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कांग्रेस का टिकट पाने के लिए 'ये' करना होगा

Wed, 26 Nov 2014 08:25 AM IST
Updated Wed, 26 Nov 2014 08:25 AM IST
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Congress will decide the standard of ticket.

कांग्रेस दिल्ली विधानसभा चुनाव में हर सीट पर जीत का एंगल ढूंढ रही है। 2013 के चुनाव में दस हजार के अधिक मार्जिन से हारे, तीसरे या चौथे नंबर पर रहे, जमानत जब्त करवाए प्रत्याशियों को लेकर कांग्रेस प्रयोग करने की तैयारी कर रही है।

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हालांकि इस फार्मूले को पार्टी पूरी तरह लागू करती है तो विधानसभा के दो पूर्व अध्यक्ष व तीन पूर्व मंत्रियों का टिकट कटना तय है। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में करारी हार के साथ ही कांग्रेस के 38 प्रत्याशियों को 10 हजार से कम वोट मिले। मुंडका, तुगलकाबाद और पालम में कांग्रेस चौथे नंबर पर रही।
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इतना ही नहीं 17 विस में तो कांग्रेस को 20 हजार से भी ज्यादा मतों से हार का मुंह देखना पड़ा था। नजफगढ़ सीट पर तो कांग्रेस को सिर्फ 7.39 फीसदी वोट मिले। रिठाला व किराड़ी में हार का अंतर 50 हजार से ऊपर था।
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कांग्रेस के लिए डेढ़ दर्जन सीट पर लड़ाई मुश्किल

Congress will decide the standard of ticket.

कांग्रेस नेता इसका विश्लेषण भी कर रहे हैं कि संबंधित सीटों पर हार का सिलसिला निरंतर चल रहा है या फिर पहली बार उलटफेर हुआ है। सूत्र बताते हैं कि इन सीटों को विशेष श्रेणी में रखकर पार्टी प्रयोग करना चाहती है।

बड़े स्तर पर इस संबंध में चर्चा भी हो चुकी है। हालांकि सूत्र यह भी बता रहे हैं कि तीसरे नंबर पर रहने के बावजूद 25 फीसदी से अधिक वोट लेने वाले प्रत्याशियों को परखा जा सकता है।

विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि बीस हजार से बड़े अंतर से हारने वाली 17 सीट में से दस सीट पर 2008 चुनाव में भी कांग्रेस दस हजार से 28 हजार तक वोट से हारी थी। सिर्फ पांच सीटें कांग्रेस इनमें से जीती थी। एक सीट पर 800 वोट से जीती थी, जबकि एक पर 600 वोट से हार हुई थी।

यह बात भी साफ हुई कि बड़े अंतर से हारने वाली 17 में से 13 विस सीट पर पहली बार पार्टी चुनाव लड़ी। पिछले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों की जनकपुरी, पालम, करावल नगर, शालीमार बाग, किराड़ी, रिठाला, मुंडका, गोकलपुरी, तुगलकाबाद, रोहिणी और नजफगढ़ में जमानत जब्त हुई थी। इन सभी सीटों पर कांग्रेस की 2008 में भी हार हुई थी।

कांग्रेस को झेलना पड़ेगा शीला संकट

Congress will decide the standard of ticket.

चुनाव समिति में नाम शामिल होने पर पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित नाराज हो गई हैं। उन्होंने साफ किया है कि न तो वह दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ेंगी और न ही चुनाव से जुड़ी किसी कमेटी का हिस्सा बनेंगी। शीला दीक्षित की इस नाराजगी से कांग्रेस में नया संकट पैदा हो गया है। अभी कैंपेन कमेटी की अगुवाई शीला दीक्षित या अजय माकन को देने की चर्चा जोरों पर थी, लेकिन ताजा मामले में कांग्रेस नेताओं के बीच मनमुटाव के अंकुर देखे जा रहे हैं।

अमर उजाला से बातचीत में पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा है कि मैंने पहले ही कहा है कि मैं न तो चुनाव लड़ूंगी और न ही चुनाव से जुड़ी किसी समिति का हिस्सा बनूंगी। मुझे कमेटी में होने की जानकारी अखबारों से मिली। मुझसे पहले किसी ने बात तक नहीं की। हालांकि समिति से इस्तीफा देंगी या नहीं यह अभी साफ नहीं है। भविष्य में कैंपेन कमेटी घोषित होनी है, इसे लेकर शीला ने कहा, ‘मैं उसका हिस्सा भी नहीं बनना चाहती। बाकी पार्टी जो काम मुझसे लेना चाहती है, मैं सेवा दूंगी।’

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि जिस चुनाव समिति में शीला दीक्षित को बतौर सदस्य शामिल किया गया है, उसकी अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष के नाते अरविंदर सिंह को सौंपी गई है। इससे पहले अरविंदर शीला की कैबिनेट में मंत्री थे। वहीं इस समिति में बतौर सदस्य आठ पूर्व विधायक और एक पूर्व जिलाध्यक्ष भी शामिल हैं, जबकि शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित को जगह किसी भी समिति में नहीं दी गई है।

सूत्र बताते हैं कि चुनाव समिति, घोषणा पत्र समिति, प्रचार समिति और अनुशासनात्मक समिति की सूची जारी करने से पहले एक बैठक कांग्रेस के बड़े नेताओं की हुई थी। उसमें आपसी मनमुटाव समाप्त करके दिल्ली में मोर्चा संभालने की बात कही गई थी। ऐसे में कमेटी में नाम आने पर नाराजगी को आपसी मनमुटाव से जोड़कर देखा जा सकता है।

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