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पंचायत व्यवस्था----------

Sat, 21 Jul 2018 09:56 PM IST
Updated Sat, 21 Jul 2018 09:56 PM IST
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पंचायत व्यवस्था----------
शाहबेरी
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हेडिंग: पंचायत व्यवस्था खत्म करके गांवों से हुई नाइंसाफी
सबहेड: जमीन अधिग्रहण करने के बाद गांवों का विकास करना भी भूला प्राधिकरण
विकास के लिए प्रदेश सरकार से मिलने वाली धनराशि बंद हो गई
एसएस अवस्थी
नोएडा। प्राधिकरण और प्र्रशासन के बीच सही तालमेल होता तो नोएडा व ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में पंचायत व्यवस्था खत्म नहीं होती। प्राधिकरण के अड़ियल रवैये के कारण ही प्रदेश सरकार ने यहां से पंचायत व्यवस्था खत्म करके गांवों के विकास कार्य के लिए मिलने वाली सहायता राशि को रुकवा दिया। जबकि कहा यह था कि अब प्राधिकरण ही गांवों का विकास करेगा, लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका। यही कारण है शाहबेरी जैसी घटनाएं होनी शुरू हो गई हैं।
दरअसल, नोएडा और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र को मिलाकर करीब 150 गांव दोनों प्राधिकरण के क्षेत्र में आते हैं। जिस वक्त नोएडा बना तो गांव के लोगों को मुआवजा की अहमियत पता नहीं थी। प्राधिकरण ने किसानों को करीब 100-200 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब के मुआवजा देना शुरू किया था। साथ ही, वादा किया था कि शहर के विकास करने से पहले गांवों का विकास किया जाएगा। गांव के लोगों को नौकरी, अधिगृहीत जमीन के बदले प्लाट समेत तमाम सुविधाएं देने का वादा किया था। साथ ही, ग्राम प्रधान, बीडीसी और जिला पंचायत व्यवस्था भी रही, जिससे गांव के विकास होते रहे।
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प्राधिकरण ने खत्म करा दी पंचायत व्यवस्था
2014 के आसपास प्राधिकरण ने शासन को पत्र लिखकर कहा कि गांवों का विकास कराने का काम प्राधिकरण कर रहा है। कई बार होता है कि किसी कार्य को प्राधिकरण ने करा दिया तो पंचायत व्यवस्था के तहत उसी कार्य को कागजों में कराकर हेराफेरी भी होती है। इसलिए प्राधिकरण क्षेत्र में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था (ग्राम प्रधान, बीडीसी व पंचायत सदस्य) समाप्त होनी चाहिए। प्रदेश सरकार ने बिना देरी किए व्यवस्था खत्म कर दी। लोगों ने काफी विरोध किया और मामला कोर्ट में भी गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
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कंगाली में प्राधिकरण, कैसे हो विकास
किसान नेता चौधरी विहारी सिंह ने कहा कि प्राधिकरण ने गांव के लोगों के अधिकारों को छीना है। पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह व पूर्व सीईओ पीसी गुप्ता जैसे अधिकारी नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में घोटाले कर गए। प्राधिकरण को कंगाल बना दिया। ऐसे में अब विकास कहां से हो सकेगा। यही कारण है कि गांवों की जमीन पर प्रॉपर्टी डीलर व भूमाफिया की नजर पड़ गई। जिसने जहां चाही, जमीन खरीदी और मन मुताबिक निर्माण करा दिया। यदि पंचायत व्यवस्था होती तो निश्चित ही अवैध निर्माण पर रोक लगती। ग्राम प्रधान, बीडीसी व पंचायत सदस्यों की दखलंदाजी होती तो नियमों की अनदेखी करनी सहज नहीं होती। गांव के नक्शा समेत अन्य कार्य पंचायत से ही पास होते हैं।
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