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Delhi NCR News: साबरमती की तर्ज पर रिवरफ्रंट बना तो बढ़ सकता है दिल्ली में बाढ़ का खतरा
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52 किलोमीटर लंबी परियोजना पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने उठाए सवाल, बोले-यमुना की पारिस्थितिकी और बाढ़ वहन क्षमता की अनदेखी पड़ सकती है भारी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली में यमुना के किनारे साबरमती की तर्ज पर 52 किलोमीटर लंबा रिवरफ्रंट विकसित करने की प्रस्तावित योजना पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि दोनों नदियों की भौगोलिक, जलवैज्ञानिक और पारिस्थितिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में साबरमती मॉडल को यमुना पर लागू करने से नदी की प्राकृतिक संरचना, बाढ़ के पानी को समाहित करने की क्षमता और खादर क्षेत्र को नुकसान पहुंच सकता है। इससे भविष्य में दिल्ली में बाढ़ का खतरा बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों ने परियोजना पर आगे बढ़ने से पहले वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन कराने की मांग की है।
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग के सेवानिवृत्त सचिव शशांक शेखर, पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा समेत 18 जल विज्ञानियों ने केंद्रीय मंत्रियों सीआर पाटिल और भूपिंदर यादव, उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तथा दिल्ली सरकार के मंत्रियों प्रवेश वर्मा और मनजिंदर सिंह सिरसा को पत्र लिखकर परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग की है। विशेषज्ञों ने परियोजना से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने पर भी जोर दिया है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), प्रारंभिक व्यवहार्यता अध्ययन और पर्यावरण प्रभाव आकलन जैसे दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने चाहिए।
दोनों नदियों की प्रकृति अलग, इसलिए मॉडल पर सवाल
विशेषज्ञों के मुताबिक, साबरमती अरावली पर्वतमाला से निकलने वाली मौसमी नदी है, जबकि यमुना हिमालय से निकलकर गंगा के मैदानी क्षेत्र में जलोढ़ नदी का स्वरूप लेती है। अहमदाबाद में साबरमती के शहरी हिस्से में नर्मदा नहर प्रणाली के जरिए पानी पहुंचाया जाता है। साथ ही, वासना बैराज के कारण नदी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है। इसके विपरीत, दिल्ली में यमुना मानसून के बाहर पर्याप्त जलप्रवाह की कमी और प्रदूषण के भारी दबाव से जूझ रही है।
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-विशेषज्ञों का तर्क है कि साबरमती में अपनाई गई व्यवस्थाओं को यमुना पर लागू करना आसान नहीं होगा। यमुना दिल्ली से आगे भी कई राज्यों से होकर बहती है। ऐसे में प्रदूषित पानी को दूसरे मार्ग से मोड़ने जैसे विकल्पों की व्यवहार्यता और उनके व्यापक प्रभावों की अलग से जांच जरूरी है।
बाढ़ के पानी के लिए जगह कम हुई तो बढ़ेगा खतरा
वर्ष 2023 और 2025 में दिल्ली में आई बाढ़ का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने यमुना की जलधारण और बाढ़ वहन क्षमता की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। उनकी आशंका है कि नदी में तलछट और मलबा जमा होने से नदी तल ऊंचा हुआ हो सकता है और पानी के बहाव के लिए उपलब्ध क्षेत्र कम हुआ हो। हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण जरूरी है।
-विशेषज्ञों के अनुसार, खादर क्षेत्र में अतिरिक्त निर्माण और विकास कार्य बाढ़ के पानी के प्राकृतिक फैलाव को बाधित कर सकते हैं। इससे नदी का जलस्तर बढ़ने और आसपास के इलाकों में नुकसान का खतरा पैदा हो सकता है। बाढ़ के दौरान दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के जैव विविधता पार्कों के बड़े हिस्सों में पानी भरने की घटनाएं भी नदी और उसके आसपास के क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक संबंधों को समझने की जरूरत रेखांकित करती हैं।
एनजीटी के फैसले का भी दिया हवाला
विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 13 जनवरी 2015 के 'मैली से निर्मल यमुना' मामले के फैसले का हवाला देते हुए खादर की वैज्ञानिक मैपिंग और सीमांकन पूरा करने, ओ-जोन के मौजूदा संरक्षण प्रावधान बनाए रखने तथा अतिक्रमण रोकने की मांग की है।
उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) की 2019 की सिफारिश के अनुसार, गैर-मानसूनी अवधि में यमुना का न्यूनतम प्रवाह 10 से बढ़ाकर 23 क्यूमेक करने का सुझाव भी दिया है। साथ ही, नदी तल और अनुप्रस्थ क्षेत्र का सर्वेक्षण कर वर्ष 2023 और 2025 की बाढ़ के कारणों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
-विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि रिवरफ्रंट विकास से पहले यमुना की बाढ़ वहन क्षमता, खादर की भूमिका और पारिस्थितिक प्रभावों का आकलन होना चाहिए। वैज्ञानिक अध्ययन के बिना साबरमती मॉडल लागू करने का फैसला दिल्ली की बाढ़ संबंधी चुनौतियों को और गंभीर बना सकता है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली में यमुना के किनारे साबरमती की तर्ज पर 52 किलोमीटर लंबा रिवरफ्रंट विकसित करने की प्रस्तावित योजना पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि दोनों नदियों की भौगोलिक, जलवैज्ञानिक और पारिस्थितिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में साबरमती मॉडल को यमुना पर लागू करने से नदी की प्राकृतिक संरचना, बाढ़ के पानी को समाहित करने की क्षमता और खादर क्षेत्र को नुकसान पहुंच सकता है। इससे भविष्य में दिल्ली में बाढ़ का खतरा बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों ने परियोजना पर आगे बढ़ने से पहले वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन कराने की मांग की है।
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग के सेवानिवृत्त सचिव शशांक शेखर, पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा समेत 18 जल विज्ञानियों ने केंद्रीय मंत्रियों सीआर पाटिल और भूपिंदर यादव, उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तथा दिल्ली सरकार के मंत्रियों प्रवेश वर्मा और मनजिंदर सिंह सिरसा को पत्र लिखकर परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग की है। विशेषज्ञों ने परियोजना से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने पर भी जोर दिया है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), प्रारंभिक व्यवहार्यता अध्ययन और पर्यावरण प्रभाव आकलन जैसे दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने चाहिए।
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दोनों नदियों की प्रकृति अलग, इसलिए मॉडल पर सवाल
विशेषज्ञों के मुताबिक, साबरमती अरावली पर्वतमाला से निकलने वाली मौसमी नदी है, जबकि यमुना हिमालय से निकलकर गंगा के मैदानी क्षेत्र में जलोढ़ नदी का स्वरूप लेती है। अहमदाबाद में साबरमती के शहरी हिस्से में नर्मदा नहर प्रणाली के जरिए पानी पहुंचाया जाता है। साथ ही, वासना बैराज के कारण नदी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है। इसके विपरीत, दिल्ली में यमुना मानसून के बाहर पर्याप्त जलप्रवाह की कमी और प्रदूषण के भारी दबाव से जूझ रही है।
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-विशेषज्ञों का तर्क है कि साबरमती में अपनाई गई व्यवस्थाओं को यमुना पर लागू करना आसान नहीं होगा। यमुना दिल्ली से आगे भी कई राज्यों से होकर बहती है। ऐसे में प्रदूषित पानी को दूसरे मार्ग से मोड़ने जैसे विकल्पों की व्यवहार्यता और उनके व्यापक प्रभावों की अलग से जांच जरूरी है।
बाढ़ के पानी के लिए जगह कम हुई तो बढ़ेगा खतरा
वर्ष 2023 और 2025 में दिल्ली में आई बाढ़ का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने यमुना की जलधारण और बाढ़ वहन क्षमता की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। उनकी आशंका है कि नदी में तलछट और मलबा जमा होने से नदी तल ऊंचा हुआ हो सकता है और पानी के बहाव के लिए उपलब्ध क्षेत्र कम हुआ हो। हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण जरूरी है।
-विशेषज्ञों के अनुसार, खादर क्षेत्र में अतिरिक्त निर्माण और विकास कार्य बाढ़ के पानी के प्राकृतिक फैलाव को बाधित कर सकते हैं। इससे नदी का जलस्तर बढ़ने और आसपास के इलाकों में नुकसान का खतरा पैदा हो सकता है। बाढ़ के दौरान दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के जैव विविधता पार्कों के बड़े हिस्सों में पानी भरने की घटनाएं भी नदी और उसके आसपास के क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक संबंधों को समझने की जरूरत रेखांकित करती हैं।
एनजीटी के फैसले का भी दिया हवाला
विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 13 जनवरी 2015 के 'मैली से निर्मल यमुना' मामले के फैसले का हवाला देते हुए खादर की वैज्ञानिक मैपिंग और सीमांकन पूरा करने, ओ-जोन के मौजूदा संरक्षण प्रावधान बनाए रखने तथा अतिक्रमण रोकने की मांग की है।
उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) की 2019 की सिफारिश के अनुसार, गैर-मानसूनी अवधि में यमुना का न्यूनतम प्रवाह 10 से बढ़ाकर 23 क्यूमेक करने का सुझाव भी दिया है। साथ ही, नदी तल और अनुप्रस्थ क्षेत्र का सर्वेक्षण कर वर्ष 2023 और 2025 की बाढ़ के कारणों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
-विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि रिवरफ्रंट विकास से पहले यमुना की बाढ़ वहन क्षमता, खादर की भूमिका और पारिस्थितिक प्रभावों का आकलन होना चाहिए। वैज्ञानिक अध्ययन के बिना साबरमती मॉडल लागू करने का फैसला दिल्ली की बाढ़ संबंधी चुनौतियों को और गंभीर बना सकता है।