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आज होगा तय... किसकी शह और किसको मात

Thu, 11 Apr 2019 05:43 AM IST
vivek shukla न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: vivek shukla Updated Thu, 11 Apr 2019 05:43 AM IST
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Lok sabha election 2019 start today
लोकसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला

कैराना : भाजपा-सपा के बीच कड़ा मुकाबला

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कैराना लोकसभा सीट पर भाजपा के प्रदीप चौधरी, सपा की तबस्सुम हसन के बीच कड़ा मुकाबला है। कांग्रेस के हरेंद्र मलिक चुनाव को त्रिकोणात्मक बनाने में लगे है। 

भाजपा प्रत्याशी प्रदीप चौधरी की ताकत मोदी फैक्टर है। वह कहते हैं जनता मोदी के नाम और काम दोनों पर वोट करेगी। पीएम व सीएम की रैलियों के बाद भाजपा नेता, पूर्व सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह का टिकट कटने से गुर्जरों की नाराजगी दूर होने का दावा कर रहे हैं। भाजपा की चुनौती जाट वोट है। कांग्रेस प्रत्याशी हरेंद्र मलिक जाट हैं। दूसरे सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के कारण रालोद समर्थक जाट मतदाताओं के गठबंधन के पक्ष में चले जाने की संभावना है। 
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गठबंधन की ओर से तबस्सुम की सबसे बड़ी ताकत 5.50 लाख मुस्लिम मतदाता हैं। एससी और जाट मतों के आधार पर वह अपने समीकरण मजबूत होने का दावा कर रही हैं। 
तबस्सुम की चुनौती कांग्रेस के हरेंद्र मलिक हैं, जो मुस्लिम मतों में सेंधमारी करने की कोशिश में हैं। मलिक का कहना है कि उन्हें सर्वसमाज का वोट मिलेगा।

मेरठ : वोटरों को बूथ तक ले जाने वाले को लाभ
मेरठ लोकसभा सीट पर भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल और बसपा के हाजी याकूब कुरैशी के बीच कड़ा मुकाबला है। भाजपा मोदी के नाम व वोटों के ध्रुवीकरण से उम्मीद लगाए बैठी है तो बसपा को गठबंधन की एकता पर भरोसा है। 
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पिछले चुनाव में सपा-बसपा अलग-अलग लड़े थे। बसपा के शाहिद अखलाक को तीन लाख, सपा के शाहिद मंजूर को 2.11 वोट मिले थे। ये मिलाकर भी भाजपा उम्मीदवार से कम रह गए थे। तब मोदी लहर थी। गठबंधन का भी यही मानना है कि मतदान प्रतिशत बढ़ा तो इसका फायदा उसे ही मिलेगा। एससी और मुस्लिमों का वोट प्रतिशत 70 तक कराने का प्रयास है। राजेंद्र अग्रवाल का मानना है कि वैश्य, गुर्जर, ब्राह्मण, जाट, पंजाबी, त्यागी, पिछड़ों का वोट उन्हें मिल रहा है। हालांकि एससी और मुस्लिम वोटों का बसपा के प्रति रुझान उसके लिए चिंता का कारण है। 

कांग्रेस के हरेंद्र अग्रवाल वैश्य वोटों में सेंध लगा सकते हैं। पिछली बार भाजपा को भरपूर जाट वोट मिले थे। इस बार गठबंधन के कारण जाट वोटों में सेंध लग सकती है। भाजपा की चिंता मतदान प्रतिशत कम रहने की आशंका भी है। भाजपा प्रत्याशी की जनता से संवादहीनता व व्यवहार से नाराजगी और संगठन में भितरघात पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है।

पश्चिम यूपी की 8 सीटों के मतदाता आज करेंगे मतदान

सहारनपुर में मुस्लिमों के रुख से तय होगा हार-जीत का फैसला
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में बृहस्पतिवार को पश्चिमी यूपी की जिन आठ लोकसभा सीटों पर मतदान होगा, उनमें अधिकतर पर भाजपा व सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के उम्मीदवारों में सीधा मुकाबला है।

पहले चरण में केंद्रीय मंत्रियों वीके सिंह, महेश शर्मा व सत्यपाल सिंह की किस्मत का फैसला होना है, तो मुजफ्फरनगर में चौधरी अजित सिंह और बागपत में जयंत चौधरी का भविष्य भी इसी चरण में तय होगा। सहारनपुर, कैराना, बिजनौर व गाजियाबाद में कांग्रेस प्रत्याशी मुकाबले को त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सहारनपुर का परिणाम मुस्लिमों के रुख पर निर्भर करेगा। गठबंधन और कांग्रेस के बीच उनका ठीक-ठीक बंटवारा होने पर भाजपा की राह आसान हो सकती है। गाजियाबाद में भी कांग्रेस की डॉली शर्मा ने चुनाव को रोचक बनाया है। बिजनौर में कांग्रेस के नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने भी आखिर तक चुनावी जंग लड़ी।

