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सुप्रीम कोर्ट : वीडियो कांफ्रेंसिंग
Updated Mon, 09 Oct 2017 09:59 PM IST
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वैवाहिक विवाद मामले में वीडियो कांफ्रेंसिंग अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट
- बहुमत के आधार पर लिया फैसला
- जस्टिस चंद्रचूड़ की राय अलग, आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल में रुकावट ठीक नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक पति और पत्नी सहमत न हों, परिवार न्यायालय में होने वाले वैवाहिक विवाद के मामलों की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अनिवार्य नहीं हो सकती। शीर्ष अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करने की गुहार संबंधी याचिकाओं पर सहमति के बगैर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई नहीं हो सकती।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने बहुमत (2:1) के आधार पर कृष्णा वेनी निगम मामले में दिए गए आदेश को दरकिनार कर दिया। इस मामले पर दिए फैसले में कहा गया था कि अगर एक पक्ष या दोनों पक्ष सहमत हों तो मुकदमे की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये कराई जा सकती है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया कि फैमली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा-सात में दोनों पक्षों को वैधानिक संरक्षण देने की बात है। साथ ही अदालत का यह दायित्व होता है कि वह दोनों पक्षों के बीच मतभेद दूर करने का प्रयास करे और उन्हें फिर से मिलाने की कोशिश करे। अगर सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये होगी तो धारा-सात का मकसद ही पूरा नहीं होगा। फैसले में कहा गया है कि कानून के तहत वैवाहिक विवाद के मामले की सुनवाई बंद कमरे में होनी चाहिए। हालांकि न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की राय अलग थी। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि पारिवारिक विवाद निपटाने के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग को कई देशों ने अपनाया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे स्वीकृति मिली हुई है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट को वीडियो कांफ्रेंसिंग के इस्तेमाल को लेकर कानून बनाना चाहिए और फैमिली कोर्ट को केस के हिसाब से निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। उन्होंने अपने फैसले में यह भी कहा कि शीर्ष अदालत को आधुनिक तकनीक अपनाने में रुकावट नहीं डालना चाहिए।
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- बहुमत के आधार पर लिया फैसला
- जस्टिस चंद्रचूड़ की राय अलग, आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल में रुकावट ठीक नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक पति और पत्नी सहमत न हों, परिवार न्यायालय में होने वाले वैवाहिक विवाद के मामलों की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अनिवार्य नहीं हो सकती। शीर्ष अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करने की गुहार संबंधी याचिकाओं पर सहमति के बगैर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई नहीं हो सकती।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने बहुमत (2:1) के आधार पर कृष्णा वेनी निगम मामले में दिए गए आदेश को दरकिनार कर दिया। इस मामले पर दिए फैसले में कहा गया था कि अगर एक पक्ष या दोनों पक्ष सहमत हों तो मुकदमे की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये कराई जा सकती है।
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया कि फैमली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा-सात में दोनों पक्षों को वैधानिक संरक्षण देने की बात है। साथ ही अदालत का यह दायित्व होता है कि वह दोनों पक्षों के बीच मतभेद दूर करने का प्रयास करे और उन्हें फिर से मिलाने की कोशिश करे। अगर सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये होगी तो धारा-सात का मकसद ही पूरा नहीं होगा। फैसले में कहा गया है कि कानून के तहत वैवाहिक विवाद के मामले की सुनवाई बंद कमरे में होनी चाहिए। हालांकि न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की राय अलग थी। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि पारिवारिक विवाद निपटाने के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग को कई देशों ने अपनाया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे स्वीकृति मिली हुई है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट को वीडियो कांफ्रेंसिंग के इस्तेमाल को लेकर कानून बनाना चाहिए और फैमिली कोर्ट को केस के हिसाब से निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। उन्होंने अपने फैसले में यह भी कहा कि शीर्ष अदालत को आधुनिक तकनीक अपनाने में रुकावट नहीं डालना चाहिए।
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