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2000 से 2015 के बीच प्रदूषण से कुल
Updated Fri, 07 Dec 2018 02:39 AM IST
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फिल्मों ने दिए पर्यावरण संरक्षण के संदेश
2000 से 2015 के बीच प्रदूषण से कुल 8 फीसदी मौत : जयराम रमेश
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हम अपनी समृद्धि के लिए जंगलों की कटाई नहीं कर सकते। प्रदूषण जानलेवा होता जा रहा है। 2005 से 2015 के बीच देश में प्रदूषण के कारण कुल 8 फीसदी मौतें हुई हैं। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पर्यावरण पर केंद्रित तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव का उद्घाटन करते हुए यह बातें कर्नाटक से राज्य सभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहीं। पृथ्वी के वक्तव्य नाम से तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव को टॉक्सिक लिंक और स्वीडिश सोसायटी फॉर नेचर कंजर्वेशन की ओर से आयोजित किया गया है। बृहस्पतिवार को चार फिल्मों का संचालन किया गया।
कई जीवों का घर, कस्बा और गांव है एक पेड़
इसमें पहली फिल्म तुर्क के इंस्ताबुल पर केंद्रित और सिहान सेकिक के जरिये निर्मित लिटिल रेजीडेंट्स ऑफ द बिग सिटी रही। इस फिल्म में कीट-पतंगों और फूलों की ऐसी दुनिया के चित्र और किस्से परदे पर उकेरे गए, जिनसे लोगों का नजरें हटाना मुश्किल रहा। फिल्म ने बहुत ही संक्षेप में यह संदेश दिया कि एक पेड़ कई पक्षी, कीट-पतंगों और जीवों के लिए घर, कस्बा और गांव हैं जो करोड़ों वर्षों से आबाद हैं। यदि यूं ही पर्यावरण क्षति होती रही और जलवायु परिवर्तन का संकट गहराया तो यह दुनिया उजड़ जाएगी।
शिकारी बने संरक्षक
इसी तरह से नागालैंड के पंगती गांव पर बनी फिल्म द पंगती स्टोरी में दिखाया गया कि इस गांव में बड़े पैमाने पर साइबेरियाई पक्षी (अमुर फैलकॉन) का शिकार होता था, लेकिन बाद में गांव ने इन पक्षियों के संरक्षण का काम शुरू किया और यह प्रवासी पक्षी इस गांव के ही होकर रह गए।
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द केन ने दिया संदेश
इसके अलावा फिल्म द केन एक छोटी और संदेश परक फिल्म रही। इसमें एक बच्चा रास्ते में केन फेंक देता है फिर उसे रास्ते भर ऐसे कई केन पड़े हुए मिलते रहते हैं। अंत में वह उगता कर केन को डस्टबिन में डालता है और उसके रास्ते में फेंके जाने वाले सारे केन गायब हो जाते हैं। संदेश यह रहा कि आप रास्ते में केन फेंकते हैं तो और लोग भी फेंकेंगे।
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2000 से 2015 के बीच प्रदूषण से कुल 8 फीसदी मौत : जयराम रमेश
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हम अपनी समृद्धि के लिए जंगलों की कटाई नहीं कर सकते। प्रदूषण जानलेवा होता जा रहा है। 2005 से 2015 के बीच देश में प्रदूषण के कारण कुल 8 फीसदी मौतें हुई हैं। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पर्यावरण पर केंद्रित तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव का उद्घाटन करते हुए यह बातें कर्नाटक से राज्य सभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहीं। पृथ्वी के वक्तव्य नाम से तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव को टॉक्सिक लिंक और स्वीडिश सोसायटी फॉर नेचर कंजर्वेशन की ओर से आयोजित किया गया है। बृहस्पतिवार को चार फिल्मों का संचालन किया गया।
कई जीवों का घर, कस्बा और गांव है एक पेड़
इसमें पहली फिल्म तुर्क के इंस्ताबुल पर केंद्रित और सिहान सेकिक के जरिये निर्मित लिटिल रेजीडेंट्स ऑफ द बिग सिटी रही। इस फिल्म में कीट-पतंगों और फूलों की ऐसी दुनिया के चित्र और किस्से परदे पर उकेरे गए, जिनसे लोगों का नजरें हटाना मुश्किल रहा। फिल्म ने बहुत ही संक्षेप में यह संदेश दिया कि एक पेड़ कई पक्षी, कीट-पतंगों और जीवों के लिए घर, कस्बा और गांव हैं जो करोड़ों वर्षों से आबाद हैं। यदि यूं ही पर्यावरण क्षति होती रही और जलवायु परिवर्तन का संकट गहराया तो यह दुनिया उजड़ जाएगी।
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शिकारी बने संरक्षक
इसी तरह से नागालैंड के पंगती गांव पर बनी फिल्म द पंगती स्टोरी में दिखाया गया कि इस गांव में बड़े पैमाने पर साइबेरियाई पक्षी (अमुर फैलकॉन) का शिकार होता था, लेकिन बाद में गांव ने इन पक्षियों के संरक्षण का काम शुरू किया और यह प्रवासी पक्षी इस गांव के ही होकर रह गए।
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द केन ने दिया संदेश
इसके अलावा फिल्म द केन एक छोटी और संदेश परक फिल्म रही। इसमें एक बच्चा रास्ते में केन फेंक देता है फिर उसे रास्ते भर ऐसे कई केन पड़े हुए मिलते रहते हैं। अंत में वह उगता कर केन को डस्टबिन में डालता है और उसके रास्ते में फेंके जाने वाले सारे केन गायब हो जाते हैं। संदेश यह रहा कि आप रास्ते में केन फेंकते हैं तो और लोग भी फेंकेंगे।