फर्जी डिग्री पर मंत्री से केजरीवाल ने मांगा जवाब
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गौरतलब है कि आज जहां भाजपा और कांग्रेस ने उनके इस्तीफे की मांग की है वहीं दिल्ली से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मामले में तोमर से जवाब तलब किया है।
सूत्रों का कहना है कि तोमर का पक्ष जानने के बाद केजरीवाल फैसला करेंगे कि उन्हें मंत्रिमंडल में रखा जाए या नहीं। वहीं कुछ देर पहले हुई प्रेस कांफ्रेंस में तोमर ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए अपनी डिग्री को बिल्कुल सही बताया और कहा कि अदालत की कार्रवाई के बाद सब सच सामने आ जाएगा।
तोमर को नहीं किसी अन्य के नाम है डिग्री
आम आदमी पार्टी (आप) यानि दिल्ली सरकार के कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर की मुश्किलें बढ़ गई है। दिल्ली स्थित विश्वविद्यालय ने हाईकोर्ट को बताया कि तोमर द्वारा पेश एलएलबी का प्रोविजनल प्रमाणपत्र फर्जी है और उनके रिकार्ड में तोमर नाम से ऐसा कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया।
न्यायामूर्ति राजीव शक्धर के समक्ष बिहार स्थित तिलक माझी भागलपुर विश्वविद्यालय के निरीक्षक मनिन्द्र कुमार सिंह ने शपथपत्र सहित पेश जवाब में कहा कि जांच में पता चला है कि तोमर ने 18 मई 2001 को रजिस्ट्रार राजेन्द्र प्रसाद सिंह के हस्ताक्षर से जारी प्रोविजनल प्रमाणपत्र नंबर 3687 को अपना दिखाया है। इसमें तोमर को द्वितीय श्रेणी में पास दिखाया गया है।
उन्होंने कहा कि इस नंबर का प्रमाणपत्र तोमर को नहीं बल्कि 29 जुलाई 1999 को किसी अन्य संजय कुमार चौधरी को बीए आनर्स पोलिटीकल साईंस की परीक्षा के लिए जारी किया गया है।
इतना ही नहीं यह प्रमाणपत्र राजेन्द्र प्रसाद के हस्ताक्षर से नहीं बल्कि डा.मोहम्द गुलाम मुस्तफा के हस्ताक्षर से जारी किया गया था। स्पष्ट है कि प्रमाणपत्र फर्जी है और जाली हस्ताक्षर से बनाया गया था।
तोमर को कभी नहीं मिला प्रमाणपत्र
उन्होंने कहा कि तोमर ने स्वयं को एलएलबी डिग्री धारक दिखाते हुए बार काउंसिल आफ इंडिया से पंजीकृत करवाया और स्वयं को हाईकोर्ट में नियमित बतौर अधिवक्ता प्रैक्टिस दर्शाया। यह सब फर्जीवाडे से किया गया है। उन्होंने कहा कि तोमर को कभी भी प्रोविजनल प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया।
वहीं सुनवाई के दौरान तोमर की और से वरिष्ठ अधिवक्ता एएस चंडियोक व हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव खोसला पेश हुए।
दूसरी तरफ तोमर से विधानसभा चुनाव हारने वाले भाजपा नेता नंद किशोर गर्ग की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन शर्मा, विजय जोशी, नीरज कुमार व सुशील पांडे पेश हुए व आवेदन दायर कर उनको मामले में पक्ष बनाने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा यह मामला काफी गंभीर है और तोमर दिल्ली सरकार में कानून मंत्री है। ऐसे में उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
अदालत की सहायत के लिए न्याय मित्र नियुक्त
न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राज शेखर राव को अदालत का न्याय मित्र नियुक्त किया है।
अदालत ने उन्हें पूरे मामले का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट देने को कहा है कि इस मामले में क्या-क्या कार्रवाई की जा सकती है।
वहीं अदालत ने दिल्ली बार काउंसिल आफ दिल्ली को भी अपनी जांच जल्द से जल्द पूरी कर अदालत के समक्ष 20 अगसत तक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
वकील भिडे़
कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर की और से अधिवक्ता राजीच खोसला के पेश होने पर कई वकीलों ने आपत्ति जताई। अधिवक्ता नीरज ने खोसला से सवाल किया कि यह मामला बार काउंसिल आफ दिल्ली के पास भी विचाराधीन है और वे काउंसिल के सदस्य है।
ऐसे में उनके तोमर की और से पेश होने पर गलत संदेश जाएगा और काउंसिल की विश्वनीयता भी कम होगी। खोसला ने कहा कि तोमर ने वकीलों के कल्याण की योजना बनाने का आश्वासन दिया है इसी कारण वे पेश हुए है। अधिवक्ता नीरज ने कहा कि कल दाऊद भी कुछ देगा तो क्या उसे माफ कर देंगे।
अदालत ने हालही में इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया, जितेन्द्र तोमर, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, दिल्ली बार काउंसिल, चुनाव आयोग, टीएम भागलपुर विश्वविद्यालय, अवध विश्वविद्यालय व विश्वनाथ सिंह इंस्टीटयूट ऑफ लीगल स्टडीज कॉलेज को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
क्या है मामला
याची संतोष शर्मा ने दायर याचिका में आरोप लगाया है कि तोमर ने अवध विश्वविद्यालय से नकली स्नातक की डिग्री के आधार पर भागलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध विश्वनाथ सिंह इंस्टीटयूट ऑफ लीगल स्टडीज कॉलेज में दाखिला ले लिया था। उन्होंने कहा कानून की डिग्री लेने के बाद उसने दिल्ली बार काउंसिल में बतौर अधिवक्ता पंजीकरण करवा लिया।
उन्होंने याचिका में कहा था कि आरटीआई के जवाब में डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय-फैजाबाद के परीक्षा नियंत्रक ने 22 जनवरी 2015 को पत्र भेज कर स्पष्ट किया है कि जांच के बाद स्पष्ट हुआ है कि तोमर की उपाधी, अंकपत्र एवं अनुक्रमांक पूर्णतया फर्जी है।
ऐसे में उनका पंजीकरण रद्द कर तोमर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। बाद में याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की इजाजत मांगी लेकिन अदालत ने उनके आग्रह को खारिज कर दिया।