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अधिकारियों से सांठगांठ कर 17 साल तक दबाए रखी आदेश की फाइल
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अधिकारियों से सांठगांठ कर 17 साल तक दबाए रखी आदेश की फाइल
गाजियाबाद। डासना में 28 बीघा ऊसर जमीन को ग्राम प्रधान और राजस्व कर्मियों से सांठगांठ कर अवैध रूप से कब्जा कर समिति बनाने वालों का भंडाफोड़ कर प्रशासन ने खाते से नाम खारिज करने और जमीन को ऊसर में दर्ज करने का आदेश दिया है। 2005 में भी जमीन को ऊसर में दर्ज करने का आदेश हुआ था लेकिन समिति के सदस्यों ने अधिकारियों से मिलीभगत कर 17 साल तक आदेश की फाइल दबाए रखा और इसे लागू ही नहीं होने दिया। आठ जून को दोबारा आदेश के बाद नाम खारिज कर जमीन को मूल स्वरूप में दर्ज कि या गया है।
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे में जमीन अधिग्रहण के बाद फर्जीवाड़ा कर सरकारी जमीन का 22 करोड़ से अधिक का मुआवजा हड़पने वाले अशोक संयुक्त सहकारी समिति, अशोक सहकारी गृह निर्माण समिति के सदस्य अरुण गुप्ता, गोल्डी गुप्ता द्वारा अर्जित की गई संपत्तियों की जांच तेज कर दी गई। प्रशासन की ओर से अभी तक समिति और उनके सदस्यों के खिलाफ छह एफआईआर दर्ज कराई जा चुकी है। समिति में शामिल 18 सदस्यों में से अभी तक गोल्डी गुप्ता और सुधाकर मिश्रा को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है। शेष आरोपी पुलिस गिरफ्त से दूर हैं।
डासना में चकबंदी के दौरान हुआ था खेल
डासना में 1969 से 1981 तक चकबंदी चली थी। प्रशासन की जांच में पाया गया है कि जिस जमीन को समिति के नाम बताया गया वह चकबंदी के पहले तक ऊसर में दर्ज थी। चकबंदी के दौरान करीब 28 बीघे ऊसर जमीन अशोक सहकारी संयुक्त खेती समिति के नाम राजस्व अभिलेखों में खेल कर दर्ज कर दी गई। 1976 में मेरठ से अगल होकर गाजियाबाद जिला बना तो उस समय डासना में चकबंदी चल रही थी। आठ फरवरी 1999 को उपनिबंधक सहकारी समितियां, मेरठ मंडल द्वारा अशोक सहकारी समिति के सक्रिय नहीं होने की वजह निबंधन निरस्त कर दिया गया। इसके खिलाफ समिति के लोगों ने तहसीलदार कोर्ट में केस किया। जमीन ऊसर नहीं है इसको साबित करने में अक्षम रहने पर 2005 में एसडीएम कोर्ट ने 28 बीघा जमीन को मुक्त कराकर ऊसर में दर्ज करने का आदेश दिया था।
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संक्रमणीय दिखा कई बार बेची गई जमीन
जांच अधिकारी अपर उप जिलाधिकारी सीके सिंह ने बताया कि 2005 में तहसीलदार की रिपोर्ट में बताया गया है कि 1365 फसली यानी 1961 में दो नंबरों 2900 और 2976 ऊसर के खाते में दर्ज थे। 1964-66 तक ऊसर दर्ज है। चकबंदी में अशोक सहकारी संयुक्त खेती समिति ने करीब 28 बीघा ऊसर अपने नाम दर्ज करा ली। समिति के सदस्यों की ओर से तर्क दिया गया कि तत्कालीन ग्राम प्रधान व भूमि प्रबंधक समिति के अध्यक्ष इरशाद अली से उन्होंने जमीन पट्टे पर ली थी। हालांकि केस चलने के दौरान इसका प्रमाण विपक्षी नहीं दे पाए। कल्लूगढ़ी निवासी दलशेर के नाम भी बिना किसी आदेश के ऊसर जमीन में नाम दर्ज होने की बात जांच में आई है। दलशेर ने करीब पांच बीघा जमीन जुम्मा और एहसान को बेच दी। इसके बाद जुम्मा और एहसान ने समिति को वहीं जमीन बेच दी। इसके बाद अशोक सहकारी संयुक्त खेती समिति के सदस्यों ने अशोक सहकारी गृह निर्माण समिति को तीन बीघा 14 बिस्वा, केएलसी इंडस्ट्रीज लिमिटेड को 11 बिस्वा और फरियाद अली को एक बीघा सात बिस्वा ऊसर जमीन जालसाजी की बेच दी।
एडीएम प्रशासन रितु सुहास ने बताया कि जालसाजी कर ऊसर, बंजर जमीन बेचने वाले भूमाफिया के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई जा रही है। जिन गांवों में समिति बनाकर सरकारी जमीन की खरीद फरोख्त की गई है जांच कराकर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। दिल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे के अधिग्रहण के बाद हुए बैनामों की जांच कराई जा रही है। मामले की एसआईटी जांच कर रही है।
