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ईपीएफओ की ब्याज दर पर झुकने को तैयार नहीं श्रम मंत्रालय
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
Updated Fri, 29 Apr 2016 09:32 AM IST
सार
- मंत्रालय ईपीएफओ पर 8.80 फीसदी के पक्ष में
- केंद्रीय वित्त मंत्रालय से बातचीत कर निकाला जाएगा बीच का रास्ता
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केंद्रीय श्रम एवं रोजगार राज्यमंत्री बंडारू दत्तात्रेय
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) पर ब्याज के प्रस्ताव में कटौती के खिलाफ श्रमिक यूनियनों की नाराजगी को देखते हुए श्रम एवं रोजगार मंत्रालय इस कटौती के खिलाफ है।
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केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री केंद्रीय बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) ने 8.8 फीसदी ब्याज दर का प्रस्ताव दिया था। इसे लेकर वित्त मंत्रालय से बातचीत का हल निकाला जाएगा। ये बात बृहस्पतिवार को केंद्रीय मंत्री आईटीआई में मॉडल करियर सेंटर का उद्घाटन करने के बाद पत्रकारों से बातचीत में कही।
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उन्होंने बताया कि सीबीटी के चेयरमैन होने के नाते इस मुद्दे को लेकर गंभीरता से लिया जा रहा है। लगातार वित्त मंत्रालय से बातचीत की जा रही है। ट्रेड यूनियनों ने 9-10 फीसदी की मांग की थी, लेकिन इस पर सीबीटी ने 8.8 फीसदी की अनुसंशा की है।
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श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि मंत्रालय वित्त मंत्रालय के फैसले की समीक्षा चाहेगा क्योंकि ईपीएफओ के पास 2015-16 के लिए ऊंचा रिटर्न देने के लिए पर्याप्त आय है। वित्त मंत्रालय की आपत्ति को लेकर सीबीटी की सभी रिपोर्ट को लेकर दोबारा से समीक्षा की जाएगी। और देखा जाएगा कि कितनी रकम सरप्लस में है। इसके बाद दोबारा से सुझाव दिया जाएगा।
बता दे कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) ने 2015-16 के लिए 8.8 प्रतिशत की दर से के ब्याज देने का प्रस्ताव किया था। वित्त मंत्रालय ने इसे 8.7 प्रतिशत कर दिया है।
कर्मचारी यूनियनों ने वित्त मंत्रालय के इस फैसले के खिलाफ 29 अप्रैल को राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। इससे पिछले वित्त वर्ष में ईपीएफ पर 8.75 प्रतिशत का ब्याज दिया गया था। इसे देखते हुए अब रोजगार मंत्रालय अब अपने कर्मचारियों के पक्ष मेें है और बंडारू दत्तात्रेय के रूख से साफ है कि इस मामले को लेकर रोजगार मंत्रालय वित्त मंत्रालय के आगे झुकने को तैयार नहीं है।
पहला अवसर है जब वित्त मंत्रालय ने ईपीएफओ के सीबीटी के फैसले को दरकिनार करते हुए अंशधारकों को देय ब्याज में कमी की है। वहीं श्रमिक संगठनों की लगभग एक राय है कि वित्त मंत्रालय का उक्त फैसला कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की स्वायत्तता में हस्तक्षेप है।