सुशील कुमार के गांव में मनी दिवाली
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ओलंपिक में दो बार पदक जीत चुके पहलवान सुशील कुमार के कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने पर इतिहास गांव बापरौला में दीवाली जैसा माहौल हो गया।
इसी तरह उनके प्रशिक्षण स्थल छत्रसाल स्टेडियम में भी जश्न का माहौल रहा। दोनों जगह सुशील की जीत के बाद ढोल बजे और पटाखे छोड़े गए। इस दौरान ग्रामीणों और पहलवानों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाई और जमकर डांस किया।
सुशील की जीत के बाद मंगलवार की रात बापरौला गांव और छत्रसाल स्टेडियम का नजारा किसी उत्सव जैसा था। ग्रामीण और पहलवान जमकर नाचे। दोनों जगह यह सिलसिला देर रात तक जारी रहा। जैसे-जैसे सुशील एक के बाद एक बाजी जीतने लगे, उनके गांव के साथ-साथ आसपास के ग्रामीणों के आने का सिलसिला शुरू हो गया।
स्टेडियम में मना साथी की जीत का जश्न
पहली बार 74 किलोग्राम की स्पर्धा में खेल रहे सुशील कुमार के फाइनल में पाक पहलवान को चित्त करते ही बापरौला और छत्रसाल स्टेडियम में जश्न शुरू हो गया। सुशील के पारिवारिक सदस्य, रिश्तेदार और उनके साथी खुशी से झूम उठे।
उनके बीच एक-दूसरे को बधाइयां देने का सिलसिला शुरू हो गया। सुशील के घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया और कुछ ही देर में घर के बाहर ढोल की थाप पर युवक और महिलाएं नाचने लगीं। इसी बीच युवकों ने पटाखेबाजी शुरू कर दी और एक-दूसरे का मुंह मीठा करने की होड़ शुरू हो गई।
बापरौला की तरह ही छत्रसाल स्टेडियम में भी जश्न शुरू हो गया। सुशील के साथी पहलवान यहां ढोल की थाप पर अपने वरिष्ठ साथी की जीत पर घंटों नाचे। वे इस कदर खुश थे कि जैसे उन्होंने ही पदक जीत लिया। वह अपने दूसरे साथी अमित कुमार की जीत से भी काफी उत्साहित थे।
छुपकर कुश्ती लड़ना शुरू किया था
सुशील कुमार की जीत पर उनके परिजन फूले नहीं समा रहे हैं, जबकि सुशील ने अपने परिजनों से छुपकर कुश्ती लड़ना शुरू किया था। कुश्ती में उनके पिता को कामयाबी नहीं मिलने पर वे नहीं चाहते थे कि बेटा कुश्ती लड़े।
सुशील ने छठी कक्षा में पढ़ने के दौरान 30 किलोग्राम वर्ग की स्पर्धा में हिस्सा लिया था और जोनल स्तर पर प्रथम रहे। उनकी इस सफलता के बाद परिजनों को कुश्ती लड़ने के बारे में पता चला था।
इसी बीच सुशील छत्रसाल स्टेडियम में राज्य स्तर की स्पर्धा में हिस्सा लेने पहुंचे। वहां उसका हुनर देखकर महाबलि सतपाल ने अपनी शरण में ले लिया। इसके बाद सुशील ने मुड़कर नहीं देखा और उसने एक के बाद कामयाबी के झंडे गाड़ते चले गए।