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किताबों को देखा है ‘रंग’ बदलते हुए

Sat, 23 Apr 2016 12:42 AM IST
ब्यूरो,अमर उजाला गाजियाबाद
ब्यूरो,अमर उजाला गाजियाबाद Updated Sat, 23 Apr 2016 12:42 AM IST
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Books have seen the 'color' changing
किताब - फोटो : अमर उजाला
कहते हैं कि किताबें किसी भी व्यक्ति की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। एक अच्छी किताब न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि दुनिया भर की नई-नई जानकारियां उपलब्ध कराती है। शायद यही कारण है कंप्यूटर-इंटरनेट के इस दौर ने पाठकों को प्रभावित तो किया, मगर किताबों की डिमांड आज भी कम नहीं हुई। समय के साथ और पाठकों की डिमांड को देखते हुए किताबों ने भी अपना रंग-रूप बदला है।
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अग्रसेन बाजार में शहर की सबसे पुरानी कॉमिक्स-मैगजीन की दुकान चलाने वाले रविंद्र पाल जौली बताते हैं कि गाजियाबाद के जिला बनने से पूर्व उनके पिता सरदार जगजीत सिंह जौली ने इस दुकान की शुरुआत की थी।
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उस समय न तो इतने प्रकाशन थे और न हीं इतनी किताबें। हालांकि पाठकों की गाजियाबाद में शुरू से ही कोई कमी नहीं। आज भी करीब 80 से 100 किताबें उनकी प्रतिदिन बिकती हैं।
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 रविंद्र ने बताया कि उन्हें खुद भी किताबें पढ़ने का शौक था।

90 के दशक में नंदन, पराग, चंदामामा, सुमन सौरभ, धर्मयुग, हंस के साथ ही बच्चों को गुदगुदाने और उनका मनोरंजन करने वाली कॉमिक्स का दौर था। बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी, रमन, सुपर कमांडो ध्रुव, नागराज, चाचा-भतीजा आदि किरदारों के माध्यम से नई-नई प्रेरक जानकारियां मिलती थीं। रविंद्र का कहना है कि पिता की दुकान पर वह बचपन से ही हाथ बंटाते थे।

इससे जेब खर्च तो मिलता ही था साथ ही साथ किताबें भी पढ़ने को मिलती थीं। किताबों से उनका ऐसा लगाव हुआ कि एमएमएच कॉलेज से बीएससी करने के बाद भी उन्होंने नौकरी के मुकाबले बुक शॉप पर बैठने का निर्णय लिया। जौली का कहना है कि इन चार दशकों में ही किताबों के कई रंग उन्होंने बदलते हुए देखे हैं। पराग, चंदामामा, दिनमान और धर्मयुग जैसी किताबें अब बंद हो चुकी हैं।


हालांकि इसके साथ ही किताबों के नए एडिशन आने शुरू हो गए हैं। नए-नए प्रकाशकों की देसी-विदेशी किताबें अब बाजार में हैं। इंटरनेट के इस युग में किताबों की महत्ता पर जौली का कहना है कि किताब के शौकीनों में आज भी कोई कमी नहीं है। शहर के नामचीन लोग जिनमें पूर्व विधायक, सांसद के अलावा पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी तक उनसे किताबें खरीदकर ले जाते हैं।
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