दिल्ली: फ्लैट खाली करने के आदेश पर याचिकाएं दायर कर रहा था किराएदार, न्यायालय ने लगाया 50 हजार रुपये जुर्माना
अदालत ने कहा तथ्यों के विवरण से स्पष्ट है, याचिकाकर्ता के पूरे प्रयास में केवल विभिन्न याचिकाएं और आवेदन दायर करने का प्रयास किया गया है।
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हाईकोर्ट ने एक किराएदार द्वारा पिछले पांच वर्ष से फ्लैट खाली करने के आदेश के बावजूद बिना आधार के बार-बार याचिका दायर करने के रवैये पर गंभीर रुख अपनाते हुए उसकी अपील खारिज करते हुए 50 हजार रुपये जुर्माना लगा दिया। अदालत ने कहा याचिकाकर्ता का आचरण बेईमान और निंदनीय है। यहां तक कि वर्तमान याचिका भी प्रासंगिक और तथ्यों को छिपाकर दायर की गई है।
न्यायमूर्ति अमित बंसल ने विश्वनाथ ओझा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि एक बार अपील में मूल निर्णय और डिक्री को बरकरार रखा गया है और दूसरी अपील भी वापस ले ली गई है। जाहिर है कि पुनर्विचार याचिका दायर करने में याचिकाकर्ता का प्रयास केवल समय हासिल करने और संपत्ति के कब्जे को सौंपने में देरी करने के लिए है।
अदालत ने कहा तथ्यों के विवरण से स्पष्ट है, याचिकाकर्ता के पूरे प्रयास में केवल विभिन्न याचिकाएं और आवेदन दायर करने का प्रयास किया गया है ताकि संपत्ति में गैरकानूनी कब्जा बरकरार रखा जा सके। याचिकाकर्ता का आचरण बेईमान और निंदनीय है। यह कानून की स्थापित स्थिति है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत याचिकाओं पर विचार करते समय न्यायसंगत विचारों को तौलना जरूरी है। ऐसे में वे याची पर 50 हजार रुपये जुर्माना लगाते है।
पेश मामले में सुरेन्द्र सिंह ने 22 जनवरी 2016 को पूर्वी दिल्ली की एक संपत्ति पर अपना मालिकाना हक जताते हुए विश्वनाथ से फ्लैट खाली करवाने के लिए याचिका दायर की। अदालत ने उसके हक में फैसला दिया। इसके बाद ओझा ने इस फैसले के खिलाफ सैशन कोर्ट, हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कई बार फैसलों के पुर्ननिरीक्षण याचिका दायर की। उसकी याचिका कई बार जुर्माने के साथ खारिज हुई। इसके अलावा उसने कब्जा सौंपने की शर्त पर भी याचिका वापस ली। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान दूसरे पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष उक्त आदेश पेश करते हुए कहा कि याची अदालत को लगातार गुमराह कर रहा है।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका में इस आदेश का कोई उल्लेख नहीं है और न ही इसकी प्रति दाखिल की गई है। इस न्यायालय की राय में, इस आदेश को याचिकाकर्ता द्वारा जानबूझकर छुपाया गया है। उक्त आदेश के संदर्भ में याचिकाकर्ता ने इस न्यायालय के समक्ष दायर दूसरी अपील को वापस लेने की स्वतंत्रता के साथ वापस ले लिया। कार्यकारी न्यायालय ने विचाराधीन परिसर को खाली करने के लिए समय मांगा। हालांकि समय मांगने के लिए निष्पादन न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बजाय याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की।