बस कंडक्टर बन पूरी की पढ़ाई, कीर्ति बनना चाहती है सीए
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कौशांबी में रहने वाली कीर्ति जैसे तैसे नवीं कक्षा तक पहुंची, लेकिन पिता की कम आय के आगे हार मानकर घर बैठने के बजाए कीर्ति ने संघर्ष का रास्ता चुना और आज सीए की पढ़ाई के साथ दिल्ली में जॉब भी कर रही हैं।
शीशा काटकर घर के लिए राशन जुटाने वाले पिता की संतान कीर्ति छह भाई बहिनों में तीसरे नंबर की हैं। नवीं के बाद जब कीर्ति ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई तो पिता ने रुपया न होने की बात कही।
कीर्ति बताती हैं कि, लेकिन उसी पल पिता ने हौसला भी दिया कि अगर पढ़ने के लिए कीर्ति कुछ काम कर सके तो वे उसका पूरी तरह सहयोग करेंगे।
और ऐसे खड़ी हुई अपने पैरों पर कीर्ति
कीर्ति बताती हैं कि दो बड़ी बहिनों की शादी हो गई, लेकिन उनके बाद उनकी दो छोटी बहिन और भाई भी हैं, लिहाजा पढ़ाई के लिए उसने दिल्ली बसों में परिचालक की भी नौकरी की।
उसके बाद शांति कौशल फाउंडेशन की कनक मित्तल के संपर्क में आई। जहां वह हैंडीक्राफ्ट बनाती थी। गणित में 97 फीसदी और अकाउंट में 80 फीसदी के साथ 78 प्रतिशत से बारहवीं पास करने के बाद उन्होंने एक फर्म में नौकरी करना शुरू कर दिया।
दिल्ली इग्नू से बीकॉम किया। फिलहाल कीर्ति साकेत में एक कंपनी में अकाउंटेंट हैं और एमबीए और सीए साथ-साथ कर रही हैं। वहीं अपनी बहिनों को बीए करा रही हैं और भाई 12वीं में पढ़ रहा है।
कीर्ति कहती हैं कि हौसला है तो पहाड़ जैसी मुश्किलें भी रास्ता नहीं रोक पाती। वहीं मां-पिता ने भी उन्हें आगे बढ़ने और खूब पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
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‘’मेरी सफलता की कहानी’ अमर उजाला, सेकेंड ए-19, राधिका पैलेस, नेहरू नगर, गाजियाबाद।