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साहित्यकारों से गुलजार हूं... मैं कविनगर हूं
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कविनगर का जयशंकर प्रसाद उद्यान।
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साहित्यकारों से गुलजार हूं... मैं कविनगर हूं
गाजियाबाद। शहर में एक ऐेसी कॉलोनी भी है जो हिंदी के कवियों और साहित्यकारों से गुलजार है। यहां साहित्यकारों की मंडली लगती है। बात कविनगर की हो रही है। कविनगर की गलियों में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कुंवर बेचैन की यादें जिंदा हैं। साहित्यकार से.रा यात्री यहां रहते हैं। कई और बड़े नाम हैं जो यहां के बाशिंदे हैं। कविनगर और साहित्यकार एक-दूसरे की पहचान बन चुके हैं। साहित्यकारों के नाम पर कॉलोनी के पार्क और सड़कों के नाम रखे गए। कविनगर के नामकरण की कहानी करीब छह दशक पुरानी है।
साहित्यकारों ने सुझाया था नाम
से.रा यात्री के मुताबिक 1959 में उन्होंने एमएमएच कॉलेज बतौर लेक्चरर ज्वाइन किया था। तब वह गांधीनगर क्षेत्र में रहते थे और कई कवि जैसे प्रेमनाथ शर्मा, कुंवर बेचैन, मधु भारती, कन्हैयालाल मत्र, योगेंद्र दत्त शर्मा, सूर्यप्रकाश विद्यालंकार सहित कई साहित्यकार और लेक्चरर भी आसपास रहते थे। उस दौरान जीडीए के प्रशासक कुदेशिया थे। उनके बच्चे एमएमएच कॉलेज में पढ़ते थे। बजरिया के एक दुकान पर साहित्यकारों की चौपाल लगा करती थी। एक दिन चौपाल में कुदेशिया साहब ने चर्चा की और कहा कि इस क्षेत्र में इतने कवि और साहित्यकार रहते हैं तो क्यों न आसपास कुछ किया जाए। उस समय यह कॉलोनी बसाई जा रही थी। सभी के सुझाव पर क्षेत्र का नाम कविनगर रखा गया और सड़कों के और पार्कों के नाम हिंदी साहित्यकारों और कवियों के नाम पर रखे गए।
तात्कालिक डीएम ने साहित्यकारों से मांगा था सुझाव
प्रसिद्ध साहित्यकार कवियत्री रमा सिंह ने बताया कि वह कविनगर में 1979 में आईं। उससे पहले से से.रा यात्री, कुंवर बेचैन और अन्य साहित्यकार यहां रहते थे। तब कविनगर नाम रखा जा चुका था। उसके बाद 1980 के लगभग डीएम पी जार्ज जोसफ थे। उस वक्त साहित्यकारों और शिक्षाविदें को बैठक में बुलाया जाता था और सुझाव लिए जाते थे। उन्होंने हमें बुलाया था और हम सभी ने सड़कों के नाम कवियों और साहित्यकारों के नाम पर सुझाए थे, जिसमें एम ब्लॉक का नाम रहीम दास मार्ग रखा गया। इसके अलावा मीराबाई, रैदास, कबीर सहित अन्य नाम रखे गए थे। जरूरत है कि फिर से इनके बोर्ड लगाए जाएं और पोस्टल एड्रेस में इनके नाम दर्ज कराए जाएं।
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बनी थी नामकरण समिति
पार्षद विजय मोहन ने बताया कि 2008 में नगर निगम नामकरण समिति बनाई गई थी। वह अध्यक्ष थे। कवियों को सम्मान देने के लिए यहां की सड़कों और पार्कों को कवियों के नाम पर रखा गया था और राजनगर में राजाओं को सम्मान देने के लिए राजनगर नाम रखा गया था और सड़कों के नाम भी राजाओं के नाम पर रखे गए थे। कलक्ट्रेट की तरफ जाने वाले मार्ग का नाम मीराबाई मार्ग था। बाद में बदलकर बीएन शर्मा के नाम पर रख दिया गया।
इनके नाम पर सड़क
कविनगर में सड़कों के नाम मीराबाई, रहीमदास, तुलसीदार, सूरदास, रविंद्रनाथ टैगोर, कबीरदास, जयशंकर प्रसाद के नाम पर रखे गए थे। कई पार्कों में और सड़कों पर तो अभी भी इन साहित्यकारों के नाम हैं, लेकिन बाद में कुछ मार्ग और पार्कों के नाम बदल भी दिए गए।
जीडीए पहले था ट्रस्ट
जीडीए के पूर्व अधिकारी राजेंद्र त्यागी ने बताया कि 1977 तक गाजियाबाद विकास प्राधिकरण गाजियाबाद इंप्रवूमेंट ट्रस्ट के नाम से जाना जाता था। यह ट्रस्ट 1958 में बना था। नौ मार्च 1977 तक था। उसके बाद गाजियाबाद प्राधिकरण बना।
