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Delhi NCR News: बीमा क्लेम खारिज करना पड़ा महंगा, कंपनी पर जुर्माना
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-अस्पताल के रिकॉर्ड में गलती बताकर नहीं किया भुगतान, 9 फीसदी ब्याज सहित देना होगा 4.72 लाख का मुआवजा
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। अस्पताल के रिकॉर्ड में हुई एक गलती को आधार बनाकर स्वास्थ्य बीमा कंपनी ने 76 वर्षीय महिला का इलाज का खर्च देने से इनकार कर दिया। महिला को इलाज के लिए अस्पताल का पूरा बिल अपनी जेब से चुकाना पड़ा। मामले में दिल्ली के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा कंपनी निवा बूपा को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने कंपनी को इलाज के खर्च के 3.87 लाख रुपये, मानसिक परेशानी के लिए 50 हजार रुपये और मुकदमे के खर्च के 35 हजार रुपये देने का निर्देश दिया है। इस तरह महिला को कुल 4.72 लाख रुपये मिलेंगे। इसके अलावा, इलाज के खर्च की राशि पर 25 अप्रैल 2024 से भुगतान होने तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-8 की अध्यक्ष दिव्य ज्योति जैपुरियार और सदस्य रश्मि बंसल की पीठ ने 24 सितंबर के आदेश में कहा कि महिला को अपने मेडिकल क्लेम के लिए लंबे समय तक पत्राचार करना पड़ा और बार-बार दस्तावेज और स्पष्टीकरण देने पड़े। इसके बावजूद कंपनी ने उनका दावा खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि अस्पताल रिकॉर्ड में हुई गलती को सुधार चुका था। इलाज करने वाले डॉक्टर ने भी स्पष्ट किया था कि महिला को पहले गुर्दे की बीमारी नहीं थी और उनकी किडनी की जांच सामान्य थी। वहीं, आयोग ने कहा कि बीमा कंपनियां जरूरी दस्तावेज मांग सकती हैं, लेकिन पहले से दिए जा चुके दस्तावेज बार-बार मांगना या ऐसे दस्तावेज मांगना, जिन्हें उचित रूप से हासिल करना संभव नहीं है, सही नहीं है। इस तरह बीमा दावे को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। आयोग ने कंपनी को आदेश मिलने के 45 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है।
अस्पताल ने खुद सुधारी थी रिकॉर्ड की गलती-
मामला मधु सावनी का है। उन्होंने जून 2023 में निवा बूपा से 10 लाख और 25 लाख रुपये के बीमा कवर वाली दो स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थीं। पॉलिसी लेते समय उन्होंने मधुमेह, खून में वसा संबंधी समस्या और उच्च रक्तचाप समेत अपनी पहले से मौजूद बीमारियों की जानकारी दी थी। बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी करने से पहले उनकी चिकित्सकीय जांच भी कराई थी। 23 दिसंबर 2023 को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें शालीमार बाग स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के आपातकालीन विभाग में भर्ती कराया गया। अस्पताल के शुरुआती रिकॉर्ड में गलती से गुर्दे की पुरानी बीमारी दर्ज हो गई थी। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ही 30 दिसंबर को इस गलती को संशोधित कर दिया गया था।
दस्तावेज मांगने के बाद भी दावा खारिज
