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यमुना एक्सप्रेसवेः ऐसे हुआ सौ करोड़ का नुकसान

Sat, 05 Jul 2014 08:15 PM IST
अरविंद सिंह/अमर उजाला, नोएडा
अरविंद सिंह/अमर उजाला, नोएडा Updated Sat, 05 Jul 2014 08:15 PM IST
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Loss of 100 crore to government tressure

ग्रेनो से आगरा तक यमुना एक्सप्रेसवे बनाने के एवज में 4100 हेक्टेयर जमीन मुफ्त में देकर निर्माणकर्ता कंपनी पर प्रदेश सरकार की मेहरबानी का खुलासा तो नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) रिपोर्ट में हो ही चुका है।

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स्टांप शुल्क से भी पूरी तरह छूट दिलवाकर उस समय सरकारी खजाने को भी कम से कम 100 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया गया।

यमुना एक्सप्रेसवे बनाने का ख्वाब सबसे पहले 2003 में तत्कालीन सरकार ने देखा। 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे के लिए निजी कंपनी को नोएडा से लेकर आगरा तक 2003 से 2007 के बीच चरणबद्ध तरीके से 4100 हेक्टेयर जमीन दी गई।
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इसमें से सिर्फ गौतमबुद्ध नगर जिले की सीमा में ही 2500 हेक्टेयर जमीन शामिल है। जिले की सीमा में करीब 40 किलोमीटर का दायरा आता है, जिसमें से 24 किलोमीटर की रेंज ग्रेटर नोएडा और 16 किलोमीटर जेवर के क्षेत्र में है।
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जमीन देने से पहले न तो लैंडयूज तय हुआ और न ही कीमत। सरकार ने जिस रूप में किसानों से ली, उसी रूप में कंपनी को ट्रांसफर कर दी। इसके बाद शासन ने एक्सप्रेसवे का निर्माण और विकास का हवाला देकर जमीन और रजिस्ट्री दोनों मुफ्त कर दी।

रजिस्ट्री के लिए 28 फरवरी 2003 में शासनादेश (संख्या-अर्द्ध.शा. पत्रांक 5194/2002-2003) और 10 अप्रैल 2003 को शासनादेश (संख्या क. नि.-5/: 1192/2003-500(22)/ 2003) जारी हुआ कि यमुना एक्सप्रेसवे के एवज में कंपनी को दी जाने वाली जमीन की रजिस्ट्री पर स्टांप शुल्क से पूरी तरह छूट है। औद्योगिक विभाग में तैनात तत्कालीन सचिव की तरफ से प्राधिकरण के तत्कालीन चेयरमैन के नाम आदेश जारी हुआ था।

नोएडा की 168 एकड़ जमीन भी कंपनी को पहले चरण में ही दी गई थी। सुल्तान पुर और बख्तावर पुर स्थित जमीनों की 28 फरवरी 2003 से लेकर 26 जुलाई 2003 के बीच कंपनी की रजिस्ट्री हुई। अगर स्टांप लगता तो रजिस्ट्री के खाते में इसी जमीन से आठ करोड़ रुपये जमा होता। इसके बाद 2350 हेक्टेयर जमीन ग्रेटर नोएडा में दी गई।

ये जमीन मिर्जापुर, ठसराना, अच्छेजा बुजुर्ग, निलौनी शाहपुर, अट्टा फतेहपुर, मूंजीखेड़ा, आच्छेपुर, अमरपुर आदि गांव शामिल हैं। अगर इसका स्टांप शुल्क देकर रजिस्ट्री होती तो कम से कम 90 करोड़ रुपये का राजस्व सरकारी खजाने में जमा होता। इतना स्टांप शुल्क तो सिर्फ गौतमबुद्ध नगर क्षेत्र में दी गई जमीन के एवज में है, जबकि मथुरा और आगरा की जमीन को जोड़ लें तो स्टांप शुल्क की धनराशि और बढ़ जाएगी।

दोबारा जारी हुआ था शासनादेश
अगस्त 2003 में सरकार बदलते ही जमीन का ट्रांसफर रुक गया था। 2007 में जब फिर से पुरानी सरकार वापस आई तो जमीनों का ट्रांसफर शुरू हो गया। 17 नवंबर 2007 को उत्तर प्रदेश सरकार के सचिव की ओर से अध्यक्ष व सीईओ ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण को फिर शासनादेश (संख्या-4363/77-4-07-227 एन/07) जारी कर कंपनी को स्टांप शुल्क से छूट दे दी गई। इस शासनादेश में परियोजना की कुल लागत 3200 करोड़ रुपये बताया गया है। जानकार बताते हैं कि पहली बार ऐसा हुआ कि कृषि जमीन पर स्टांप शुल्क माफ किया गया।


कैसे हुई 14 हजार करोड़ की लागत
2003 में यमुना एक्सप्रेसवे की योजना बनी थी तो उस दौरान इसकी लागत 2500 करोड़ रुपये थी। समय पर निर्माण न होने की बात कहकर कंपनी ने इसकी कीमत पहले छह हजार, इसके बाद नौ हजार और 2012 में इसकी कुल निर्माण की लागत 14 हजार करोड़ बताई। इसकी लंबाई भी 185 किलोमीटर हो गई। सूत्र बताते हैं कि निर्माण की लागत बढ़ने पर शासन ने भी कंपनी के प्रति काफी लचीला रुख अपनाया।

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