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Delhi: पिता की याचिका पर स्कूल को कोर्ट का निर्देश, नाम दर्शाने से पैतृक स्थिति खत्म नहीं होती: करें सुधार

Tue, 06 Feb 2024 08:49 AM IST
अनुज कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Tue, 06 Feb 2024 08:49 AM IST
सार

विवाह विच्छेद के बावजूद स्कूल रिकॉर्ड में पिता के अधिकार को बरकरार रखा। उच्च न्यायालय ने कहा कि नाम दर्शाने से पैतृक स्थिति खत्म नहीं होती है। स्कूल को दो सप्ताह के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है।

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court directed school to disclose names of both parents and take corrective steps in two weeks
दिल्ली उच्च न्यायालय - फोटो : Social Media

विस्तार

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विवाह विच्छेद से माता और पिता के उनके वार्ड के स्कूल रिकॉर्ड में अपना नाम दर्शाने की पैतृक स्थिति खत्म नहीं होती। अदालत ने कहा, महिला को बच्चे की मां के रूप में पहचाने जाने का अधिकार है, लेकिन यह उसे स्कूल के दस्तावेज में अपना नाम दर्ज कराने के पिता के अधिकार से इन्कार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्कूल को माता-पिता दोनों के नाम दर्शाने और दो सप्ताह के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है।

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न्यायमूर्ति सी हरिशंकर ने यह निर्देश बच्चें के पिता की याचिका स्वीकार करते हुए दिया। बच्चे के पिता के रूप में पहचाने जाने के अधिकार का दावा करते हुए स्कूल को रिकॉर्ड सही करने का निर्देश देने की मांग की थी। उन्होंने कहा, तलाक के बाद उनकी पूर्व पत्नी ने स्कूल में बच्चे के नाम से उनका का नाम हटाकर दूसरे पति का नाम लिखवा दिया है। कुछ वैवाहिक विवादों के बावजूद जून 2015 में तलाक की डिक्री द्वारा उनकी शादी को रद्द कर दिया गया। अदालत ने कहा कि पिता की माता-पिता की स्थिति कायम है।
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अविवाहित महिला के गर्भपात की याचिका खारिज
उच्च न्यायालय ने सोमवार को 20 वर्षीय अविवाहित महिला को 28 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि भ्रूण सामान्य होने पर भ्रूणहत्या नैतिक या कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि महिला की याचिका गर्भावस्था के चिकित्सीय समापन के लिए कानून और नियमों के चार कोनों के अंतर्गत नहीं आती है। इसलिए अदालत भ्रूणहत्या के याचिकाकर्ता की प्रार्थना को स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं है। 
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न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यदि महिला प्रसव के बाद नवजात को गोद देने की इच्छुक है, तो केंद्र यह सुनिश्चित करेगा कि प्रक्रिया जल्द से जल्द और सुचारू तरीके से हो। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले से ही एक स्वस्थ और व्यवहार्य भ्रूण के साथ सात महीने की गर्भवती है। याचिकाकर्ता द्वारा समय से पहले गर्भावस्था समाप्त करने और बच्चे की डिलीवरी के लिए एम्स को निर्देश देने की मांग की गई प्रार्थना को इस अदालत द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

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