बीमा कंपनी ने कैशलेस इलाज की मंजूरी देने से इनकार कर दिया। इसके चलते महिला को अस्पताल का बिल खुद चुकाना पड़ा। इसके बाद जनवरी से अप्रैल 2024 के बीच कंपनी ने उनसे कई बार अतिरिक्त मेडिकल रिकॉर्ड और स्पष्टीकरण मांगे। इलाज करने वाले डॉक्टर से गुर्दे की बीमारी संबंधी गलत प्रविष्टि पर हलफनामा भी मांगा गया। महिला की ओर से दस्तावेज और चिकित्सकीय स्पष्टीकरण दिए जाने के बावजूद कंपनी ने 25 अप्रैल 2024 को जरूरी दस्तावेज नहीं मिलने का हवाला देते हुए बीमा क्लेम खारिज कर दिया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। अस्पताल के रिकॉर्ड में हुई एक गलती को आधार बनाकर स्वास्थ्य बीमा कंपनी ने 76 वर्षीय महिला का इलाज का खर्च देने से इनकार कर दिया। महिला को इलाज के लिए अस्पताल का पूरा बिल अपनी जेब से चुकाना पड़ा। मामले में दिल्ली के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा कंपनी निवा बूपा को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने कंपनी को इलाज के खर्च के 3.87 लाख रुपये, मानसिक परेशानी के लिए 50 हजार रुपये और मुकदमे के खर्च के 35 हजार रुपये देने का निर्देश दिया है। इस तरह महिला को कुल 4.72 लाख रुपये मिलेंगे। इसके अलावा, इलाज के खर्च की राशि पर 25 अप्रैल 2024 से भुगतान होने तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-8 की अध्यक्ष दिव्य ज्योति जैपुरियार और सदस्य रश्मि बंसल की पीठ ने 24 सितंबर के आदेश में कहा कि महिला को अपने मेडिकल क्लेम के लिए लंबे समय तक पत्राचार करना पड़ा और बार-बार दस्तावेज और स्पष्टीकरण देने पड़े। इसके बावजूद कंपनी ने उनका दावा खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि अस्पताल रिकॉर्ड में हुई गलती को सुधार चुका था। इलाज करने वाले डॉक्टर ने भी स्पष्ट किया था कि महिला को पहले गुर्दे की बीमारी नहीं थी और उनकी किडनी की जांच सामान्य थी। वहीं, आयोग ने कहा कि बीमा कंपनियां जरूरी दस्तावेज मांग सकती हैं, लेकिन पहले से दिए जा चुके दस्तावेज बार-बार मांगना या ऐसे दस्तावेज मांगना, जिन्हें उचित रूप से हासिल करना संभव नहीं है, सही नहीं है। इस तरह बीमा दावे को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। आयोग ने कंपनी को आदेश मिलने के 45 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है।
अस्पताल ने खुद सुधारी थी रिकॉर्ड की गलती-
मामला मधु सावनी का है। उन्होंने जून 2023 में निवा बूपा से 10 लाख और 25 लाख रुपये के बीमा कवर वाली दो स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थीं। पॉलिसी लेते समय उन्होंने मधुमेह, खून में वसा संबंधी समस्या और उच्च रक्तचाप समेत अपनी पहले से मौजूद बीमारियों की जानकारी दी थी। बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी करने से पहले उनकी चिकित्सकीय जांच भी कराई थी। 23 दिसंबर 2023 को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें शालीमार बाग स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के आपातकालीन विभाग में भर्ती कराया गया। अस्पताल के शुरुआती रिकॉर्ड में गलती से गुर्दे की पुरानी बीमारी दर्ज हो गई थी। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ही 30 दिसंबर को इस गलती को संशोधित कर दिया गया था।
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दस्तावेज मांगने के बाद भी दावा खारिज
बीमा कंपनी ने कैशलेस इलाज की मंजूरी देने से इनकार कर दिया। इसके चलते महिला को अस्पताल का बिल खुद चुकाना पड़ा। इसके बाद जनवरी से अप्रैल 2024 के बीच कंपनी ने उनसे कई बार अतिरिक्त मेडिकल रिकॉर्ड और स्पष्टीकरण मांगे। इलाज करने वाले डॉक्टर से गुर्दे की बीमारी संबंधी गलत प्रविष्टि पर हलफनामा भी मांगा गया। महिला की ओर से दस्तावेज और चिकित्सकीय स्पष्टीकरण दिए जाने के बावजूद कंपनी ने 25 अप्रैल 2024 को जरूरी दस्तावेज नहीं मिलने का हवाला देते हुए बीमा क्लेम खारिज कर दिया।
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