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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   The same cultural stream flows across the border as well

Delhi NCR News: सरहद के उस पार भी बहती है एक ही सांस्कृतिक धारा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 05 Aug 2026 09:37 PM IST
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टू पोएट्स एंड अ रिवर ने दिखाई साझा विरासत
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। सरहदें जमीन को बांट सकती हैं, लेकिन क्या वे किसी संस्कृति की स्मृतियों, संगीत और कविता को भी बांट सकती हैं। इसी सवाल को केंद्र में रखकर बुधवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉक्यूमेंट्री टू पोएट्स एंड अ रिवर का प्रदर्शन किया गया। रिचर्ड के वुल्फ निर्देशित 75 मिनट की यह फिल्म ताजिकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बहने वाली ऑक्सस नदी के किनारे बसे लोगों की जिंदगी के जरिए प्रेम, विरह, पहचान और साझा सांस्कृतिक विरासत की कहानी कहती है।
फिल्म की खासियत यह है कि इसमें सरहद को केवल राजनीतिक नक्शे की रेखा नहीं माना गया। वाखी भाषा और संगीत-कविता फिल्म की आत्मा बने। कवि-संगीतकार कुरबानशो और दौलतशो की रचनाओं के जरिए यह दिखाया गया कि सीमाएं चाहे जितनी खिंच जाएं, लोगों की स्मृतियों और सांस्कृतिक जुड़ाव की अपनी अलग निरंतरता होती है।
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इस फिल्म को 2022 में पुर्तगाल में इंटरनेशनल काउंसिल फॉर ट्रेडिशनल म्यूजिक का सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री पुरस्कार मिला था और यह 2023 के आरएआई फिल्म फेस्टिवल ब्रिस्टल के आधिकारिक चयन में भी शामिल रही। प्रदर्शन के बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व फिल्मकार रिचर्ड के वुल्फ से संवाद हुआ। कार्यक्रम अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज व सेंटर फॉर आर्ट एंड आर्कियोलॉजी के सहयोग से आयोजित किया गया।
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सरहद के उस पार भी बहती है एक ही सांस्कृतिक धारा -‘टू पोएट्स एंड अ रिवर’


संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। सरहदें जमीन को बांट सकती हैं, लेकिन क्या वे किसी संस्कृति की स्मृतियों, संगीत और कविता को भी बांट सकती हैं..। इसी सवाल को केंद्र में रखकर बुधवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉक्यूमेंट्री ‘टू पोएट्स एंड अ रिवर’ का प्रदर्शन किया गया। फिल्म ने ताजिकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बहने वाली ऑक्सस नदी के किनारे बसे लोगों की जिंदगी के जरिए प्रेम, विरह, पहचान और साझा सांस्कृतिक विरासत की कहानी कही। रिचर्ड के. वुल्फ की निर्देशित 75 मिनट की यह फिल्म वाखी कवि-संगीतकार कुरबानशो और दौलतशो के जीवन और उनकी संगीत-कविता के माध्यम से उस दुनिया में ले जाती है, जहां नदी केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि सदियों की स्मृतियों और संस्कृति की वाहक भी है।



फिल्म की सबसे खास बात यह रही कि इसमें सरहद को केवल राजनीतिक नक्शे की रेखा के रूप में नहीं देखा गया। ऑक्सस नदी के दोनों किनारों पर रहने वाले समुदायों के साझा सांस्कृतिक अनुभव, संगीत और कविता के जरिए यह दिखाया गया कि इतिहास ने भले ही सीमाएं खींच दी हों, लेकिन लोगों की स्मृतियों और सांस्कृतिक जुड़ाव की अपनी अलग निरंतरता होती है। वाखी भाषा और संगीत-कविता फिल्म की आत्मा बने। कुरबानशो और दौलतशो की रचनाओं के जरिए फिल्म ने प्रेम और खोने के दर्द के साथ उस सवाल को भी सामने रखा कि बदलती राजनीतिक सीमाओं के बीच व्यक्ति अपनी पहचान और अपनी जड़ों को किस तरह संभालकर रखता है। फिल्म को 2022 में पुर्तगाल में इंटरनेशनल काउंसिल फॉर ट्रेडिशनल म्यूजिक का सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्म पुरस्कार मिला था। इसके अलावा यह 2023 के आरएआई फिल्म फेस्टिवल ब्रिस्टल के आधिकारिक चयन में भी शामिल रही। प्रदर्शन के बाद फिल्मकार प्रो. रिचर्ड के. वुल्फ, जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संगीत और दक्षिण एशियाई अध्ययन के प्रोफेसर हैं, के साथ संवाद हुआ। चर्चा का संचालन शुभा चौधरी, एसोसिएट डायरेक्टर जनरल (एकेडमिक), आर्काइव्स एंड रिसर्च सेंटर फॉर एथ्नोम्यूजिकोलॉजी, एआईआईएस, गुरुग्राम ने किया। वहीं, कार्यक्रम का आयोजन अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज और सेंटर फॉर आर्ट एंड आर्कियोलॉजी के सहयोग से किया गया।
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