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गोलियों दुनालियों में रह रहे हैं हम...
ब्यूरो , अमर उजाला गाजियाबाद
Updated Tue, 07 Feb 2017 11:11 PM IST
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- फोटो : demo pic
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विधानसभा चुनाव की रवानगी तमाम कवायदों के बाद भी शहर में नहीं दिख रही। राजनीति की समझ को हर कोई अपने-अपने अंदाज में बयां कर रहा है। आम मतदाता चाहे वो महिला, पुरुष और युवा हो सभी बदली हुई राजनीति को अपने-अपने दृष्टिकोण से आंक रहे हैं।
अब अगर ऐसे में बात की जाए साहित्य और काव्य की तो कि कवियों के लिए ये गणतंत्र का पर्व महज एक चुनावी जुमला सा है। गाजियाबाद के नामचीन कवियों से जब अमर उजाला ने वर्तमान राजनीति के हालात पर चर्चा की तो उनके विचारों से जो निकला उसने चुनाव को कुछ इस अलग ही अंदाज में व्यक्त किया।
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कवि कृष्ण मित्र ने चुनावी बयार को अपनी कविता के माध्यम से कुछ यूं बंया किया ‘गोलियों दुनालियों में रह रहे हैं हम, इस तंत्र को ही लोकतंत्र कह रहे हैं हम’। उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीति लाठी और पैसों के दम पर चलती है, इसमें जनता का अब कोई रोल नहीं होता।
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मशहूर शायर बिजेंद्र परवाज ने वर्तमान राजनीति को स्वयं हित की राजनीति करार दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीति में आम जनता त्राहिमाम कर रही है। उन्होंने जनता की हालत पर तंज किया, कुछ यूं है कि ‘आज ऐसे जालिमों में फंस गए परवाज हम, वो हमारा सारा खून पीकर मुस्कुराए जाएंगे’।
इतने पर भी बिजेंद्र परवाज थमे नहीं उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को एक सा बताया और कहा कि ‘खुश तो यूं हूं कि राह के कांटे हटाए जाएंगे और गम ये है कि अब अंगारे बिछाए जाएंगे।’ राष्ट्रीय कवि कुंवर बेचैन ने कहा कि पहले विचारधारा की राजनीति हुआ करती थी। प्रत्येक पार्टी का निर्माण एक अलग विचारधारा के साथ हुआ।
अब ऐसा कुछ नहीं है, जिसको जिस पार्टी के टिकट से जीत नजर आती है, वह वहीं से चुनाव लड़ता है। अब जीत हार पहले हो गई और विचारधारा बहुत पीछे चली गई। अपनी पंक्तियों के जरिए उन्होंने राजनीति पर टिप्पण करते हुए कहा कि आज के राजनेता और राजनीति तो मानो अपनी स्याह पीठ छुपाता है आइना, सबको हमारे दाग दिखाता है
आइना, हम टूट भी गए तो ये बोला न एक बार, जब खुद गिरा तो शोर मचाता है आइना, इसका न कोई दीन है, ईमान न धरम, इस हाथ से उस हाथ में जाता है आइना।कवियों का दर्द ये बयां करने के लिए काफी है कि हर पांच साल के बाद आने वाले चुनाव किस तरह से लोकतंत्र को गन-तंत्र, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के दलदल में डुबो रहे हैं,
जिसके चलते कवि मन इस कदर आहत है कि कलम लोकतंत्र के इस पर्व को उत्सव के रूप में बखान करने के लिए उठना ही बंद हो गई सी लगती है।