51 माइक्रॉन की पॉलीथिन 5 से 7 रुपये में बेच रहे दुकानदार, सिक्योरिटी देकर लिए जा रहे थैले
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अब शहर में कई विक्रेताओं के पास 50 माइक्रॉन से ज्यादा की पॉलीथिन देखने को मिल रही है। इन पर सरकारी मुहर भी लगी है। हालांकि, अचानक प्रतिबंध के चलते दुकानदारों के लिए इनका खरीद-फरोख्त महंगा साबित हो रहा है। दरअसल, 50 माइक्रॉन से ज्यादा की पॉलीथिन दिल्ली में बहुत कम फैक्ट्रियां ही बना रही हैं। इसके बावजूद दुकानदारों को दिल्ली में प्रति 51 माइक्रॉन की पॉलीथिन 2 से 3 रुपये में मिल रही है। जबकि दुकानदार इसे खरीदारों को 5 से 7 रुपये में दे रहे हैं। यानी दुकान से 50 रुपये का सामान लेते हैं तो पॉलीथिन मांगने पर सीधे 55 रुपये वसूला जा रहा है।
दरअसल, प्रदेश में कानून बनाकर 50 माइक्रॉन से पतली पॉलीथिन पर रोक लगाया जाएगा। उत्तर प्रदेश प्लास्टिक और वन्य जीव अनाशित कूड़ा कचरा (उपयोग एवं नियंत्रण का विनियमन) अधिनियम 2000 में संशोधन की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। इसका आदेश जारी होते ही 50 माइक्रॉन से पतली पॉलीथिन बेचना व बनाना कानूनी जुर्म होगा।
फिलहाल, शहर में 50 माइक्रॉन से ज्यादा की पॉलीथिन का प्रयोग शुरू हो चुका है। चाय की दुकान से लेकर फल व सब्जी विक्रेता भी इसका प्रयोग करने लगे हैं। दरअसल, इस तरह की पॉलीथिन पानी व धूप की रोशनी में एक सप्ताह में स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं।
किराए पर मिल रहे थैले
यह खींचने से खिंचती नहीं हैं। इसे कागज की तरह फाड़ा जा सकता है। एक बार प्रयोग करने के बाद इसका दोबारा प्रयोग नहीं किया जा सकता है। सड़क किनारे फेंकने या कहीं भी डालने पर यह स्वत: ही नष्ट हो जाती है। इसके प्रयोग से अन्य पॉलीथिन से होने वाले रोगों से बचा जा सकता है।
किराए पर मिल रहे थैले
पॉलीथिन पर प्रतिबंध ने कुछ दुकानदारों की चांदी कर दी है। इसमें सबसे ज्यादा सब्जी व फल विक्रेता हैं। इन्होंने किराए पर थैले देने का बिजनेस शुरू कर दिया है। दरअसल, इनकी दुकान पर आए ग्राहक यदि सब्जी खरीदते हैं और साथ में बैग नहीं लाए तो दुकानदार प्रति थैला 10 रुपये सिक्योरिटी के रूप में इनसे ले रहे हैं। थैला वापस करने पर 10 रुपये वापस कर दिया जा रहा है। यदि ग्राहक को थैला घर ले जाना है तो उसे 8 रुपये अतिरिक्त देना होगा।
नोएडा शॉपकीपर वेलफेयर एसोसिएशन के महामंत्री पीयूष मोहन ने कहा कि हर तरीके की पॉलीथिन पर पर प्रतिबंध होना चाहिए। आदेश बहुत अच्छा है, व्यापारी भी साथ देना चाहते हैं। लेकिन, इसका पालन करने के लिए प्राधिकरण को कड़ा रुख अपनाना चाहिए।