मुजफ्फरनगर : जाट वोटरों को साधने में जुटे सभी प्रत्याशी
पश्चिमी यूपी में मुजफ्फरनगर हॉट सीट बनी हुई है। गठबंधन प्रत्याशी रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह और मौजूदा सांसद डॉ. संजीव बालियान में सीधी टक्कर है। दोनों प्रत्याशी जाट हैं। कांग्रेस ने उम्मीदवार नहीं उतारा है।

गठबंधन के चलते अजित सिंह को एससी, मुस्लिम वोटरों का समर्थन मिल रहा है। गठबंधन की देवबंद रैली में उनकी लामबंदी बढ़ी है। अजित के सामने जाट वोटरों का बिखराव रोकने की बड़ी चुनौती है। बीते लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर दंगे के चलते जाटों ने भाजपा के हक में वोट किया था। अजित सर्वसमाज के समर्थन का दावा कर रहे हैं।

डॉ. संजीव बालियान पांच साल के विकास कार्यों और जनता से सीधे संपर्कों का हवाला दे रहे हैं। सवर्ण व अति पिछड़ी जातियों को भाजपा अपनी ताकत मान रही है। एससी में वाल्मीकि, खटीक, कोरी, हिंदू धोबी आदि से भी भाजपा को उम्मीद है। पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ समेत कई नेताओं ने अपनी चुनावी सभाओं में दंगे का जिक्र कर ध्रुवीकरण की कोशिश की है।  

बागपत : जाटलैंड में प्रतिष्ठा और उत्तराधिकार की लड़ाई

जाटलैंड कहे जाने वाले बागपत लोकसभा क्षेत्र में केंद्रीय मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह और रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के बीच सीधा मुकाबला है। सियासी संग्राम के आखिरी पड़ाव तक भी दोनों दलों के बीच हार-जीत का गणित एकदम साफ नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का नाम लेकर भाजपा और रालोद ने मतदाताओं को लुभाने की पुरजोर कोशिश की है। देखने वाली बात यह है कि 11 अप्रैल को जनता किसके मन की बात करती है। डॉ. सत्यपाल सिंह पांच साल में कराए गए विकास कार्यों को मुद्दा बना रहे हैं। पीएम मोदी की छवि और एयर स्ट्राइक से उन्हें समर्थन की उम्मीद है।

परिणाम तय करेगा कि जाट और अनुसूचित जाति के वोट भाजपा को कितने मिलते हैं। भाजपा का गणित इन्हीं वोटों में बंटवारे पर टिका है। उधर, पहली बार बागपत से चुनाव लड़ रहे जयंत चौधरी को गठबंधन के चलते मुस्लिम, जाट और एससी वोटों के साथ आने की उम्मीद है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पौत्र जयंत चौधरी के पास भावनात्मक लगाव का कवच भी माना जा रहा है।

गाजियाबाद : त्रिकोणीय मुकाबले में घिरे जनरल
कांग्रेस की डॉली शर्मा सजातीय ब्राह्मण वोटों के साथ ही मुस्लिम और कांग्रेस के परंपरागत वोटों से उम्मीद संजोए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे   हैं कि गठबंधन और कांग्रेस  में जिसे मुस्लिमों का साथ मिलेगा, उसी का वीके सिंह से मुकाबला होगा।

गाजियाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी व केंद्रीय राज्यमंत्री जनरल (सेवानिवृत्त) वीके सिंह का सपा के सुरेश बंसल व कांग्रेस की डॉली शर्मा से मुकाबला है। 2014 के लोकसभा चुनाव में 5.67 लाख वोटों से जीतने वाले वीके सिंह पांच साल के विकास कार्यो के साथ ही मोदी लहर व राष्ट्रवाद के रथ पर सवार होकर चुनावी नैया पार करने की तैयारी में हैं। 

प्रदेश की सबसे बड़ी लोकसभा सीट पर शहरी वोटरों की बड़ी तादाद उनके पक्ष में मानी जा रही है। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन से सपा प्रत्याशी सुरेश बंसल को अनुसूचित जाति, मुस्लिम व जाटों के साथ ही सजातीय वैश्य वोटों का भरोसा है। हालांकि अनुसूचित जाति व जाट मतों में भाजपा को भी अच्छी उम्मीद है। 

