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दूसरा पहलूः किसान आंदोलन में अपनों से बात, गुरबाणी और फिर हक की आवाज 

Fri, 18 Dec 2020 04:46 AM IST
दुष्यंत शर्मा किशन कुमार, नई दिल्ली 
किशन कुमार, नई दिल्ली  Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 18 Dec 2020 04:46 AM IST
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life changed of farmers who are agitating against new agricultutre law on delhi border
कृषि कानूनों का विरोध करते किसान - फोटो : amar ujala

भोर की पहली चाय के साथ अनजाने शहर में नई सुबह की शुरुआत होती है। इसके बाद दैनिक नित क्रिया करने के बाद प्रतिदिन सुबह वीडियो कॉल और कॉल के माध्यम से 5 से 10 मिनट परिवार से मुलाकात भी हो जाती है, फिर गुरबाणी कर नई ऊर्जा के साथ आंदोलन की आवाज का हिस्सा होना आंदोलनकारी बलविंदर का रुटीन बन चुका है। कुछ ऐसी ही कहानी यहां पिछले 2 सप्ताह से भी अधिक से प्रदर्शन पर डटे हुए बलविंदर की नहीं बल्कि हजारों किसानों की है जो अपने घर परिवार को छोड़कर ठंड की ठिठुरन में संघर्ष कर रहे हैं।

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सुबह होती है घर पर बात
सिंघु बॉर्डर पर आंदोलनरत किसान बलविंदर ने बताया कि सुबह 5 बजे के बाद से दिन की शुरुआत हो जाती है। इसके बाद भोर में ही परिवार से फोन पर बात हो जाती है क्योंकि, सुबह के समय शोर कम होता है। ऐसे में बात भी ठीक तरह से हो जाती है। इसके बाद नाश्ता कर प्रदर्शन में शामिल हो दिन भर सरकार के कानों तक आवाज पहुंचाने का प्रयास जारी रहता है। इसी को अपनी दिनचर्या बन लिया है।
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वहीं, लंगर सेवा में शामिल गुरप्रीत सिंह ने बताया कि वह भी प्रतिदिन सुबह 5 बजे उठ जाते हैं। इसके बाद गुरबाणी का पाठ कर प्रदर्शनकारियों के लंगर की व्यवस्था में जुट जाते हैं। गुरप्रीत सिंह ने कहा कि कोई भी भूखा पेट मंच पर नहीं बैठ सकता। ऐसे में यह उनकी जिम्मेदारी है कि प्रत्येक प्रदर्शनकारी भूखा न रहे। यही वजह है कि सुबह से ही नाश्ते से शुरू हुआ सफर देर रात तक खाने पर खत्म होता है।
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रिश्तों की नई डोर
इसके बाद खुद लंगर खाकर फिर अपने अस्थायी ठिकाना बने ट्रॉलियों का रुख किया जाता है। गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि पंजाब से केवल 1 दिन के लिए यहां प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे, लेकिन अब यहां आकर अन्य लोगों परिवार की तरह इतने घुल मिल गए हैं कि यहां दूसरा परिवार बन गया है। यही वजह है कि अब यहां से जाने का भी मन नहीं करता है। 

लंगर सेवा में शामिल मनप्रीत सिंह ढिल्लों ने कहा कि पंजाब के अमृतसर से अपने साथ कुछ हलवाइयों को भी ले आए थे, जो यहां बिना किसी पैसे के सेवा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैसे तो 10 बजे तक सभी को खाना खिला दिया जाता है, लेकिन इसके बाद भी कोई देर रात तक भी आता है तो उसे भी खाना परोसा जाता है।


प्रदर्शन में शामिल एक अन्य सेवादार सरदार मलखान सिंह ने कहा कि सभी लोगों को अपनी जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी मंच के आसपास सफाई करने की है। इस वजह से सुबह अन्य लोगों के साथ 5 बजे वह भी जिम्मेदारी के लिए तैयार हो जाते हैं, जिसके बाद ओस की बूंदों को साफ करने के साथ दिन भर की रैलियों को लेकर तैयारी की जाती है। इसमें ही पूरा दिन निकल जाता है और रात तक थकान होने तक फिर नींद अपने आगोश में ले लेती है। 

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