कारगिल में शहीद हुआ था पति, 16 साल से न्याय के इंतजार में जवान की विधवा
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16 साल पहले अपने पति रघुवीर को देश के लिए कुर्बान करने वाली सोतई गांव निवासी मेमवती अब न्याय की आस में अपनी बची हुई जिंदगी काट रही है। ये उस जवान की विधवा है, जिसने देश की रक्षा के लिए कारगिल में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे।
महज 35 साल की उम्र में जान गंवाने वाले इस शहीद की विधवा को अपने ही देश में न्याय नहीं मिल पा रहा है। राज्य मंत्रिमंडल की घोषणा के पांच माह बाद भी प्लॉट तो दूर, बल्कि किसी अधिकारी या फिर जनप्रतिनिधि ने शहीद के परिवार की सुध लेने की भी जरूरत नहीं समझी।
भले ही 16 साल के लंबे इंतजार के बाद आज शहीद परिवार आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो गया है, लेकिन वर्ष 2000 में परिवार एक-एक पैसे का मोहताज रहा। एक बीघा जमीन पर फसल बोकर विधवा मेमवती ने अपने बेटे नरेश और बेटी गुड्डी की परवरिश की और उन्हें पढ़ाया-लिखाया।
कौन थे रघुवीर सिंह
दर्जनों आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने वाले रघुवीर सिंह 15 मार्च, 2000 में शहीद हुए। राजकीय सम्मान के साथ शहीद का अंतिम संस्कार हुआ था, लेकिन इसके बाद भी प्रशासन ने शहीद परिवार की सुध नहीं ली।
हालांकि भारतीय सेना शहीद रघुवीर की शहादत को कभी भुला नहीं पाई। आज भी साल में दो बार बड़े अधिकारी गांव आकर शहीद परिवार से मिलते हैं।
अब उम्मीद धूमिल हो रही है
मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद एक उम्मीद जगी थी, लेकिन वह भी अब धूमिल हो रही है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। कितनी बार सरपंच से लेकर डीडीपीओ और विधायक तक से गुहार लगाई। सब व्यर्थ, भ्रष्ट सिस्टम के सामने सब फेल है।
-मेमवती, कारगिल शहीद रघुवीर की पत्नी
मुझे इसकी जानकारी नहीं है। शहीद परिवार की तरफ से प्लॉट के सिलसिले में आज तक मुझसे कोई आकर नहीं मिला है। मेरी तरफ से जो मदद हो सकेगी, वो मैं करूंगी।
-सीमा त्रिखा, मुख्य संसदीय सचिव हरियाणा