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Delhi NCR News: मूर्तियों, नाट्यशास्त्र और कथक परंपरा के संबंधों पर आईआईसी में मंथन
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- आईआईसी में डॉ. शोवना नारायण की पुस्तक ‘बोलती मूर्तियां’ का लोकार्पण
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में शनिवार को पद्मश्री गुरु डॉ. शोवना नारायण की पुस्तक बोलती मूर्तियां कथक में करण का विमोचन हुआ। इस मौके पर कथक की ऐतिहासिक जड़ों व भारतीय मूर्तिकला और नाट्यशास्त्र के बीच संबंधों पर परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें विद्वानों, नृत्यांगनाओं, शोधार्थियों और कला प्रेमियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
सीडी देशमुख ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उपाध्यक्ष डॉ. भरत गुप्त और आईआईसी निदेशक डॉ. केएन श्रीवास्तव ने पुस्तक की उपयोगिता व शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में इसके महत्व पर विचार रखे।
परिचर्चा में बताया गया कि यह पुस्तक पुरातात्विक साक्ष्यों, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र और गुरु-शिष्य परंपरा के आधार पर कथक की उत्पत्ति व विकास को नए दृष्टिकोण से देखती है। इसमें सिंधु घाटी से लेकर मौर्य, शुंग, गुप्त और 17वीं शताब्दी तक की मूर्तियों में अंकित ‘करण’ मुद्राओं का अध्ययन कर उन्हें वर्तमान कथक परंपरा से जोड़ा गया है।
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डॉ. शोवना नारायण ने कहा कि पुस्तक मूर्तिकला, नाट्यशास्त्र और जीवंत कथक परंपरा के बीच संवाद स्थापित करती है। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण उनके शिष्यों की कथक प्रस्तुति रही, जिसमें कलाकारों ने पुस्तक में वर्णित ‘करण’ मुद्राओं को मंच पर जीवंत कर प्राचीन शिल्पकला और आज के कथक की निरंतरता को दिखाया। विद्वानों ने शास्त्रीय नृत्य के इतिहास को समझने में अंतर्विषयक शोध की आवश्यकता पर बल दिया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में शनिवार को पद्मश्री गुरु डॉ. शोवना नारायण की पुस्तक बोलती मूर्तियां कथक में करण का विमोचन हुआ। इस मौके पर कथक की ऐतिहासिक जड़ों व भारतीय मूर्तिकला और नाट्यशास्त्र के बीच संबंधों पर परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें विद्वानों, नृत्यांगनाओं, शोधार्थियों और कला प्रेमियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
सीडी देशमुख ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उपाध्यक्ष डॉ. भरत गुप्त और आईआईसी निदेशक डॉ. केएन श्रीवास्तव ने पुस्तक की उपयोगिता व शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में इसके महत्व पर विचार रखे।
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परिचर्चा में बताया गया कि यह पुस्तक पुरातात्विक साक्ष्यों, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र और गुरु-शिष्य परंपरा के आधार पर कथक की उत्पत्ति व विकास को नए दृष्टिकोण से देखती है। इसमें सिंधु घाटी से लेकर मौर्य, शुंग, गुप्त और 17वीं शताब्दी तक की मूर्तियों में अंकित ‘करण’ मुद्राओं का अध्ययन कर उन्हें वर्तमान कथक परंपरा से जोड़ा गया है।
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डॉ. शोवना नारायण ने कहा कि पुस्तक मूर्तिकला, नाट्यशास्त्र और जीवंत कथक परंपरा के बीच संवाद स्थापित करती है। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण उनके शिष्यों की कथक प्रस्तुति रही, जिसमें कलाकारों ने पुस्तक में वर्णित ‘करण’ मुद्राओं को मंच पर जीवंत कर प्राचीन शिल्पकला और आज के कथक की निरंतरता को दिखाया। विद्वानों ने शास्त्रीय नृत्य के इतिहास को समझने में अंतर्विषयक शोध की आवश्यकता पर बल दिया।