इन पांच चालों में फंसकर MCD चुनाव में चित हुई केजरीवाल की आम आदमी पार्टी
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दिल्ली में लड़े गए अभी तक के चार चुनावों में पार्टी को यह सबसे कम वोट मिले हैं। आप की हार की पांच बड़ी बताती अमर उजाला की एक रिपोर्ट:
पंजाब चुनाव परिणाम से गिरा कार्यकर्ताओं का मनोबल
मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही केंद्र सरकार से लगातार दो-दो हाथ कर रहे अरविंद केजरीवाल समेत पूरी पार्टी को पंजाब चुनाव से ढेरों उम्मीदें थी। आप के आम कार्यकर्ता से लेकर वरिष्ठ नेता मान रहे थे कि पंजाब चुनाव में उनकी सरकार बनेगी। उसके बाद केंद्र के सामने मजबूती से अपनी बात रखी जायेगी।
वहीं, पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनेगी। लेकिन अपेक्षित परिणाम न मिलने से कार्यकर्ताओं को मनोबल धड़ाम हो गया। निगम चुनाव में यह दुबारा लौट पाता, उससे पहले ही राजौरी गार्डन उपचुनाव में पार्टी की जमानत जब्त हो गयी। इससे जमीनी स्तर पर प्रचार अभियान मजबूती से आगे नहीं बढ़ सका।
नकारात्मक राजनीति पर चलना पड़ा भारी
दिल्ली में 2015 विधान चुनाव चुनाव में आप की बड़ी जीत के पीछे सकारात्मक राजनीति की अहम भूमिका रही थी।
लोगों को आप की सरकार से ढेरों उम्मीदें थीं लेकिन सरकार बनाने के आप ने अपनी सियासी धारा मोड़ ली। पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल से लेकर सभी नेता केंद्र सरकार से टकराव की मुद्रा में दिखे।
दिल्ली को मॉडल राज्य बनाने की जगह पार्टी ने कभी पंजाब तो कभी गोवा फतह करने की कोशिश करते रहे। नकारात्मक राजनीति का खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा है।
मनोज तिवारी का विकल्प न ढूंढ़ पाना
पार्टी की हार के एक वजह भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी की काट न ढूढ़ पाने में रही। विधान सभा चुनाव आप ने ही पहली बार पूर्वांचली समाज को एक वोट बैंक के तौर पर स्थापित किया।
बड़ी संख्या में पूर्वांचल के लोगों को टिकट देकर विधान सभा तक पहुंचाया। लेकिन मनोज तिवारी के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद उसका यह दांव फीका पड़ गया। मनोज तिवारी के नाम पर पूर्वांचल के लोगों का भाजपा की तरफ झुकाव बढ़ा।
वहीं, पहले के भाजपा प्रदेश अध्यक्षों के विपरीत पार्टी मनोज तिवारी पर कभी सीधा हमला नहीं कर सकी। इससे पूर्वांचली वोटर भाजपा की तरफ खिसक गया।
सीएजी व शुंगूल कमेटी की रिपोर्ट
निगम चुनाव से पहले शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट का सार्वजनिक होना भी आप पर भारी पड़ा। जिस भ्रष्टाचार के काल के तौर पर पार्टी केजरीवाल को प्रोजेक्ट कर रही थी, कमेटी की रिपोर्ट ने उसी पर प्रहार किया।
इससे पार्टी को बचाव की मुद्रा में आने पड़ा। जबकि विपक्षी आक्रामक रहे। लोगों के बीच पार्टी नेताओं की दलीलें ज्यादा कारागर साबित नहीं हुईं।
इसके अलावा वकील जेठमलानी की फीसदी से भी पार्टी को रक्षात्मक मुद्रा में जाना पड़ा। वहीं, महंगी थाली भी लोगों को हजम नहीं हुयी।
नोटबंदी के बाद ईवीएम पर आरोप भी नहीं चढ़ा पल्ले
इसी तरह ईवीएम टेंपरिंग का मामला भी तकनीकी दायरे में सिमटा रहा। न तो चुनाव आयोग और न ही आम लोगों ने इस मसले को ज्यादा तवज्जो दी।