गौतमबुद्ध नगर: जातीय वोटरों के सहारे सभी उम्मीदवार

बसपा सुप्रीमो मायावती के गृह जनपद की गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर केंद्रीय राज्यमंत्री व भाजपा प्रत्याशी डॉ. महेश शर्मा को गठबंधन के बसपा प्रत्याशी सतबीर गुर्जर से कड़ी चुनौती मिल रही है। पिछली बार लगभग 2.75 लाख मतों से जीते डॉ. महेश को 50 फीसदी वोट मिले थे। उन्हें शहरी मतदाताओं के साथ ही ब्राह्मण, वैश्य, राजपूत और अति पिछड़ी जातियों के भरोसे दूसरी बार जीत की उम्मीद है।

हालांकि, कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. अरविंद सिंह सजातीय राजपूत वोटों में सेंधमारी करते नजर आ रहे हैं। उन्हें कांग्रेस के परंपरागत मतदाताओं व मुस्लिमों से भी आस है। महेश शर्मा के प्रति मतदाताओं की नाराजगी को देखते हुए राजनाथ को मोदी के नाम पर वोट की अपील करनी पड़ी। गठबंधन के उम्मीवार सतबीर गुर्जर को सजातीय गुर्जरों के साथ ही अनुसूचित जाति, मुस्लिमों व रालोद के चलते जाट मतों का भरोसा है। सभी प्रत्याशियों का जोर मतदान का प्रतिशत बढ़ाने पर है। भाजपा की कोशिश है कि शहरी इलाकों में ज्यादा से ज्यादा वोट पड़े।

 बिजनौरः ध्रुवीकरण और जातीय गणित के भरोसे
बिजनौर लोकसभा सीट पर भाजपा के भारतेंद्र सिंह व बसपा के मलूक नागर के बीच मुख्य मुकाबला है। कांग्रेस के नसीमुद्दीन सिद्दीकी इसे त्रिकोणीय बनाने में जुटे हैं। भारतेंद्र को सवर्ण, सजातीय जाट वोटों के साथ अति पिछड़ों के समर्थन और मोदी फैक्टर व राष्ट्रवाद के मुद्दे पर ध्रुवीकरण की आस है। सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन से बने समीकरणों को भेदना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। 

ध्रुवीकरण से निपटने के लिए भाजपा ने बड़ी सभाएं कीं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैली में भी जोर ध्रुवीकरण पर ही रहा। गठबंधन उम्मीदवार होने के चलते मलूक नागर को मुस्लिम, अनुसूचित जाति, गुर्जर व जाट मतों के जरिये जीत का भरोसा है। वहीं, कांग्रेस के नसीमुद्दीन की नजर भी मुस्लिम व पिछड़ी जातियों के वोटरों पर है। प्रचार समाप्त होने से पहले उन्होंने प्रियंका गांधी वाड्रा का रोड शो कराकर ताकत दिखाई है। देखना है कि ऊंट किस करवट बैठेगा?

सहारनपुर: मुस्लिमों का रुख तय करेगा चुनावी हार-जीत
सहारनपुर लोकसभा सीट पर भाजपा, बसपा और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल शर्मा को फिर से ध्रुवीकरण की उम्मीद है, तो गठबंधन से बसपा प्रत्याशी फजलुर्रहमान को अनुसूचित जाति, मुस्लिम और जाट गठजोड़ पर भरोसा है। कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद को भी मुस्लिम वोटरों से बड़ी आस है। 2014 के चुनाव में मुस्लिमों का रुझान उनकी ओर रहा था और उन्हें चार लाख से ज्यादा वोट मिले थे। 

रोचक हो चुके इस मुकाबले का परिणाम इसी बात पर टिका है कि मुस्लिम किसी एक प्रत्याशी के साथ जाएंगे या फिर गठबंधन और कांग्रेस प्रत्याशी के बीच बंट जाएंगे। राघव लखनपाल ने हिंदू मतों को एकजुट करने का प्रयास किया है, लेकिन उनमें मतदान के प्रति उत्साह पैदा करना बड़ी चुनौती है। प्रत्याशी हाजी फजलुर्रहमान बसपा, सपा और रालोद के परंपरागत वोटरों के मजबूत समीकरण के सहारे चुनाव में मैदान में हैं। मुस्लिम मतों को सहेज पाना उनके लिए चुनौती बना हुआ है, तो भीम आर्मी का रुख भी उनके लिए परेशानी का सबब है। इमरान मसूद के लिए 2014 की तरह इकतरफा मुस्लिम मत हासिल करना चुनौती है।

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