धरना प्रदर्शन से लेकर कोर्ट केस तक, अपने एक फ्लैट के लिए सालों से लड़ रहे जेपी के खरीदार
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जीवन भर की कमाई का बड़ा हिस्सा जमा कर के नोएडा जैसे बड़े शहर में अपने नाम से एक फ्लैट खरीदने का सपना देखने वाले हजारों लोगों ने लगातार पांच सालों तक अपने हक की लड़ाई लड़ी, लेकिन अंत में हार कर शांत बैठ गए। ये वो लोग हैं जिन्होंने जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (जेआईएल) के विश टाऊन में साल 2008-09 के बीच फ्लैट बुक किए थे। उस समय बात थी कि ये फ्लैट्स साल 2011-12 तक बन के तैयार हो जाएंगे, लेकिन 5000 फ्लैटों के बाद निर्माण का काम धीरे-धीरे रुक गया।
2016 में जब खरीदारों के सब्र का बांध टूटने लगा तो उन्होंने कानून का सहारा लिया। कई लोगों ने धरना प्रदर्शन और रोड शो कर जेआईएल का विरोध किया, तो कई खरीदारों ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग जाकर शिकायत की और फ्लैट मिलने में हो रही देरी के कारण मुआवजे की मांग की।
खरीदार बताते हैं कि फ्लैटों की ईएमआई के खर्च के अलावा वकील और कानूनी पचड़ों के पीछे भी उन्होंने करोड़ों रूपए बहाए हैं। वे कहते हैं कि अब तो जेपी से उनका भरोसा ही उठ गया है। इतने सालों के संघर्ष के बाद वे वहीं लौट आए हैं, जहां से उन्होंने लड़ाई शुरू की थी।
खरीदारों की असली लड़ाई तब शुरू हुई जब आईडीबीआई बैंक ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्युनल(एनसीएलटी) में जेआईएल के दिवालियेपन के लिए कार्रवाई शुरू की। यह खबर मिलते ही खरीदार घबरा गए और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जेआईएल से धोखा खाने वालों में चित्रा शर्मा पहली खरीदार थीं जिन्होंने याचिका दायर की थी।
इसके बाद एनसीएलटी ने मामले में दिवाला समाधान पेशेवर (आईआरपी) का गठन किया। आईआरपी के आने के बाद खरीदारों में उम्मीद जगी कि उनके साथ न्याय होगा, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। लंबे समय से चल रही इस कानूनी लड़ाई के बाद अब खरीदारों का कहना है कि उनकी समस्या पर किसी का ध्यान नहीं है। बैंक भी अपने पैसे की वसूली कर रहे हैं, इसलिए अब वे दोबारा सड़क पर उतर कर सरकार के सामने अपनी परेशानी रखेंगे और इसका समाधान निकालने की मांग करेंगे।