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गाजियाबाद। डासना में 28 बीघा ऊसर जमीन को ग्राम प्रधान और राजस्व कर्मियों से सांठगांठ कर अवैध रूप से कब्जा कर समिति बनाने वालों का भंडाफोड़ कर प्रशासन ने खाते से नाम खारिज करने और जमीन को ऊसर में दर्ज करने का आदेश दिया है। 2005 में भी जमीन को ऊसर में दर्ज करने का आदेश हुआ था लेकिन समिति के सदस्यों ने अधिकारियों से मिलीभगत कर 17 साल तक आदेश की फाइल दबाए रखा और इसे लागू ही नहीं होने दिया। आठ जून को दोबारा आदेश के बाद नाम खारिज कर जमीन को मूल स्वरूप में दर्ज कि या गया है।
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे में जमीन अधिग्रहण के बाद फर्जीवाड़ा कर सरकारी जमीन का 22 करोड़ से अधिक का मुआवजा हड़पने वाले अशोक संयुक्त सहकारी समिति, अशोक सहकारी गृह निर्माण समिति के सदस्य अरुण गुप्ता, गोल्डी गुप्ता द्वारा अर्जित की गई संपत्तियों की जांच तेज कर दी गई। प्रशासन की ओर से अभी तक समिति और उनके सदस्यों के खिलाफ छह एफआईआर दर्ज कराई जा चुकी है। समिति में शामिल 18 सदस्यों में से अभी तक गोल्डी गुप्ता और सुधाकर मिश्रा को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है। शेष आरोपी पुलिस गिरफ्त से दूर हैं।
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डासना में चकबंदी के दौरान हुआ था खेल
डासना में 1969 से 1981 तक चकबंदी चली थी। प्रशासन की जांच में पाया गया है कि जिस जमीन को समिति के नाम बताया गया वह चकबंदी के पहले तक ऊसर में दर्ज थी। चकबंदी के दौरान करीब 28 बीघे ऊसर जमीन अशोक सहकारी संयुक्त खेती समिति के नाम राजस्व अभिलेखों में खेल कर दर्ज कर दी गई। 1976 में मेरठ से अगल होकर गाजियाबाद जिला बना तो उस समय डासना में चकबंदी चल रही थी। आठ फरवरी 1999 को उपनिबंधक सहकारी समितियां, मेरठ मंडल द्वारा अशोक सहकारी समिति के सक्रिय नहीं होने की वजह निबंधन निरस्त कर दिया गया। इसके खिलाफ समिति के लोगों ने तहसीलदार कोर्ट में केस किया। जमीन ऊसर नहीं है इसको साबित करने में अक्षम रहने पर 2005 में एसडीएम कोर्ट ने 28 बीघा जमीन को मुक्त कराकर ऊसर में दर्ज करने का आदेश दिया था।
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संक्रमणीय दिखा कई बार बेची गई जमीन
जांच अधिकारी अपर उप जिलाधिकारी सीके सिंह ने बताया कि 2005 में तहसीलदार की रिपोर्ट में बताया गया है कि 1365 फसली यानी 1961 में दो नंबरों 2900 और 2976 ऊसर के खाते में दर्ज थे। 1964-66 तक ऊसर दर्ज है। चकबंदी में अशोक सहकारी संयुक्त खेती समिति ने करीब 28 बीघा ऊसर अपने नाम दर्ज करा ली। समिति के सदस्यों की ओर से तर्क दिया गया कि तत्कालीन ग्राम प्रधान व भूमि प्रबंधक समिति के अध्यक्ष इरशाद अली से उन्होंने जमीन पट्टे पर ली थी। हालांकि केस चलने के दौरान इसका प्रमाण विपक्षी नहीं दे पाए। कल्लूगढ़ी निवासी दलशेर के नाम भी बिना किसी आदेश के ऊसर जमीन में नाम दर्ज होने की बात जांच में आई है। दलशेर ने करीब पांच बीघा जमीन जुम्मा और एहसान को बेच दी। इसके बाद जुम्मा और एहसान ने समिति को वहीं जमीन बेच दी। इसके बाद अशोक सहकारी संयुक्त खेती समिति के सदस्यों ने अशोक सहकारी गृह निर्माण समिति को तीन बीघा 14 बिस्वा, केएलसी इंडस्ट्रीज लिमिटेड को 11 बिस्वा और फरियाद अली को एक बीघा सात बिस्वा ऊसर जमीन जालसाजी की बेच दी।
एडीएम प्रशासन रितु सुहास ने बताया कि जालसाजी कर ऊसर, बंजर जमीन बेचने वाले भूमाफिया के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई जा रही है। जिन गांवों में समिति बनाकर सरकारी जमीन की खरीद फरोख्त की गई है जांच कराकर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। दिल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे के अधिग्रहण के बाद हुए बैनामों की जांच कराई जा रही है। मामले की एसआईटी जांच कर रही है।