जानिए, कौन देगा केजरीवाल को टक्कर?
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भाजपा ने बेशक दिल्ली चुनाव के लिए अपने चेहरे का ऐलान नहीं किया है। लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) दावा कर रही है कि सियासी जंग अरविंद केजरीवाल बनाम जगदीश मुखी होगी। आप का कहना है कि भाजपा हार के डर से अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम नहीं बता रही है। क्योंकि इससे पहले के सभी विधानसभा चुनावों में एक चेहरे के सहारे लड़े थे।
केजरीवाल ने गत विस चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को अपने सामने रखा था। रणनीति के तहत उन्होंने उनको घेरा और नई दिल्ली सीट से न सिर्फ मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को करारी शिकस्त दी, बल्कि दूसरे इलाकों में भी बढ़त बनाई। भाजपा को तो आप की इसी रणनीति में फंसकर चेहरा माने जा रहे विजय गोयल को हटाना पड़ा था।
दोबारा इसी रणनीति पर काम करते हुए आप ने चुनाव की सुगबुगाहट होते ही जगदीश मुखी का नाम आगे कर दिया। हालांकि भाजपा ने अभी तक इस बारे में कोई फैसला नहीं किया है। इस मामले में आप की कोशिश भाजपा पर दबाव बनाने की है। पार्टी को इसका फायदा भी दिख रहा है।
कौन देगा केजरी को टक्कर?
दिल्ली प्रदेश भाजपा में अभी आप को केजरीवाल की टक्कर का नेता नहीं दिख रहा है। आप का मानना है कि ऐसे में अगर प्रदेश से किसी का नाम आता है, तो सियासी गेंद उसके पाले में होगी। दूसरी तरफ, अगर भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे चुनाव लड़ती है तो चुनौती बड़ी होगी।
पार्टी नेता आशुतोष के मुताबिक, फिलहाल जगदीश मुखी प्रदेश भाजपा के बड़े नेता हैं। इससे साफ है कि मुकाबला केजरीवाल बनाम मुखी होगा। लेकिन भाजपा ने पहले ही हार मान ली है। इसलिए वह अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री का नाम नहीं बता रही है।
जबकि इससे पहले के चारों विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम घोषित किया था। आशुतोष यह कहना नहीं भूले कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। वह दिल्ली के मुख्यमंत्री थोड़े बनने जा रहे हैं।
सीटों के बारे में अभी कुछ तय नहीं
अरविंद केजरीवाल ने बताया कि अभी तक उम्मीदवारों के नामों की चर्चा पार्टी में नहीं हुई है। दूसरे विधायकों की छोड़िए, अभी यह भी तय नहीं कि वह नई दिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे या नहीं। केजरीवाल के मुताबिक, पार्टी जो भी फैसला करेगी, उसके लिए वह तैयार हैं। हालांकि दबी आवाज में उन्होंने कहा कि ज्यादातर विधायकों ने ऐसा काम नहीं किया है कि उनका टिकट काटा जाए।
मोदी के सहारे पार लगेगी भाजपा की नैया
दिल्ली भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव मोदी के ही दम पर लड़ेगी। हरियाणा व महाराष्ट्र की तरह दिल्ली में भी भाजपा बिना किसी चेहरे के लड़ेगी। यानी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की घोषणा किए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही मैदान में उतरेगी।
उपराज्यपाल नजीब जंग के दिल्ली विधानसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश पर कैबिनेट की मुहर लगने के बाद दिल्ली में पिछले आठ माह से राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल पूरी तरह खत्म हो गया। राष्ट्रपति से मंजूरी मिलते ही चुनाव आयोग दिल्ली में विधानसभा चुनाव की तारीखों के बारे में निर्णय करेगा।
लिहाजा राजनीतिक पार्टियों में भी चुनाव को लेकर सरगर्मी बढ़ी हुई है। भाजपा पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरने की बात तो कर रही है लेकिन वह इस बार मुख्यमंत्री के तौर पर पार्टी की तरफ से किसी को उम्मीदवार बनाने से कतरा रही है।
15 साल से अधूरा है भाजपा का सपना
दरअसल, भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया था। लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डॉ. हर्षवर्धन का नाम देरी से ऐलान करने और इससे उपजी आंतरिक गुटबाजी के कारण 15 साल बाद भी दिल्ली में सरकार बनाने का सपना नहीं पूरा हुआ। पार्टी बहुमत के आंकड़े से महज चार सीट कम हासिल कर सकी।
2008 के चुनाव में भी प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा को बतौर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया गया। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नाम के सामने भाजपा का चेहरा टिक नहीं पाया। लिहाजा पार्टी ने यह तय किया है कि इस बार आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के चेहरे के सामने मोदी को ही खड़ा किया जाए। ताकि मतदाता मोदी के विजन पर मतदान करें।
पार्टी प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने कहा कि मुख्यमंत्री का प्रत्याशी कौन होगा यह कोई मुद्दा नहीं है। पार्टी सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। हमारा चेहरा होगा कमल निशान। चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा आलाकमान तय करेंगे कि दिल्ली का मुख्यमंत्री कौन होगा।
बिना किसी चेहरे के उतरेगी कांग्रेस!
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मुख्यमंत्री घोषित करके किसी चेहरे को मैदान में नहीं उतारेगी। मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसका फैसला चुनाव के बाद विधायक दल की बैठक में तय होगा। तर्क है कि जब-जब बिना मुख्यमंत्री का चेहरा बताए उतरे, बड़ी जीत दर्ज की है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह कहते हैं कि चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री घोषित करने की परंपरा कांग्रेस में नहीं है। चाहे 1998 का चुनाव हुआ या उसके बाद के चुनाव। सबसे अधिक सीटें 1998 में जीती तब कोई घोषित मुख्यमंत्री नहीं था। फिर शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। जिसमें मुख्यमंत्री होने के नाते वह अघोषित चेहरा रहीं।
वह स्वीकारते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते पार्टी मेरी अगुवाई में चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री घोषित करके चुनाव लड़ने वाली भाजपा भी बिना चेहरे के चुनावी मैदान में उतरने की बात कर रही है।
कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि दिसंबर में चुनाव हो तो पार्टी को फायदा मिलेगा। इनका तर्क है कि केजरीवाल के 49 दिन की सरकार में किए गए कार्यों को लोग भूले नहीं हैं। उन्होंने जो वायदे किए थे उसे पूरा नहीं किया। फिर भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाया। इसके बाद भी राजधानी के हालात नहीं सुधरे। ऐसे में चुनाव जितनी जल्दी हो, कांग्रेस के लिए फायदेमंद है।