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‘काजल’ की मजबूरी में ‘विमला’ हो गईं जरूरी
एस.एस. अवस्थी/अमर उजाला, नोएडा
Updated Wed, 27 Aug 2014 04:09 AM IST
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भारतीय जनता पार्टी ने विमला बाथम को नोएडा विधानसभा का प्रत्याशी बनाया
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है। इसकी घोषणा मंगलवार को की गई। विमला बाथम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की
उपाध्यक्ष हैं। वह 27 अगस्त को अपना नामांकन दाखिल करेंगी। भाजपा की घोषणा
के साथ ही विधानसभा उपचुनाव के प्रमुख प्रत्याशियों के नाम लोगों के सामने आ
गए हैं। जहां सपा ने ब्राह्मण और कांग्रेस ने गुर्जर को प्रत्याशी बनाया
है तो बीजेपी ने वैश्य जाति की महिला पर दांव खेला।
पेशे से उद्यमी विमला बाथम ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1993 में कार्यकर्ता के तौर पर की। इसके बाद महानगर कमेटी में तमाम पदों पर रहने के बाद वह भाजपा के लघु उद्योग प्रकोष्ठ की अध्यक्ष चुनी गईं। इसके बाद वह प्रदेश कमेटी की सदस्य रहीं।
शाहजहांपुर में जन्मी विमला बाथम की ससुराल कानपुर में है, लेकिन व्यवसाय के सिलसिले में 1977 में वह नोएडा सेक्टर-34 में बस र्गईं। अमर उजाला से बातचीत में विमला बाथम ने कहा महिलाओं की सुरक्षा, बिजली, पानी, सड़क, डीएनडी टोल फ्री कराना आदि मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएंगी। युवाओं के लिए रोजगार और सभी वर्गों के लिए चिकित्सा को बेहतर कराना उनका लक्ष्य होगा।
काजल शर्मा को सपा प्रत्याशी बनाए जाने के बाद ही नोएडा विधानसभा के चुनावी समीकरण में बड़ा उलटफेर हुआ। भाजपा में दावेदारों की लंबी लिस्ट के बावजूद विमला बाथम को प्रत्याशी बनाया गया है।
ये भी कहा जा सकता है कि सपा से महिला प्रत्याशी आने के बाद भाजपा के लिए भी आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला चेहरा ढूंढना मजबूरी हो गया। अब बदली परिस्थितियों में उपचुनाव के बेहद दिलचस्प होने की उम्मीद की जा रही है।
सपा से काजल शर्मा, कांग्रेस से राजेंद्र अवाना और भाजपा से विमला बाथम को नोएडा विधान सभा उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया जा चुका है। तीनों 27 अगस्त को नामांकन करेंगे। टिकट को लेकर सबसे ज्यादा ‘ड्रामा’ भाजपा में हुआ है। दो दिग्गज जब आमने-सामने आ गए तो तीसरे विकल्प का रास्ता चुना गया।
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दरअसल, लोकसभा के बाद विधान सभा के उपचुनाव में काफी उलटफेर दिखाई दिए हैं। उत्तराखंड, बिहार, कर्नाटक से चुनावी नतीजे यह बताते हैं कि राष्ट्रीय नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति का जोर रहा। इसीलिए नोएडा विधान सभा के प्रत्याशी अति उत्साहित हैं। दो महिला प्रत्याशी मैदान में हैं। पंडित और वैश्य बाहुल्य नोएडा के चुनावी मैदान में गुर्जरों का प्रतिनिधित्व करने वाले अकेले प्रत्याशी कांग्रेस से हैं।
अब आसान नहीं है सीट पर जीत
तीनों पार्टियों से प्रत्याशियों की घोषणा के बाद नोएडा विधानसभा सीट पर मुकाबला मुश्किल हो गया है। सपा प्रत्याशी काजल शर्मा को प्रदेश में सरकार होने का लाभ तो मिलेगा ही। इसके अलावा वह ब्राह्मण परिवार की पढ़ी-लिखी प्रत्याशी हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि भी राजनीतिक है, ये परिस्थितियां उन्हें मजबूती देती हैं। उधर, भाजपा के रूठे हुए लोगों से भी पार्टी ने भितरघात की उम्मीद बांध रखी है।
साथ ही मुस्लिम वोटों पर भी विश्वास जमा हुआ है। बात करेंगे कांग्रेस की तो लंबे समय से राजनीतिक उपेक्षा झेल रहे गुर्जर समाज को प्रतिनिधित्व का मौका मिला है। पूरा वोट बैंक हाथ में आया तो आगे की राह आसान हो सकती है। साथ ही पार्टी का भी पूरा सपोर्ट प्रत्याशी को है। इसके अलावा मुस्लिम व अन्य वोट बैंक से भी कुछ न कुछ हासिल होने की स्थिति में बात बन सकती है।
भाजपा के लिए रूठों को मनाना जरूरी
एक मंत्री पुत्र और दिग्गज स्थानीय नेता के टिकट को लेकर आमने-सामने आने के बाद बिमला बाथम को चुना गया। जिसकी वजह से न केवल वो दोनों रूठे, बल्कि और दावेदारों ने भी नाराजगी जताई है। ऐसे में इन रूठों को मनाना और साधकर रखना जरूरी है।