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गाजियाबाद। शहर में एक ऐेसी कॉलोनी भी है जो हिंदी के कवियों और साहित्यकारों से गुलजार है। यहां साहित्यकारों की मंडली लगती है। बात कविनगर की हो रही है। कविनगर की गलियों में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कुंवर बेचैन की यादें जिंदा हैं। साहित्यकार से.रा यात्री यहां रहते हैं। कई और बड़े नाम हैं जो यहां के बाशिंदे हैं। कविनगर और साहित्यकार एक-दूसरे की पहचान बन चुके हैं। साहित्यकारों के नाम पर कॉलोनी के पार्क और सड़कों के नाम रखे गए। कविनगर के नामकरण की कहानी करीब छह दशक पुरानी है।
साहित्यकारों ने सुझाया था नाम
से.रा यात्री के मुताबिक 1959 में उन्होंने एमएमएच कॉलेज बतौर लेक्चरर ज्वाइन किया था। तब वह गांधीनगर क्षेत्र में रहते थे और कई कवि जैसे प्रेमनाथ शर्मा, कुंवर बेचैन, मधु भारती, कन्हैयालाल मत्र, योगेंद्र दत्त शर्मा, सूर्यप्रकाश विद्यालंकार सहित कई साहित्यकार और लेक्चरर भी आसपास रहते थे। उस दौरान जीडीए के प्रशासक कुदेशिया थे। उनके बच्चे एमएमएच कॉलेज में पढ़ते थे। बजरिया के एक दुकान पर साहित्यकारों की चौपाल लगा करती थी। एक दिन चौपाल में कुदेशिया साहब ने चर्चा की और कहा कि इस क्षेत्र में इतने कवि और साहित्यकार रहते हैं तो क्यों न आसपास कुछ किया जाए। उस समय यह कॉलोनी बसाई जा रही थी। सभी के सुझाव पर क्षेत्र का नाम कविनगर रखा गया और सड़कों के और पार्कों के नाम हिंदी साहित्यकारों और कवियों के नाम पर रखे गए।
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तात्कालिक डीएम ने साहित्यकारों से मांगा था सुझाव
प्रसिद्ध साहित्यकार कवियत्री रमा सिंह ने बताया कि वह कविनगर में 1979 में आईं। उससे पहले से से.रा यात्री, कुंवर बेचैन और अन्य साहित्यकार यहां रहते थे। तब कविनगर नाम रखा जा चुका था। उसके बाद 1980 के लगभग डीएम पी जार्ज जोसफ थे। उस वक्त साहित्यकारों और शिक्षाविदें को बैठक में बुलाया जाता था और सुझाव लिए जाते थे। उन्होंने हमें बुलाया था और हम सभी ने सड़कों के नाम कवियों और साहित्यकारों के नाम पर सुझाए थे, जिसमें एम ब्लॉक का नाम रहीम दास मार्ग रखा गया। इसके अलावा मीराबाई, रैदास, कबीर सहित अन्य नाम रखे गए थे। जरूरत है कि फिर से इनके बोर्ड लगाए जाएं और पोस्टल एड्रेस में इनके नाम दर्ज कराए जाएं।
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बनी थी नामकरण समिति
पार्षद विजय मोहन ने बताया कि 2008 में नगर निगम नामकरण समिति बनाई गई थी। वह अध्यक्ष थे। कवियों को सम्मान देने के लिए यहां की सड़कों और पार्कों को कवियों के नाम पर रखा गया था और राजनगर में राजाओं को सम्मान देने के लिए राजनगर नाम रखा गया था और सड़कों के नाम भी राजाओं के नाम पर रखे गए थे। कलक्ट्रेट की तरफ जाने वाले मार्ग का नाम मीराबाई मार्ग था। बाद में बदलकर बीएन शर्मा के नाम पर रख दिया गया।
इनके नाम पर सड़क
कविनगर में सड़कों के नाम मीराबाई, रहीमदास, तुलसीदार, सूरदास, रविंद्रनाथ टैगोर, कबीरदास, जयशंकर प्रसाद के नाम पर रखे गए थे। कई पार्कों में और सड़कों पर तो अभी भी इन साहित्यकारों के नाम हैं, लेकिन बाद में कुछ मार्ग और पार्कों के नाम बदल भी दिए गए।
जीडीए पहले था ट्रस्ट
जीडीए के पूर्व अधिकारी राजेंद्र त्यागी ने बताया कि 1977 तक गाजियाबाद विकास प्राधिकरण गाजियाबाद इंप्रवूमेंट ट्रस्ट के नाम से जाना जाता था। यह ट्रस्ट 1958 में बना था। नौ मार्च 1977 तक था। उसके बाद गाजियाबाद प्राधिकरण बना।