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मिडोस विस्टा प्रोजेक्ट को पूरा करेंगे फ्लैट खरीदार, एनसीएलटी ने दी मंजूरी
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मिडोस विस्टा प्रोजेक्ट को पूरा करेंगे फ्लैट खरीदार, एनसीएलटी ने दी मंजूरी
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित मिडोस विस्टा के फेज-दो प्रोजेक्ट के 10 साल बाद पूरा होने की उम्मीद बढ़ गई है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सालों से संघर्षरत वैल्यू इंफ्रा बायर्स एसोसिएशन को प्रोजेक्ट टेकओवर कर पूरा करने का फैसला सुनाया है। ऐसे में फ्लैट खरीदारों की एसोसिएशन ने कंपनी पर मिले अधिकार के तहत फेज-दो के चार टावरों में 408 निर्माणाधीन फ्लैट को पूरा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एसोसिएशन ने अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने को बिल्डर का चुनाव शुरू कर दिया है।
सालों से जारी लंबी लड़ाई जीतने वाले वैल्यू इंफ्रा बायर्स एसोसिएशन अध्यक्ष शरद किशोर श्रीवास्तव ने बताया कि 2014 से जारी संघर्ष के बाद फ्लैट खरीदारों को बड़ी सफलता मिली है। 2010 में शुरू हुए प्रोजेक्ट में 2012 में कब्जा मिलना था। लेकिन बिल्डर की धोखाधड़ी के कारण प्रोजेक्ट 2013 में बंद हो गया। ऐसे में प्रोजेक्ट में करोड़ों निवेश करने वाले फ्लैट खरीदरों की एसोसिएशन ने एनसीएलटी में एक समाधान प्लान जमा किया था। इसके तहत कोर्ट को खुद अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने का आदेश देने और लागत को खुद वहन करने की बात शामिल थी। प्लान को खरीदारों ने 97 फीसदी वोटिंग के साथ सबमिट किया था। इस पर एनसीएलटी ने प्लान को स्वीकृति प्रदान करने का आदेश जारी किया।
एसोसिएशन के महासचिव हिमांशु पांडेय ने बताया कि प्रोजेक्ट में बिल्डर फ्लैट खरीदारों को करोड़ों का चूना लगाकर रफूचक्कर हो गया। लोग घर मिलने का सालों से इंतजार करने के साथ फ्लैट की किस्त लगातार जमा कर रहे हैं। बिल्डर सालों से फरार चलने केसाथ उनके परिजन जेल की हवा खा रहे हैं। ऐसे में अब प्रोजेक्ट को पूरा करने की दिशा में बड़ी सफलता मिली है। एसोसिएशन के सचिव अनुज उपाध्याय ने बताया कि एनसीएलटी के आदेश से उम्मीद की बड़ी किरण दिखी है।
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अधिकांश लोग 80 फीसदी तक पैसा कर चुके हैं जमा:
बिल्डर के आश्वासन के चलते अधिकांश लोग 80 फीसदी तक पैसा जमा चुके हैं। फ्लैट खरीदारों पर लोन चुकाने के साथ घर का किराया भी देना पड़ रहा है। बिल्डर की धोखाधड़ी के चलते कई लोगों की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी है। प्रोजेक्ट में बिल्डर ने बैंक के साथ मिलकर भी खरीदारों के साथ धोखधड़ी की। बैंक की ओर से प्रोजेक्ट की कोई निगरानी नहीं करने केसाथ बिल्डर को पैसा जारी किया जाता रहा। ऐसे में बिल्डर काम पूरा किए बगैर फरार हो गया।
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गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित मिडोस विस्टा के फेज-दो प्रोजेक्ट के 10 साल बाद पूरा होने की उम्मीद बढ़ गई है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सालों से संघर्षरत वैल्यू इंफ्रा बायर्स एसोसिएशन को प्रोजेक्ट टेकओवर कर पूरा करने का फैसला सुनाया है। ऐसे में फ्लैट खरीदारों की एसोसिएशन ने कंपनी पर मिले अधिकार के तहत फेज-दो के चार टावरों में 408 निर्माणाधीन फ्लैट को पूरा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एसोसिएशन ने अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने को बिल्डर का चुनाव शुरू कर दिया है।
सालों से जारी लंबी लड़ाई जीतने वाले वैल्यू इंफ्रा बायर्स एसोसिएशन अध्यक्ष शरद किशोर श्रीवास्तव ने बताया कि 2014 से जारी संघर्ष के बाद फ्लैट खरीदारों को बड़ी सफलता मिली है। 2010 में शुरू हुए प्रोजेक्ट में 2012 में कब्जा मिलना था। लेकिन बिल्डर की धोखाधड़ी के कारण प्रोजेक्ट 2013 में बंद हो गया। ऐसे में प्रोजेक्ट में करोड़ों निवेश करने वाले फ्लैट खरीदरों की एसोसिएशन ने एनसीएलटी में एक समाधान प्लान जमा किया था। इसके तहत कोर्ट को खुद अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने का आदेश देने और लागत को खुद वहन करने की बात शामिल थी। प्लान को खरीदारों ने 97 फीसदी वोटिंग के साथ सबमिट किया था। इस पर एनसीएलटी ने प्लान को स्वीकृति प्रदान करने का आदेश जारी किया।
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एसोसिएशन के महासचिव हिमांशु पांडेय ने बताया कि प्रोजेक्ट में बिल्डर फ्लैट खरीदारों को करोड़ों का चूना लगाकर रफूचक्कर हो गया। लोग घर मिलने का सालों से इंतजार करने के साथ फ्लैट की किस्त लगातार जमा कर रहे हैं। बिल्डर सालों से फरार चलने केसाथ उनके परिजन जेल की हवा खा रहे हैं। ऐसे में अब प्रोजेक्ट को पूरा करने की दिशा में बड़ी सफलता मिली है। एसोसिएशन के सचिव अनुज उपाध्याय ने बताया कि एनसीएलटी के आदेश से उम्मीद की बड़ी किरण दिखी है।
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अधिकांश लोग 80 फीसदी तक पैसा कर चुके हैं जमा:
बिल्डर के आश्वासन के चलते अधिकांश लोग 80 फीसदी तक पैसा जमा चुके हैं। फ्लैट खरीदारों पर लोन चुकाने के साथ घर का किराया भी देना पड़ रहा है। बिल्डर की धोखाधड़ी के चलते कई लोगों की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी है। प्रोजेक्ट में बिल्डर ने बैंक के साथ मिलकर भी खरीदारों के साथ धोखधड़ी की। बैंक की ओर से प्रोजेक्ट की कोई निगरानी नहीं करने केसाथ बिल्डर को पैसा जारी किया जाता रहा। ऐसे में बिल्डर काम पूरा किए बगैर फरार हो गया।