हालांकि, इन चुनावों का रिमोट कंट्रोल तो सांसद डॉ. महेश शर्मा के हाथों में ही रहेगा। टिकट पर रजामंदी उन्हीं की है और चुनावी मैनेजमेंट भी उन्हीं का होगा। ये और बात है कि अपनी लोकप्रियता और स्वीकार्यता को नई प्रत्याशी के हक में करना उनके लिए भी टेढ़ी खीर है। ऐसा भी माना जा रहा है कि रूठे हुए लोग जब पार्टी के मंच पर पहुंचेंगे तो टिकट न मिलने का दर्द जरूर छलकेगा।
पेशे से उद्यमी विमला बाथम ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1993 में कार्यकर्ता के तौर पर की। इसके बाद महानगर कमेटी में तमाम पदों पर रहने के बाद वह भाजपा के लघु उद्योग प्रकोष्ठ की अध्यक्ष चुनी गईं। इसके बाद वह प्रदेश कमेटी की सदस्य रहीं।
शाहजहांपुर में जन्मी विमला बाथम की ससुराल कानपुर में है, लेकिन व्यवसाय के सिलसिले में 1977 में वह नोएडा सेक्टर-34 में बस र्गईं। अमर उजाला से बातचीत में विमला बाथम ने कहा महिलाओं की सुरक्षा, बिजली, पानी, सड़क, डीएनडी टोल फ्री कराना आदि मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएंगी। युवाओं के लिए रोजगार और सभी वर्गों के लिए चिकित्सा को बेहतर कराना उनका लक्ष्य होगा।
काजल शर्मा को सपा प्रत्याशी बनाए जाने के बाद ही नोएडा विधानसभा के चुनावी समीकरण में बड़ा उलटफेर हुआ। भाजपा में दावेदारों की लंबी लिस्ट के बावजूद विमला बाथम को प्रत्याशी बनाया गया है।
ये भी कहा जा सकता है कि सपा से महिला प्रत्याशी आने के बाद भाजपा के लिए भी आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला चेहरा ढूंढना मजबूरी हो गया। अब बदली परिस्थितियों में उपचुनाव के बेहद दिलचस्प होने की उम्मीद की जा रही है।
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सपा से काजल शर्मा, कांग्रेस से राजेंद्र अवाना और भाजपा से विमला बाथम को नोएडा विधान सभा उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया जा चुका है। तीनों 27 अगस्त को नामांकन करेंगे। टिकट को लेकर सबसे ज्यादा ‘ड्रामा’ भाजपा में हुआ है। दो दिग्गज जब आमने-सामने आ गए तो तीसरे विकल्प का रास्ता चुना गया।
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दरअसल, लोकसभा के बाद विधान सभा के उपचुनाव में काफी उलटफेर दिखाई दिए हैं। उत्तराखंड, बिहार, कर्नाटक से चुनावी नतीजे यह बताते हैं कि राष्ट्रीय नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति का जोर रहा। इसीलिए नोएडा विधान सभा के प्रत्याशी अति उत्साहित हैं। दो महिला प्रत्याशी मैदान में हैं। पंडित और वैश्य बाहुल्य नोएडा के चुनावी मैदान में गुर्जरों का प्रतिनिधित्व करने वाले अकेले प्रत्याशी कांग्रेस से हैं।
अब आसान नहीं है सीट पर जीत
तीनों पार्टियों से प्रत्याशियों की घोषणा के बाद नोएडा विधानसभा सीट पर मुकाबला मुश्किल हो गया है। सपा प्रत्याशी काजल शर्मा को प्रदेश में सरकार होने का लाभ तो मिलेगा ही। इसके अलावा वह ब्राह्मण परिवार की पढ़ी-लिखी प्रत्याशी हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि भी राजनीतिक है, ये परिस्थितियां उन्हें मजबूती देती हैं। उधर, भाजपा के रूठे हुए लोगों से भी पार्टी ने भितरघात की उम्मीद बांध रखी है।
साथ ही मुस्लिम वोटों पर भी विश्वास जमा हुआ है। बात करेंगे कांग्रेस की तो लंबे समय से राजनीतिक उपेक्षा झेल रहे गुर्जर समाज को प्रतिनिधित्व का मौका मिला है। पूरा वोट बैंक हाथ में आया तो आगे की राह आसान हो सकती है। साथ ही पार्टी का भी पूरा सपोर्ट प्रत्याशी को है। इसके अलावा मुस्लिम व अन्य वोट बैंक से भी कुछ न कुछ हासिल होने की स्थिति में बात बन सकती है।
भाजपा के लिए रूठों को मनाना जरूरी
एक मंत्री पुत्र और दिग्गज स्थानीय नेता के टिकट को लेकर आमने-सामने आने के बाद बिमला बाथम को चुना गया। जिसकी वजह से न केवल वो दोनों रूठे, बल्कि और दावेदारों ने भी नाराजगी जताई है। ऐसे में इन रूठों को मनाना और साधकर रखना जरूरी है।
हालांकि, इन चुनावों का रिमोट कंट्रोल तो सांसद डॉ. महेश शर्मा के हाथों में ही रहेगा। टिकट पर रजामंदी उन्हीं की है और चुनावी मैनेजमेंट भी उन्हीं का होगा। ये और बात है कि अपनी लोकप्रियता और स्वीकार्यता को नई प्रत्याशी के हक में करना उनके लिए भी टेढ़ी खीर है। ऐसा भी माना जा रहा है कि रूठे हुए लोग जब पार्टी के मंच पर पहुंचेंगे तो टिकट न मिलने का दर्द जरूर छलकेगा।