी। वर्षा कहती है कि उनकी ट्रेन दोपहर 3:30 बजे की थी, लेकिन रात 9:30 बजे दोबारा दोस्तों के साथ ट्रेन पकड़ी और लवीव के लिए निकल गए। लवीव से पोलैंड बॉर्डर पहुंच कर एम्बेसी की ओर से दिए गए होटल में रुकने के बाद रविवार सुबह आईजीआई एयरपोर्ट पहुंचकर चैन की सांस ली।
पड़ोसी राज्यों से भी लौटने लगे
यूक्रेन संकट के बाद पड़ोसी राज्यों से भी छात्रों का देश वापसी का सिलसिला तेज हो गया है। केंद्र सरकार की ओर से शुरू ऑपरेशन गंगा से अभिभावकों ने राहत की सांस ली है। विमानों से रोजाना सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राओं के पहुंचने से अभिभावकों के चेहरे पर सुकून हैं। पोलैंड, रोमानिया, हंगरी और स्लोवाकिया के बाहर क्रीमिया से भी छात्रों ने भारत की ओर रुख करना शुरू कर दिया है।
रविवार को आईजीआई एयरपोर्ट पर क्रीमिया से लौट रहे छात्रों ने कहा कि हालात फिलहाल तो ठीक हैं। यूक्रेन के मौजूदा हालात को देखते हुए अनिश्चितता बनी हुई हैं। परिजनों ने भी अब यूक्रेन और आसपास के प्रांतों में पढ़ने वाले छात्रों को बुलाना शुरू कर दिया है। अनिकेत, वेेदांत और स्वाति के मुताबिक वहां भी 600-700 से भारतीय छात्र हैं। इस दौरान रूस से भी बच्चों के लौटने का सिलसिला चल रहा है। ब्यूरो
रेस्तरां में टेबलों को किया यात्रियों के लिए आरक्षित
यूक्रेन से लौटने वाले यात्रियों को दिल्ली एयरपोर्ट पर स्थित दुकानदारों व रेस्तरां संचालकों का भी सहयोग मिल रहा है। संकट से जान बचाकर आने वाले यात्रियों के लिए रेस्तरां के एक हिस्से को आरक्षित किया गया है ताकि यात्रियों को भीड़ की वजह से इंतजार नहीं करना पड़ रहा है। खारकीव से लौटे आबिद ने बताया कि वहां खाने-पीने को लेकर बहुत समस्या थी। रेस्तरां में भी हम लोगों के लिए टेबल को आरक्षित करना एक सम्मान की बात है। आकांक्षा शुक्ला ने कहा कि यहां आकर अतिरिक्त सुविधा का मिलना सराहनीय है। रेस्तरां संचालकों के मुताबिक, बच्चे किसी तरह जान बचाकर यूक्रेन से लंबी यात्रा कर भारत पहुंच रहे हैं। ऐसे में इनकी सुविधा का ध्यान रखते हुए उनके लिए रेस्तरां के एक हिस्से को पूरी तरह से आरक्षित किया है।
स्वदेश पहुंची तो मिला सुकून
बम धमाकों की गूंज के बीच से बचकर यूक्रेन से महफूज लौटीं दिल्ली की दो सगी बहनें संकट के वो 10 दिन ताउम्र नहीं भूल सकेंगी। खारकीव में एक बहन मेडिकल जबकि दूसरी एमबीए करने गई थी। पता नहीं था कि हालात इतने बिगड़ जाएंगे कि सुरिक्षत लौटने के लिए इतनी जद्दोजहद का सामना करना पड़ेगा। दोनों बहनों ने रातें रो-रोकर गुजारी। रविवार सुबह आईजीआई एयरपोर्ट के आगमन पर जैसे ही दोनों बहनें पहुंची, परिजनों के आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे।
खारकीव में हालात बिगड़ने के बाद जैनब जमाल और कुल्सुम ने भारत लौटने के लिए कई बार कोशिश की, लेकिन पहुंचने की सुविधा न मिलने की वजह से बृहस्पतिवार को दोनों अकेले ही खारकीव से निकलीं। दो घंटे तक पैदल चलने के बाद मेट्रो स्टेशन पहुंची, लेकिन बॉर्डर तक के लिए ट्रेन न होने की वजह से मेट्रो स्टेशन पर ही रात गुजारी। किसी तरह रोमानिया पहुंचने पर दोनों ने सुकून की सांस ली। पिता सालिम जमाल और मां गजाला बेगम दरियागंज के कूचा ताराचंद में रहते हैं। यूक्रेन में हालात बिगड़ने पर दोनों बहनों ने हॉस्टल के बेसमेंट में रहना शुरू कर दिया। वहां रोजाना एक वक्त का खाना मिल रहा था तो पानी तक की भी दिक्कत हो गई। खौफनाक रातों में न तो नींद आई और न ही चैन था।
