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Delhi NCR News: कैंसर पीड़ित उज्बेकिस्तान की बच्चे के लिए बना ग्रीन कॉरिडोर
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11 वर्षीय बच्ची के बोन कैंसर के इलाज में दो अस्पतालों के डॉक्टरों ने मिलकर अपनाई जटिल प्रक्रिया
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। बोन कैंसर से जूझ रही उज्बेकिस्तान की 11 वर्षीय बच्ची के पैर को बचाने के लिए डॉक्टरों ने जटिल और समन्वित उपचार प्रक्रिया शुरू की है। बच्ची की बाईं जांघ की फीमर हड्डी में ऑस्टियोसारकोमा है। कैंसर प्रभावित हड्डी के हिस्से को शरीर से निकालकर रेडिएशन उपचार के लिए दूसरे अस्पताल भेजा गया। हड्डी को सुरक्षित और समय पर पहुंचाने के लिए दोनों अस्पतालों के बीच विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया।
बच्ची की उज्बेकिस्तान में कीमोथेरेपी के आठ राउंड हो चुके थे। भारत में जांच के बाद डॉक्टरों ने पैर बचाने वाली सर्जरी का निर्णय लिया। इसके तहत प्रभावित हड्डी को निकालकर दूसरे अस्पताल में रेडिएशन दिया जाएगा। उपचार के बाद इसी हड्डी को वापस लाकर बच्ची की फीमर में दोबारा प्रत्यारोपित किया जाएगा।
पूरी प्रक्रिया में दोनों अस्पतालों की मेडिकल टीमों ने आपसी तालमेल से हड्डी के सुरक्षित और समयबद्ध परिवहन की व्यवस्था की। एक अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. आशीष चौधरी ने कहा कि ऐसे जटिल मामलों में विशेषज्ञों और अस्पतालों के बीच समन्वय बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रीन कॉरिडोर के जरिए हड्डी को दूसरे अस्पताल तक सुरक्षित पहुंचाना इसी समन्वित उपचार प्रक्रिया का हिस्सा है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। बोन कैंसर से जूझ रही उज्बेकिस्तान की 11 वर्षीय बच्ची के पैर को बचाने के लिए डॉक्टरों ने जटिल और समन्वित उपचार प्रक्रिया शुरू की है। बच्ची की बाईं जांघ की फीमर हड्डी में ऑस्टियोसारकोमा है। कैंसर प्रभावित हड्डी के हिस्से को शरीर से निकालकर रेडिएशन उपचार के लिए दूसरे अस्पताल भेजा गया। हड्डी को सुरक्षित और समय पर पहुंचाने के लिए दोनों अस्पतालों के बीच विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया।
बच्ची की उज्बेकिस्तान में कीमोथेरेपी के आठ राउंड हो चुके थे। भारत में जांच के बाद डॉक्टरों ने पैर बचाने वाली सर्जरी का निर्णय लिया। इसके तहत प्रभावित हड्डी को निकालकर दूसरे अस्पताल में रेडिएशन दिया जाएगा। उपचार के बाद इसी हड्डी को वापस लाकर बच्ची की फीमर में दोबारा प्रत्यारोपित किया जाएगा।
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पूरी प्रक्रिया में दोनों अस्पतालों की मेडिकल टीमों ने आपसी तालमेल से हड्डी के सुरक्षित और समयबद्ध परिवहन की व्यवस्था की। एक अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. आशीष चौधरी ने कहा कि ऐसे जटिल मामलों में विशेषज्ञों और अस्पतालों के बीच समन्वय बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रीन कॉरिडोर के जरिए हड्डी को दूसरे अस्पताल तक सुरक्षित पहुंचाना इसी समन्वित उपचार प्रक्रिया का हिस्सा है।
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