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नहीं देखा तो देख लें गालिब की हवेली

Mon, 07 Apr 2014 10:48 AM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 07 Apr 2014 10:48 AM IST
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Ghalib ki Haveli

ऊर्दू शायरी और कविता के अजीम शहंशाह मिर्जा गालिब की एक हवेली है जो हिंदुस्तान के दिल, पुरानी दिल्ली की कासिम जान बल्लीमारान नाम की गली में बसी हुई है।

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इस भीड़-भाड़ वाली संकरी गली में एक सुंदर दरवाजा खुलता है गालिब के उन दिनों में जहां जज्बात बेहद खूबसूरती से अल्फाजों से बयान होते थे।

गालिब की ये हवेली उनकी शायरी और मुगल सल्तनत के उस दौर की याद दिलाती है जब मुगलिया सल्तनत अपने पतन की ओर बढ़ रहा था। गालिब की हवेली को भारतीय पुरातत्व विभाग ने धरोहर घोषित कर दिया है।
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गालिब को समझना हो तो यहां जरूर आएं। उनकी हवेली में आते ही बरबस आपको उनका ये शेर याद आ जाएगा जिसमें उन्होंने कहा है "उग रहा है दर-ओ-दीवार से सब्ज़ा गालिब! हम बयाबान में हैं और घर में बहार आई है।"
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हवेली का इतिहास
गालिब अपनी इस हवेली में आगरा से आने के बाद नौ साल तक यहां रहे। गालिब की मौत के बाद हवेली में साल 1999 तक बाजार लगता था। 1999 के बाद सरकार ने इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया और इसका जीर्णोद्धार कराकर इसे वापस मुगलकाल वाला रूप और गौरव देने की कोशिश की। गालिब ने इसी हवेली में रहकर ऊर्दू और पारसी में 'दीवान' की रचना की थी। हवेली को विशेष लुक देने के लिए लाखौरी ईंटों, बालू पत्थर का प्रयोग किया गया है। लकड़ी की ड्योढी(प्रवेश द्वार) बनाकर गालिब के समय की फीलिंग लाने की कोशिश की गई है।

हवेली की वास्तुकला और बनावट
गालिब की हवेली भी आपको अन्य मुगलकाल में बनी इमारतों की याद दिलाएगी क्योंकि ये भी मुगल वास्तुकला के अनुसार ही बनी है। बड़े-बड़े स्तंभों के साथ हवेली का विशाल परिसर मुगलकाल के संस्मरण हैं।

हवेली के दरो-दीवार गालिब और उनकी शायरी के विशाल पोट्रेट से सुशोभित हैं। जब दिल्ली सरकार ने इसे पूरी तरह अपने आश्रय में ले लिया तब से इस हवेली को गालिब के म्यूजियम में बदल दिया गया है।

यहां गालिब और उनकी शायरी से जुड़ी कई चीजें यहां सहेज कर रखी गई हैं। यहां गालिब की किताबें तो हैं ही उनके हाथ से लिखी कविताएं भी रखी हैं। गालिब हुक्के का शौक रखते थे इसलिए हवेली में उनका रूप बना कर रखा है जो हाथ में हुक्का पकड़ कर बैठा है।
ghalib ki haveli

एक बार को तो आपको ये भ्रम होगा कि कहीं सच में तो कोई नहीं बैठ कर हुक्का पी रहा। गालिब की हवेली के हर कोने से आपको उनकी शायरी की खुश्बू आएगी और आपका मन उसी दुनिया में खो जाएगा। किसी शायर के लिए गालिब की ये हवेली जन्नत से कम नहीं है।

जहां बैठकर उसे लिखने की प्रेरणा मिलती रहे। हवेली में गालिब के अलावा उनके समकालीनों का भी पोट्रेट लगा है जिसमें उस्ताद जौक, अबू जफर, मोमिन मुख्य हैं।यहां पर लगी गालिब की प्रतिमा का अनावरण तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिसंबर 2010 में किया था। इसे मशहूर मूर्तिकार रामपूरे ने बनाया है।


हवेली में जाने का समय
गालिब की हवेली अन्य राष्ट्रीय इमारतों की तरह ही सोमवार को बंद रहता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुले रहने वाली इस हवेली में कोई भी निःशुल्क एंट्री कर सकता है। यहां फोटोग्राफी पर भी कोई प्रतिबंध या चार्ज नहीं है। अगर आप मेट्रो से जा रहे हैं तो चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन इसके सबसे नजदीक है।

पुरानी दिल्ली में बसी इस हवेली और ऐसी ही कई ईमारतों की वजह से ही शायद लोग कहते हैं कि "कौन जाए दिल्ली की गलियां छोड़ के?" दिल्ली में ऐसे तरह-तरह के नगीने मिलेंगे जिनमें गालिब की हवेली अपना अलग ही मुकाम रखती है।

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