इस मजबूरी की वजह से NCR बन रहा सरोगेट मदर्स की फैक्ट्री
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अपने घरों से दूर गुड़गांव की एक रिहाइशी इमारत में करीब 22 औरतें बहुत ही बेसब्री से उस वक्त का इंतजार कर रही हैं जब उनके पेट में पल रहा बच्चा जन्म ले।
उनका ये इंतजार उस बच्चे को देखने के लिए नहीं था बल्कि पैसों की उनकी जरूरत उन्हें बेसब्र कर रही थी। दरअसल इन औरतों के पेट में जो बच्चे पल रहे थे वो किसी और के हैं। इन औरतों ने अपनी कोख किराए पर दे रखी है जिसके लिए उन्हें पैसे मिलेंगे।
राजधानी का ये क्षेत्र और आसपास के क्षेत्र सरोगेसी (किराए की कोख) का गढ़ बन गए हैं। सरोगेसी इंडस्ट्री के इस क्षेत्र में फलने-फूलने का कारण गरीबी और कम सस्ता मेहनताना है।
एनसीआर के इन क्षेत्रों में बढ़ रही हैं सरोगेट मदर्स
सरोगेट मांओं को वंश सरोगेसी कंसल्टेंट में उनके काम के लिए 2.75 लाख से लेकर 3 लाख रुपए तक मिलते हैं। वंश सरोगेसी अपने आप को गुड़गांव का पहला सरोगेसी होम होने का दावा करती है।
कहा तो ये भी जाता है कि सरोगेट औरतें अक्सर ही उससे ज्यादा पैसा पाती हैं जितना उनसे वादा किया जाता है। अगर बच्चे जुड़वा हुए तो उनका मुआवजा बढ़ जाता है। सरोगेसी सलाहकार बताते हैं कि एनसीआर क्षेत्र में किराए की कोख बहुत ही आसानी से मिल जाती है।
एसीआर तो धीरे-धीरे सरोगेसी का हब बनता जा रहा है। गुड़गांव में उद्योग विहार, गाजियाबाद में लोनी, वजीराबाद और कापसहेड़ा औद्योगिक क्षेत्र और रोहिणी के कुछ इलाके भी सरोगेसी के लिए विख्यात हैं।
ऐसी औरतें बनती हैं सरोगेट मां
गुड़गांव स्थित वंश सरोगेसी कंसल्टेंट के बजरंग शरन का कहना है कि उन्होंने एनसीआर के उन क्षेत्रों को चिंहित किया है जहां सरोगेसी की अपार संभावनाएं हैं। इसलिए उन्होंने वहां के निवासियों से सरोगेसी के फायदे और उससे जुड़ी काउंसिलिंग भी की।
शरन बताते हैं कि उनके सरोगेसी होम में इस समय 22 सरोगेट मांएं हैं। शरन आगे कहते हैं कि वो मेहनत मजदूरी करने वाली औरतों पर ज्यादा निर्भर करते हैं क्योंकि उन्हें पैसों की जरूरत होती है। वो युवा और विवाहित होती हैं इसलिए वो अच्छी मांएं साबित होती हैं।
हालांकि पहले उन्हें इसके बारे में सबकुछ बताया जाता है। सरोगेसी में क्या-क्या रिस्क जुड़ा हुआ है वो भी बताया जाता है। शरन कहते हैं कि सरोगेट मां बनने की चाह रखने वाली केवल 50 प्रतिशत महिलाओं को ही वे चुनते हैं।
ये हैं सरोगेसी की वजहें
शरन ये भी कहते हैं कि सरोगेट मांओं की डिलीवरी आदि सभी ट्रीटमेंट अस्पताल में ही होते हैं। शरन कहते हैं कि वो महिलाओं को खाना, आवास, सामान्य मेडिकल चेकअप सब कुछ उपलब्ध कराते हैं। इन महिलाओं की किसी भी तरह की देखभाल मैक्स, फोर्टिस, सर गंगा राम, नीलकंठ, और माता चनन देवी जैसे अस्पतालों में ही होता है।
महिलाओं के लिए अपना कोख किराए पर देने के कई कारण होते हैं। इनमें भविष्य के लिए पैसा जमा करना व परिवार के किसी सदस्य का इलाज करवाना भी शामिल है। इसके साथ ही कोई अपनी बेटी के भविष्य के लिए तो कोई अपने घर के लिए व लैविश जिंदगी के लिए भी महिलाएं सरोगेसी को चुनती हैं।
बता दें कि आज कल के दौर में जहां लोग देर में शादी करते हैं और तनाव भरी जिंदगी जीते हैं जिसके कारण उनमें बच्चा ना पैदा कर पाने की समस्या होती है। यही कारण है कि आज भारत में बड़ी संख्या में सरोगेट मांओं की संख्या बढ़ रही है।
सरोगेसी की आड़ में जन्म ले रहा काला बाजार
अभी तक हमने इस क्षेत्र के सभी सुखद पहलुओं की बात की मगर सरोगेसी धीरे-धीरे व्यापार बन चुका है। पैसा कमाने का एक बड़ा जरिया बन चुका सरोगेसी के क्षेत्र में कोई नियम कानून लागू नहीं होता।
भारत में कमर्शियल सरोगेसी 2002 से शुरू हुई थी लेकिन आज तक इस क्षेत्र में कोई नियम कानून नहीं बना है। संयुक्त राष्ट्र दो साल पहले के एक अध्ययन में भारत में सरोगेसी का बाजार 400 मिलियन डॉलर से भी अधिक आंका गया था।
लेकिन इस क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि ये क्षेत्र इससे दुगना कमाऊ है। भारत में सरोगेसी को लेकर जो सबसे बड़ी परेशानी है वो इसका वैधानिक रूप से कमजोर होना है। जिसके कारण यहां काला बाजारी व बच्चों की खरीद-फरोख्त भी होने लगी है।
इसे हम इस तरह भी समझ सकते हैं कि सरोगेसी की शुरूआत में ही इसमें शामिल दोनों पक्षों के बीच एक कॉन्ट्रैक्ट होता है। लेकिन एक अध्ययन बताता है कि दिल्ली की 88 प्रतिशत और मुंबई की 76 प्रतिशत सरोगेट मांओं को इन कॉन्ट्रैक्ट के शर्तों का ही अता-पता नहीं होता।
यहां तक कि दिल्ली की 92% सरोगेट मांओं के पास तो कॉन्ट्रैक्ट की कॉपी तक नहीं होती और मुंबई में केवल 11.4% सरोगेट मांएं ही कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा होती हैं।