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Noida News: सीमित जमीन, असीमित हाैसले से महिलाएं लिख रहीं स्वालंबन की कहानी
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- सब्जी, डेयरी और जैविक खेती कर महिला किसान बन रहीं आत्मनिर्भर
संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। मिट्टी से रिश्ता जब हौसले से जुड़ता है, तो बदलाव की नई कहानी जन्म लेती है। शहरों में खेती की जमीन भले ही लगातार कम होती जा रही हो, लेकिन कुछ बीघा खेत आज भी उन महिलाओं के सपनों को सींच रहे हैं, जिन्होंने खेती को अपनी पहचान और आत्मनिर्भरता का जरिया बना लिया है।आधुनिक खेती, सब्जी उत्पादन, डेयरी और जैविक कृषि के जरिए वे न केवल अपने परिवार की आय बढ़ा रही हैं, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रेरित कर रही हैं। खेती से होने वाली आमदनी ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत की है और आत्मविश्वास भी बढ़ाया है।
खेती में महिलाओं की भूमिका पहले भी महत्वपूर्ण रही है, लेकिन अब वे केवल श्रमिक नहीं बल्कि निर्णय लेने वाली किसान बन रही हैं। सरकारी योजनाओं, कृषि विभाग के प्रशिक्षण और नई तकनीकों की मदद से महिलाएं कम लागत में बेहतर उत्पादन कर रही हैं। रासायनिक खेती की जगह जैविक खेती, ड्रिप सिंचाई और उन्नत बीजों का इस्तेमाल कर वे अच्छी कमाई कर रही हैं। इससे गांवों में महिलाओं की पहचान भी मजबूत हुई है। आज के दौर में जिले की बात करें तो वह बैंक से कर्ज लेकर भी खेती कर रही हैं।
पहले के जमाने में खेती में सिर्फ परिवार का हाथ बंटाती थी, लेकिन अब पूरी फसल की योजना खुद बनाती हूं। सब्जियों की खेती से अच्छी आमदनी हो रही है। - सपना चौहान, नंगली गांव निवासी
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मैं ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूं, पर देखते-देखते सीखकर कुछ न कुछ उगा लेती हूं जिससे कुछ आमदनी हो जाती है। इस सीजन में हमने घिया, तोरी, टमाटर उगाए है जिन्हें हम फेस-2 मंडी में बेचते हैं। -रामवती देवी, सोरखा निवासी
जैविक खेती अपनाने के बाद उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ी है। शुरुआत में दिक्कतें आईं, लेकिन अब ग्राहक सीधे खेत से सब्जियां खरीदने आते हैं।
-बबीता शर्मा, सोरखा निवासी
हमें खेती करने के लिए बैंक से लोन तक मिल जाता है वो भी कम ब्याज पर। अब गांव की दूसरी महिलाएं भी खेती को रोजगार के रूप में अपना रही हैं। -मुन्नी देवी, विजितपुर गांव निवासी
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संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। मिट्टी से रिश्ता जब हौसले से जुड़ता है, तो बदलाव की नई कहानी जन्म लेती है। शहरों में खेती की जमीन भले ही लगातार कम होती जा रही हो, लेकिन कुछ बीघा खेत आज भी उन महिलाओं के सपनों को सींच रहे हैं, जिन्होंने खेती को अपनी पहचान और आत्मनिर्भरता का जरिया बना लिया है।आधुनिक खेती, सब्जी उत्पादन, डेयरी और जैविक कृषि के जरिए वे न केवल अपने परिवार की आय बढ़ा रही हैं, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रेरित कर रही हैं। खेती से होने वाली आमदनी ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत की है और आत्मविश्वास भी बढ़ाया है।
खेती में महिलाओं की भूमिका पहले भी महत्वपूर्ण रही है, लेकिन अब वे केवल श्रमिक नहीं बल्कि निर्णय लेने वाली किसान बन रही हैं। सरकारी योजनाओं, कृषि विभाग के प्रशिक्षण और नई तकनीकों की मदद से महिलाएं कम लागत में बेहतर उत्पादन कर रही हैं। रासायनिक खेती की जगह जैविक खेती, ड्रिप सिंचाई और उन्नत बीजों का इस्तेमाल कर वे अच्छी कमाई कर रही हैं। इससे गांवों में महिलाओं की पहचान भी मजबूत हुई है। आज के दौर में जिले की बात करें तो वह बैंक से कर्ज लेकर भी खेती कर रही हैं।
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पहले के जमाने में खेती में सिर्फ परिवार का हाथ बंटाती थी, लेकिन अब पूरी फसल की योजना खुद बनाती हूं। सब्जियों की खेती से अच्छी आमदनी हो रही है। - सपना चौहान, नंगली गांव निवासी
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मैं ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूं, पर देखते-देखते सीखकर कुछ न कुछ उगा लेती हूं जिससे कुछ आमदनी हो जाती है। इस सीजन में हमने घिया, तोरी, टमाटर उगाए है जिन्हें हम फेस-2 मंडी में बेचते हैं। -रामवती देवी, सोरखा निवासी
जैविक खेती अपनाने के बाद उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ी है। शुरुआत में दिक्कतें आईं, लेकिन अब ग्राहक सीधे खेत से सब्जियां खरीदने आते हैं।
-बबीता शर्मा, सोरखा निवासी
हमें खेती करने के लिए बैंक से लोन तक मिल जाता है वो भी कम ब्याज पर। अब गांव की दूसरी महिलाएं भी खेती को रोजगार के रूप में अपना रही हैं। -मुन्नी देवी, विजितपुर गांव निवासी