दिल्ली: कॉलोनियों के पुनर्विकास में उठा लैंडयूज का सवाल, आवासीय भूमि को व्यावसायिक बनाने का आरोप
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दक्षिण दिल्ली में सात कॉलोनियों के पुनर्विकास की परियोजना सवालों के भंवर में है। पेड़ों की कटाई के बाद अब परियोजना में लैंड यूज को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि परियोजना प्रस्तावक एनबीसीसी ने डीडीए के भवन उपनियमों के विरुद्ध आवासीय लैंडयूज वाली जगह को व्यावसायिक में तब्दील करने की कोशिश की है। इस आरोप की छानबीन अमर उजाला ने की है। एनबीसीसी के खिलाफ यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में भी उठाया गया है और आगे एनजीटी में भी उठाया जाएगा।
एनजीटी में मामला उठाने वाले अधिवक्ता अनिल सूद ने कहा कि नौरोजी नगर और सरोजनी नगर के एमओयू को देखें तो इसे आवासीय लैंडयूज के बजाय व्यावसायिक स्तर पर तैयार किया जा रहा है। डीडीए के लैंड यूज संबंधी कानून 11 (ए) (1) के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट में इस संबंध में याची की तरफ से पेश होने वकील गोपाल शंकर नारायण ने कहा कि पूरी परियोजना का बड़ा हिस्सा व्यावसायिक गतिविधियों के लिए तैयार किया जा रहा है।
इस आरोप पर एनबीसीसी के कार्यकारी निदेशक एनपी अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि इस पुनर्विकास परियोजना का नक्शा नई दिल्ली नगर पालिका से पास कराया गया है। डीडीए के भवन उपनियमों के संबंध में उन्हें जानकारी नहीं है। एनबीसीसी के कार्यकारी निदेशक एनपी अग्रवाल के नाम ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से पर्यावरण मंजूरी जारी की गई है। नेताजी नगर और नौरोजी नगर संबंधी पर्यावरण मंजूरी में कहा गया है कि कोई भी निर्माण स्थानीय भवन उपनियमों के आधार पर ही होगा। निर्माण से पहले सभी स्थानीय एजेंसियों से मंजूरी लेना अनिवार्य होगा।
हरित भूमि पर भी है सवाल
डीडीए के दिल्ली एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि प्राधिकरण का इस परियोजना से कोई लेना-देना नहीं है। पुनर्विकास परियोजना नई दिल्ली नगर निगम के क्षेत्र में है। इस संबंध में उसी को निर्णय लेना है। एनबीसीसी के प्रमुख प्रबंध निदेशक अनूप कुमार मित्तल का कहना है कि नेताजी नगर और नौरोजी नगर परियोजना में 10 फीसदी हिस्सा सामाजिक और
व्यावसायिक गतिविधियों वाला होगा। अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने कहा कि प्रस्तावों से स्पष्ट ही नहीं है कि किसको मकान दिया जाएगा। सरकार कह रही है कि वह अधिकारियों के लिए मकान बना रही है, जबकि मकान और दुकान का कोई वर्गीकरण नहीं है।
एनजीटी में अधिवक्ता अनिल सूद ने कहा कि नेताजी नगर में एनबीसीसी ने परियोजना संबंधी ब्रॉशर के भीतर कहीं भी ग्रीन कवर और ट्री कवर की बात नहीं कही है। एनबीसीसी को
पता नहीं है कि ग्रीन कवर और ट्री कवर में क्या अंतर है। बिना पेड़ों के ग्रीन कवर यानी घास के मैदान नहीं बचेंगे। देशी प्रजाति के काटे जा रहे पेड़ों की भरपाई नहीं हो पाएगी।
जीआरपीए बिना सरकारी फंड की परियोजना
जनरल पूल रेजिडेंशियल एकमोडेशन (जीआरपीए) के तहत सरकारी अधिकारियों के लिए मकानों की व्यवस्था करने को केंद्र ने 2016 में दक्षिणी दिल्ली की सात कॉलोनियों के पुनर्विकास को मंजूरी दी थी। इनमें नेताजी नगर, नौरोजी नगर, किदवई नगर, कस्तूरबा नगर, त्यागराज नगर, श्रीनिवासपुरी, मोहम्मदपुर कॉलोनी का नाम शामिल है। इसकी अनुमानित लागत 32,835 करोड़ रुपये है। इस पूरी परियोजना में सरकार खुद कोई बजट नहीं खर्च करेगी, बल्कि इन कॉलोनियों के जरिए ही फंड जुटाएगी।