जिगर के टुकड़ों के इंतजार में भीगी पलकें
यू्क्रेन से लौटने वाले मेडिकल विद्यार्थियों का दौर जारी है। इस बीच जिगर के टुकड़ों के लिए एयरपोर्ट पर अलसुबह से ही अभिभावकों की कतारें लग रही हैं। बच्चों के इंतजार में उनकी आंखें बह रही है। अपनों को सीने से लगाने की चाहत, एक झलक मिलते ही दौड़कर गले मिलना और सिसक कर रोना। दिल्ली एयरपोर्ट पर ही नजारा सुबह से शाम तक बना हुआ है। बेटी कीर्ति के इंतजार में खड़ी प्रीति रोते हुए कहती हैं कि दिल पर पत्थर रखकर यूक्रेन पढ़ने के लिए भेजा था। पता नहीं था कि इस तरह के संकट का सामना करना पड़ेगा। बीते तीन घंटे से बेटी की झलक पाने को आंखें तरस रही हैं।
एक बार बेटी वापस आ जाए, फिर दोबारा नहीं भेजूंगी। कुछ इसी तरह का दर्द डॉ. संदीप भारद्वाज का भी रहा। उन्होंने कहा कि पढ़ाई की वजह से बेटा चार साल आंखों से दूर रहा। सोचा था कि बेटे को डॉक्टर के रूप में ही देखूंगा, लेकिन रूस और यूक्रेन की लड़ाई से अब यह अरमान देरी से पूरा होगा। बेटे से लगातार बात हो रही है, लेकिन इसके बाद भी मन घबरा रहा है, जब तक वह सीने से नहीं लगता, तब तक दिल को आराम मिलना मुश्किल है। मिठाई लेकर पहुंचे जोगिंदर ने कहा कि बेटी सुरक्षित वापस आ रही है, इससे बढ़कर खुशी की कोई बात नहीं है। यही वजह है कि बेटी के लिए हार व मिठाई लेकर पहुंचा हूं।
11 दिन बाद मुस्कान के चेहरे पर लौटी ‘मुस्कान’
कीव से लवीव तक ट्रेन में 12 घंटे का सफर कभी नहीं भूल सकते... न बैठने की जगह मिली और न ही हमें पता था कि यूक्रेन में लवीव से आगे किसी बॉर्डर के लिए जाना है। कर्फ्यू खत्म होने के बाद पैदल चलकर रेलवे स्टेशन पहुंचे... कीव स्थित एक यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही छात्रा मुुस्कान ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि हंगरी पहुंचने के बाद राहत की सांस ली।
रोहतक निवासी मुुस्कान के चेहरे की मुस्कान 11 दिन बाद आईजीआई एयरपोर्ट पहुंचने पर लौटी। उसने बताया कि कीव में पहले दिन ही एयरपोर्ट बंद कर दिए जाने की वजह से उन्होंने तीन दिन हॉस्टल की बेसमेंट में बने बंकर में गुजारे। हालात बिगड़ने पर कीव रेलवे स्टेशन से रवाना हुए तो कई दोस्त पीछे ही छूट गए। पासपोर्ट और जरूरी दस्तावेज को छोड़कर अन्य सामान स्टेशन पर ही लगेेज बैग में छूट गया।
इसकी फिक्र किए बगैर लवीव पहुंचने के बाद दूसरी ट्रेन से अगले दिन महज 25 मिनट में हंगरी पहुंचीं। शनिवार रात बुडापेस्ट से विमान में रवाना हुईं। सुबह जब आईजीआई एयरपोर्ट पहुंची तो मम्मी, पापा सहित परिजनों को देखकर उसकी खुशियां लौटीं। हंगरी पहुंचने के बाद किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई। इस दौरान दूतावास और केंद्र सरकार की तरफ से सभी इंतजाम किए गए थे।