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अवैध निर्माण: केंद्र सरकार और एमसीडी से खफा हाईकोर्ट

Wed, 05 Nov 2014 11:13 PM IST
Updated Wed, 05 Nov 2014 11:13 PM IST
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delhi high court gets angry on illegal construction

दिल्ली हाईकोर्ट ने सैनिक फार्म हाउस में हुए अवैध निर्माण पर केंद्र व दक्षिणी एमसीडी को जमकर फटकार लगाई। अदालत ने कहा जब वहां एक भी ईंट ले जाने पर प्रतिबंध है तो किस प्रकार यह अवैध निर्माण हुआ है।

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अदालत ने केंद्र सरकार व एमसीडी को इस मुद्दे पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने मूल आवंटियों की सुविधाओं पर भी जवाब मांगा है।

न्यायमूर्ति बीडी अहमद व न्यायमूर्ति सिद्घार्थ मृदुल की खंडपीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि जिन संपत्तियों को तोड़ा नहीं जा सकता क्या उन्हें नियमित किया जा सकता है या नहीं? इतना ही नहीं यदि नियमित किया जा सकता है तो उन पर भारी जुर्माना किया जाए ताकि भविष्य में कोई अन्य अवैध निर्माण न करें।

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भारी तादाद में अवैध निर्माण

delhi high court gets angry on illegal construction

खंडपीठ ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि अवैध निर्माण का पता करने के लिए गठित कमेटी को किस प्रकार केवल वर्ष 2012 के बाद हुए अवैध निर्माण की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया। वर्ष 2001 में पहली बार यहां अवैध निर्माण पर रोक लगाई गई थी।

इसके बाद वर्ष 2007 में नया एक्ट आया था। पेश साक्ष्यों व फोटो से वर्ष 2010 व 2014 के रिकॉर्ड में अवैध निर्माण में भारी अंतर नजर आ रहा है। स्पष्ट है कि इस अवधि में भी भारी तादाद में अवैध निर्माण हुआ।

कमेटी ने कहा कि कुल 152 संपत्तियों की जांच की गई और उनमें से 24 को टारगेट किया गया। एमसीडी ने 15 को तोड़ दिया व शेष नौ संपत्ति मालिकों को नोटिस जारी किया गया है।

इस दौरान मूल आवंटियों ने आवेदन दायर कर कहा कि अवैध निर्माण के कारण उन लोगों को भी सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं और उनके निर्माण को भी अवैध निर्माण माना जा रहा है। अत: सरकार को उनको सभी सुविधाएं प्रदान करने का निर्देश दिया जाए।

जीटीबी व यूसीएमएस के मुद्दे पर सरकार को नोटिस

delhi high court gets angry on illegal construction

हाईकोर्ट ने जीटीबी अस्पताल पर दिल्ली सरकार व दिल्ली विश्वविद्यालय के दोहरे नियंत्रण के कारण प्रबंधन की बदतर हालत व कामकाज की खराब स्थिति पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने यह निर्देश इस मुद्दे पर दायर याचिका के मद्देनजर जारी किया है।

मुख्य न्यायमूर्ति जी. रोहिणी की अगुवाई वाली खंडपीठ ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय व दिल्ली विश्वविद्यालय को नोटिस जारी कर 19 नवंबर तक जवाब मांगा है। जीटीबी अस्पताल व यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस (यूसीएमएम) को एक विभाग के नियंत्रण लाने के लिये याचिका दायर की गई है।

अधिवक्ता आरके तरुण ने याचिका दायर केंद्र सरकार के 2005 के उस आदेश को जारी करवाने की मांग की है। इस आदेश में केंद्र सरकार ने दिल्ली सरकार को यूसीएमएस का नियंत्रण प्राप्त करने के लिये मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास प्रस्ताव भेजने के लिये कहा था।

याचिका में कहा गया है कि अगर जीटीबी व यूसीएसएम का प्रबंधन दिल्ली सरकार को मिलता है तो उसे भी मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज व संबंधित अस्पतालों की तरह चलाने में मदद मिलेगी। जीटीबी व यूसीएमएस में प्रबंधन की खराब हालत पर चिंता जाहिर करते हुये कहा गया है कि दो-दो अधिकारियों से विरोधाभासी आदेश मिलने, दो तरह के कर्मचारी होने, पैरा मेडिकल व कर्मचारियों की भर्ती दो विभागों से होने के कारण प्रबंधन में समस्या का सामना करना पड़ता है।

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लिट्टे पर बैन को लेकर फैसला सुरक्षित

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प्रतिबंधित आतंकी संगठन लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) पर बैन जारी रखा जाए या नहीं इस मुद्दे पर हाईकोर्ट द्वारा गठित पंचाट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

न्यायमूर्ति जीपी मित्तल ने केंद्र सरकार, तमिलनाडु सरकार व अन्य पक्षों के तर्क सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।  केंद्र सरकार व तमिलनाडु सरकार के अधिवक्ता ने तर्क रखा कि पेश साक्ष्यों व दस्तावेजों से स्पष्ट है कि लिट्टे हिंसक, विघटनकारी व गैरकानूनी गतिविधियों में अभी भी लिप्त है। यह गतिविधियां भारत की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता के लिए हानिकारक है।

उन्होंने कहा कि श्रीलंका में सक्रिय लिट्टे की गतिविधियों पर भारत में 1992 में प्रतिबंध लगाया गया था। केंद्र व तमिलनाडु सरकार ने कहा कि अंतिम बार मई 2012 में लिट्टे पर प्रतिबंध बढ़ाया गया था और इस अवधि में भी लिट्टे की तमलिनाडू में गतिविधियां जारी हैं। ऐसे में लिट्टे पर अगले पांच वर्ष के लिए प्रतिंबध की अवधि बढ़ाई जाए।

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