Ghaziabad News: कंप्यूटर पर वायरस भेज की 200 करोड़ की ठगी, नौ शातिरों को क्राइम ब्रांच ने किया गिरफ्तार
पकड़े गए ठग अमेरिका के नागरिकों को ई-मेल भेजकर उनके कंप्यूटर में वायरस डाल देते थे। इसके बाद कंप्यूटर को ठीक करने का झांसा देकर वह लोगों के बैंक खाते खाली कर देते थे।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अमेरिका में लोगों के कंप्यूटर पर वायरस भेजकर ठगी करने वाले गिरोह के नौ शातिरों को क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया है। पकड़े गए ठग अमेरिका के नागरिकों को ई-मेल भेजकर उनके कंप्यूटर में वायरस डाल देते थे। इसके बाद कंप्यूटर को ठीक करने का झांसा देकर वह लोगों के बैंक खाते खाली कर देते थे। यह गैंग अब तक 500 लोगों से 200 करोड़ से ज्यादा की रकम ठग चुका है। ठगी की रकम यह गैंग पहले चीन के बैंक खातों में भेजते थे। वहां से खाता ऑपरेट करने वाला व्यक्ति उन्हें भारत में नकद कमीशन देता था।
एडीसीपी क्राइम ज्ञानेंद्र सिंह ने बताया कि ठगी करने के आरोप में पकड़े गए नौ लोग झारखंड रांची के सिल्ली का रहने वाले जितेंद्र कुमार, बारहसात बंगाल निवासी दीपेन महाजन व तमाल आचार्य, डीएलएफ साहिबाबाद निवासी मोहम्मद अहसान, पश्चिम बंगाल निवासी डोनेमिक व रोहन घोष, यमुनानगर हरियाणा निवासी प्रियांक, राजेंद्र नगर साहिबाबाद निवासी अंकित नागपाल और मुजफ्फरनगर निवासी राहुल है। उन्होंने बताया कि जितेंद्र आईटी सेक्टर का एक्सपर्ट है और वही वायरस भेजता था। अन्य सभी आरोपी 8वीं से 10वीं पास हैं लेकिन इनमें से कई फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं। कंप्यूटर में वायरस की जानकारी देने के लिए वह अमेरिका के लोगों से अंग्रेजी में ही बात करते थे। उन्होंने बताया कि यह गैंग एडीआरएफ रोड पर रईसपुर के पास एक ऑफिस किराये पर लेकर ठगी का कॉल सेंटर चला रहे थे। सूचना मिलने पर क्राइम ब्रांच की टीम ने उन्हें गिरफ्तार किया।
गैंग का मास्टमाइंड देता था नागरिकों का डाटा
एसीपी क्राइम ब्रांच भास्कर वर्मा ने बताया कि इस गैंग का मास्टरमाइंड दिल्ली में रहता है और फिलहाल फरार है। वह इस गैंग के लोगों को अमेरिकी नागरिकों के ई-मेल आईडी, मोबाइल नंबर, नाम समेत अन्य डाटा उपलब्ध कराता था। इसके बाद वह अपने काम को अंजाम देते थे। इस गैंग में काम करने वाले लोगों को पहले तकनीकी और अंग्रेजी बोलने की ट्रेनिंग दी जाती थी। गैंग में हर सदस्य का काम बंटा हुआ था। वह खुद की आईटी कंपनी बताकर कंप्यूटर को ठीक करने की सर्विस देने का झांसा देते थे। अगर कोई सदस्य किसी बात का सही से जवाब नहीं दे पाता था तो वह अपने सीनियर से बात कराने का बहाना बनाकर गैंग के दूसरे सदस्य को कॉल पर बुला लेते थे।
ऐसे करते थे ठगी
ठगी करने वाले गिरोह के सदस्य सबसे पहले डाटा लेकर अमेरिकी नागरिकों को ई-मेल या कोई लिंक भेजते थे। इस लिंक पर क्लिक करते ही उनके लैपटॉप या कंप्यूटर के कई एप्लीकेशन डिलीट हो जाते थे और कंप्यूटर स्लो हो जाता था। इसके कुछ देर बाद वह वर्चुअल नंबरों से फोन करके संबंधित व्यक्ति को जानकारी देते थे कि उनका कंप्यूटर स्लो हो गया है। इसके बाद वह कंप्यूटर को ठीक करने का झांसा देते थे। अपनी फीस भी तय कर लेते थे। सब कुछ तय हो जाने के बाद रिमोट एप के जरिए उनका कंप्यूटर खुद ऑपरेट करते थे। इस प्रक्रिया में वह डेढ़ से दो घंटे लगा देते थे। उनका कंप्यूटर रिमोट एप के जरिए चलाकर उनकी बैंक खातों की डिटेल आदि जुटा लेते थे और रकम चीन के खाते में ट्रांसफर कर देते थे।
यह सामान हुआ बरामद
ठगी का कॉल सेंटर चलाने वाले इस गैंग के पास से सात लैपटॉप, आठ मोबाइल फोन, वाईफाई राउटर, डोंगल और 26900 रुपये की नकदी मिली है। इन्हीं उपकरणों के जरिये वह इस कॉल सेंटर को संचालित कर रहे थे।
कमीशन की रकम देने कैश लेकर आता था युवक
गिरफ्तार किए गए ठगों ने बताया कि वह दिल्ली के रहने वाले एक युवक के जरिए ठगी के इस धंधे को चला रहे थे। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इसकी एवज में उन्हें ठगी की रकम का 40 फीसदी तक कमीशन मिलता था। ठगी की रकम चीन के बैंक खातों में जाती थी, लेकिन उन्हें कमीशन नकद के रूप में मिलता था। उनका कमीशन देने हर काम अलग-अलग व्यक्ति आता था। उनका कहना है कि वह नहीं जानते की दिल्ली में बैठा व्यक्ति कौन है जो उन्हें निर्देश देता था। उसने खुद का कॉल सेंटर बताया था।