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हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: ट्रांसजेंडर से नहीं मांग सकते सर्जरी प्रमाण पत्र, जानिए केंद्र से क्यों कहा आप कौन होते हैं...

Tue, 12 Apr 2022 09:38 AM IST
पूजा त्रिपाठी अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Tue, 12 Apr 2022 09:38 AM IST
सार

पीठ ने केंद्र के वकील को एक सप्ताह के भीतर संबंधित अथॉरिटी से इस मुद्दे पर निर्देश लेकर जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने मामले की सुनवाई 22 अप्रैल तय की है। पीठ ने केंद्र से कहा आपको अपना नियम बदलना चाहिए, आप कौन होते हैं जो कहते हैं कि सर्जरी का प्रमाण पत्र प्राप्त करें।

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Delhi high court orders not ask surgery certificate from transgenders during passport making as it violates fundamental right to live and freedom
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को ट्रांसजेंडर व्यक्ति को घोषित सेक्स के साथ पासपोर्ट जारी करने के लिए लिंग पुनर्मूल्यांकन सर्जरी का प्रमाण पत्र पेश करने की आवश्यकता वाले पासपोर्ट नियम को प्रथम दृष्टया जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया है। अदालत ने कहा अधिकारी किसी को इस तरह के ऑपरेशन से गुजरने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।

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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने उच्च न्यायालय में कहा कि यह नियम प्रथम दृष्टया सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ है जिसके कारण ट्रांसजेंडर लोगों को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता मिली।
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पीठ ने केंद्र के वकील को एक सप्ताह के भीतर संबंधित अथॉरिटी से इस मुद्दे पर निर्देश लेकर जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने मामले की सुनवाई 22 अप्रैल तय की है। पीठ ने केंद्र से कहा आपको अपना नियम बदलना चाहिए, आप कौन होते हैं जो कहते हैं कि सर्जरी का प्रमाण पत्र प्राप्त करें।
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अदालत ने कहा आप पासपोर्ट उद्देश्य के लिए किसी से सेक्स-चेंज ऑपरेशन कराने के लिए जोर नहीं दे सकते। आप ऐसे व्यक्तियों को ट्रांसजेंडर के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं और फिर ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला में उप-वर्गीकरण हो सकता है, जो भी अभिविन्यास हो। जो भी व्यक्ति खुद को घोषित करना चाहता है लेकिन सर्जरी पर जोर देने का सवाल ही कहां है? एक व्यक्ति सर्जरी नहीं करना चाहता बल्कि खुद को पुरुष या महिला के रूप में पहचानता है।

शीर्ष अदालत के नालसा फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि उस फैसले के अनुसार ट्रांसजेंडरों को अपने स्वयं के पहचान वाले लिंग का फैसला करने का अधिकार है और उस अधिकार को बरकरार रखा गया है। पीठ ने कहा इसका मतलब है कि एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति खुद लिंग का फैसला करेगा और आप उसका पालन करेंगे। यह आग्रह अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन है।

पीठ एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही है जो अधिकारियों द्वारा नाम और लिंग में बदलाव के साथ पासपोर्ट जारी न करने से व्यथित है। उच्च न्यायालय ने मई 2021 में विदेश मंत्रालय से उस याचिका पर जवाब मांगा था जिसमें दावा किया गया था कि याचिकाकर्ता को बदले हुए नाम और लिंग के तहत आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जारी किया गया है, लेकिन पासपोर्ट नहीं।

चूंकि याचिकाकर्ता के आधार कार्ड, वोटर आईडी के साथ-साथ उसके पैन कार्ड सहित सभी दस्तावेज उसे 2 दिसंबर 2019 के हलफनामे के आधार पर नाम और लिंग में आवश्यक परिवर्तन के साथ जारी किए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि वह अपने अन्य दस्तावेजों में किए गए परिवर्तनों के समान ही अपना नया पासपोर्ट जारी करने की भी हकदार है।

याचिकाकर्ता जो एक पुरुष के रूप में पैदा हुआ था और बाद में 2019 में एक हलफनामे पर एक स्व-घोषणा के माध्यम से अपने लिंग को महिला में बदल दिया ने पासपोर्ट नियम 1980 के तहत एक अस्पताल से लिंग-परिवर्तन प्रमाण पत्र जमा करने की आवश्यकता को भी चुनौती दी है।

अधिवक्ता सिद्धार्थ सीम और ओइंड्रिला सेन के माध्यम से दायर याचिका में याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि लिंग परिवर्तन प्रमाण पत्र की आवश्यकता अवैध और असंवैधानिक है और विभाग ने कई ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपने स्वयं के पहचान वाले लिंग को दर्शाने के लिए पासपोर्ट प्राप्त करने से रोका है।

याचिकाकर्ता ने पहले ही बैंकॉक में एक विश्वसनीय डॉक्टर से फेशियल फेमिनाइजेशन सर्जरी करवाई है। वह बैंकॉक में उसी डॉक्टर से अपनी बाकी की लिंग पुनर्मूल्यांकन प्रक्रियाओं, सर्जरी से गुजरना चाहती है। वर्तमान में याचिकाकर्ता के पास पासपोर्ट नहीं है और भविष्य की सर्जरी के लिए कहीं भी यात्रा करने में असमर्थ है।

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