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Delhi NCR News: कैंसर से जंग में नहीं टूटा हौसला, अब नए अंदाज में जी रहीं कमलजीत
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मिसाल : 20 साल पहले सर्वाइकल कैंसर ने बदल दी थी जिंदगी, आज 55 की उम्र में ट्रायथलॉन और साइक्लोथॉन में ले रही हैं हिस्सा
अमर उजाला ब्यूरो
पूर्वी दिल्ली। जिस घर में कभी बच्चों की पढ़ाई, उनके भविष्य और रोजमर्रा की खुशियों की बातें होती थीं, वहां एक दिन कैंसर के इलाज और जिंदगी की अनिश्चितताओं ने जगह ले ली। करीब 20 साल पहले कमलजीत बिस्ला को सर्वाइकल कैंसर होने का पता चला तो उनकी दुनिया जैसे थम गई। आज 55 साल की उम्र में वही कमलजीत ट्रायथलॉन और साइक्लोथॉन जैसी खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर जिंदगी को नए उत्साह और हौसले के साथ जी रही हैं।
कमलजीत उन दिनों को याद करते हुए कहती हैं, बेटी महज नौ साल की थी और बेटा सात साल का। बीमारी से लड़ने की चुनौती के साथ बच्चों के भविष्य की चिंता भी मुझे भीतर तक झकझोर रही थी। परिवार भी इस सदमे से अछूता नहीं रहा। पति खामोश रहने लगे, मां प्रार्थनाओं में जुट गईं और सास भावुक रहने लगीं। ऐसे मुश्किल वक्त में बहनों का साथ उनके लिए संबल बना। इलाज और भावनात्मक संघर्ष के उस दौर से गुजरते हुए मैंने हार नहीं मानी।
लक्षणों को नजरअंदाज करना पड़ा भारी
कमलजीत को पीरियड्स के बीच और शारीरिक संबंध के दौरान हल्का खून आने की समस्या हुई थी। शुरुआत में उन्होंने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन परेशानी दोबारा होने पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह ली। पहली पैप स्मीयर जांच सामान्य आई, फिर भी डॉक्टर ने आगे की जांच कराने की सलाह दी। इसके बाद बायोप्सी से कैंसर की पुष्टि हुई। उनका अनुभव बताता है कि शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पीरियड्स के बीच रक्तस्राव या शारीरिक संबंध के दौरान खून आने जैसी समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। जांच सामान्य आने के बावजूद लक्षण बने रहें तो दोबारा चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए।
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मरीज के साथ परिवार को भी सहारे की जरूरत
दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की डॉ. प्रज्ञा शुक्ला के मुताबिक, कैंसर का असर केवल मरीज पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार पर पड़ता है। मरीज की देखभाल के कारण नौकरी, आमदनी और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में मरीज के साथ परिजनों को भी मानसिक सहारे और काउंसलिंग की जरूरत होती है। उन्होंने बताया कि कैंसर छूने या मरीज के साथ रहने से नहीं फैलता। इसलिए मरीज के प्रति संवेदनशीलता और सहयोग बनाए रखना जरूरी है।
बीमारी के बाद जिंदगी को नई उड़ान
कैंसर से जूझने के करीब दो दशक बाद कमलजीत बिस्ला आज खेलों में अपनी क्षमता दिखा रही हैं। 55 साल की उम्र में वह ट्रायथलॉन और साइक्लोथॉन में हिस्सा लेती हैं। तैराकी के साथ वह आयरनमैन प्रतियोगिता की तैयारी भी कर चुकी हैं। उनकी कहानी बताती है कि सही इलाज, आत्मविश्वास और अपनों का साथ मुश्किल दौर से उबरने में अहम भूमिका निभा सकता है। बीमारी जिंदगी की राह में चुनौती जरूर बन सकती है, लेकिन हौसले के साथ आगे बढ़ने का रास्ता भी खुला रहता है।
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अमर उजाला ब्यूरो
पूर्वी दिल्ली। जिस घर में कभी बच्चों की पढ़ाई, उनके भविष्य और रोजमर्रा की खुशियों की बातें होती थीं, वहां एक दिन कैंसर के इलाज और जिंदगी की अनिश्चितताओं ने जगह ले ली। करीब 20 साल पहले कमलजीत बिस्ला को सर्वाइकल कैंसर होने का पता चला तो उनकी दुनिया जैसे थम गई। आज 55 साल की उम्र में वही कमलजीत ट्रायथलॉन और साइक्लोथॉन जैसी खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर जिंदगी को नए उत्साह और हौसले के साथ जी रही हैं।
कमलजीत उन दिनों को याद करते हुए कहती हैं, बेटी महज नौ साल की थी और बेटा सात साल का। बीमारी से लड़ने की चुनौती के साथ बच्चों के भविष्य की चिंता भी मुझे भीतर तक झकझोर रही थी। परिवार भी इस सदमे से अछूता नहीं रहा। पति खामोश रहने लगे, मां प्रार्थनाओं में जुट गईं और सास भावुक रहने लगीं। ऐसे मुश्किल वक्त में बहनों का साथ उनके लिए संबल बना। इलाज और भावनात्मक संघर्ष के उस दौर से गुजरते हुए मैंने हार नहीं मानी।
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लक्षणों को नजरअंदाज करना पड़ा भारी
कमलजीत को पीरियड्स के बीच और शारीरिक संबंध के दौरान हल्का खून आने की समस्या हुई थी। शुरुआत में उन्होंने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन परेशानी दोबारा होने पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह ली। पहली पैप स्मीयर जांच सामान्य आई, फिर भी डॉक्टर ने आगे की जांच कराने की सलाह दी। इसके बाद बायोप्सी से कैंसर की पुष्टि हुई। उनका अनुभव बताता है कि शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पीरियड्स के बीच रक्तस्राव या शारीरिक संबंध के दौरान खून आने जैसी समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। जांच सामान्य आने के बावजूद लक्षण बने रहें तो दोबारा चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए।
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मरीज के साथ परिवार को भी सहारे की जरूरत
दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की डॉ. प्रज्ञा शुक्ला के मुताबिक, कैंसर का असर केवल मरीज पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार पर पड़ता है। मरीज की देखभाल के कारण नौकरी, आमदनी और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में मरीज के साथ परिजनों को भी मानसिक सहारे और काउंसलिंग की जरूरत होती है। उन्होंने बताया कि कैंसर छूने या मरीज के साथ रहने से नहीं फैलता। इसलिए मरीज के प्रति संवेदनशीलता और सहयोग बनाए रखना जरूरी है।
बीमारी के बाद जिंदगी को नई उड़ान
कैंसर से जूझने के करीब दो दशक बाद कमलजीत बिस्ला आज खेलों में अपनी क्षमता दिखा रही हैं। 55 साल की उम्र में वह ट्रायथलॉन और साइक्लोथॉन में हिस्सा लेती हैं। तैराकी के साथ वह आयरनमैन प्रतियोगिता की तैयारी भी कर चुकी हैं। उनकी कहानी बताती है कि सही इलाज, आत्मविश्वास और अपनों का साथ मुश्किल दौर से उबरने में अहम भूमिका निभा सकता है। बीमारी जिंदगी की राह में चुनौती जरूर बन सकती है, लेकिन हौसले के साथ आगे बढ़ने का रास्ता भी खुला रहता है।