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अध्ययन: बचपन में बार-बार गले के संक्रमण से दिल खतरे में, सांस फूलना सबसे आम लक्षण; न करें अनदेखी
Mon, 26 Oct 2026 06:47 AM IST
दुष्यंत शर्मा
नितिन राजपूत, नई दिल्ली
नितिन राजपूत, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 26 Oct 2026 06:47 AM IST
सार
दिल्ली के दो अस्पतालों में रूमैटिक हार्ट डिजीज (गठिया बुखार से जुड़ी हृदय वॉल्व की बीमारी) से पीड़ित 385 मरीजों के अध्ययन में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Adobe Stock
विस्तार
बचपन में बार-बार गले का संक्रमण, समय पर बीमारी की पहचान न होना और इलाज में देरी आगे चलकर दिल की गंभीर बीमारी का कारण बन सकती है। दिल्ली के दो अस्पतालों में रूमैटिक हार्ट डिजीज (गठिया बुखार से जुड़ी हृदय वॉल्व की बीमारी) से पीड़ित 385 मरीजों के अध्ययन में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। सितंबर 2023 से सितंबर 2025 के बीच लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल और डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती मरीजों के रिकॉर्ड के विश्लेषण में उनकी औसत उम्र महज 31.2 वर्ष रही।
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अध्ययन के अनुसार, अध्ययन में शामिल 82 प्रतिशत मरीजों में फेफड़ों की धमनियों का दबाव गंभीर रूप से बढ़ा हुआ था, जबकि 58 प्रतिशत को एट्रियल फिब्रिलेशन यानी दिल की धड़कन अनियमित होने की समस्या थी। मरीजों में 68 प्रतिशत महिलाएं थीं और 57 प्रतिशत बीमारी की गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचे थे।
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सांस फूलना सबसे आम लक्षण
सांस फूलने की शिकायत 89 प्रतिशत मरीजों में दर्ज की गई। वहीं, 76 प्रतिशत को दिल की धड़कन तेज या अनियमित होने और 67 प्रतिशत को पैरों में सूजन की समस्या थी। करीब 23 प्रतिशत मरीजों ने बेहोशी या ऐसा महसूस होने की शिकायत की। सभी मरीजों के माइट्रल वाॅल्व में गंभीर संकुचन पाया गया। इससे पता चला कि कई मरीजों के हृदय के एक से अधिक वाॅल्व प्रभावित थे।
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छह महीने में 7.2 प्रतिशत मरीजों की मौत
अध्ययन में 23 प्रतिशत मरीजों में अस्पताल से जुड़े संक्रमण पाए गए। इनमें 12 प्रतिशत को एमआरएसए बैक्टीरिया से रक्त संक्रमण हुआ। करीब 23 प्रतिशत मरीजों को आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। अस्पताल में मृत्यु दर 3.4 प्रतिशत रही, जो छह महीने में बढ़कर 7.2 प्रतिशत हो गई। हालांकि, छह महीने का फॉलोअप केवल 67 प्रतिशत मरीजों का उपलब्ध था। अस्पताल से छुट्टी मिलने तक 78 प्रतिशत मरीजों की कार्यक्षमता में सुधार हुआ और 89 प्रतिशत की स्थिति स्थिर रही।