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भारत की दूषित हवा को लेकर बड़ा खुलासा, वैज्ञानिकों का चौंकाने वाला दावा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 13 Aug 2018 11:25 PM IST
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फाइल फोटो
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प्रदूषित हवा और गैस चैंबर दिल्ली। इनके बारे में तो अक्सर आपने सुना और देखा होगा। अब इसी जहरीली हवा पर विदेशी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि अगर भारत में हवा सुधरती है तो यहां के लोगों का जीवन चार साल और बढ़ सकता है।
हालांकि इस नए अध्ययन में यह भी कहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवा को लेकर तय मानकों को पूरा नहीं किया जा रहा है। अगर भारत में इसमें सफलता हासिल करता है तो लोगों का जीवन काफी बेहतर हो सकता है।
इस अध्ययन पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल का कहना है कि दिल्ली, मुंबई जैसे मेट्रो शहरों के अलावा अब कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों में भी शुद्ध हवा मिलना मुश्किल होता जा रहा है।
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हवा की वजह से लोगों को फेफड़ों में कैंसर तक की परेशानी हो रही है। वहीं मैक्स अस्पताल के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विवेक कुमार ने बताया कि हवा में प्रदूषित कणों की संख्या ज्यादा होने से सांस के जरिए ये रक्त में घुलते हैं और कार्डियोवास्कुलर जैसी बीमारियों के कारण बनते हैं। दूषित हवा की वजह से शहरों में रहने वाले युवा सबसे ज्यादा कमजोर और बीमार दिल वाले हैं।
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हालांकि इस नए अध्ययन में यह भी कहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवा को लेकर तय मानकों को पूरा नहीं किया जा रहा है। अगर भारत में इसमें सफलता हासिल करता है तो लोगों का जीवन काफी बेहतर हो सकता है।
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इस अध्ययन पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल का कहना है कि दिल्ली, मुंबई जैसे मेट्रो शहरों के अलावा अब कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों में भी शुद्ध हवा मिलना मुश्किल होता जा रहा है।
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हवा की वजह से लोगों को फेफड़ों में कैंसर तक की परेशानी हो रही है। वहीं मैक्स अस्पताल के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विवेक कुमार ने बताया कि हवा में प्रदूषित कणों की संख्या ज्यादा होने से सांस के जरिए ये रक्त में घुलते हैं और कार्डियोवास्कुलर जैसी बीमारियों के कारण बनते हैं। दूषित हवा की वजह से शहरों में रहने वाले युवा सबसे ज्यादा कमजोर और बीमार दिल वाले हैं।
क्या कहता है अध्ययन
भारत की वायु गुणवत्ता में सुधार में मदद के लिए शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं और हार्वर्ड केनेडी स्कूल ने ए रोडमैप टूवर्ड्स इंडियाज एयर शीर्षक से एक नई रिपोर्ट तैयार की है। इसके तहत 5 प्रमुख साक्ष्य-आधारित नीतिगत सिफारिशें भी की हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 66 करोड़ से अधिक भारतीय ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जो सूक्ष्म कण पदार्थ (पीएम 2.5) के सुरक्षित संपर्क के लिए माने जाने वाले देश के मानक से अधिक है।
रफीक हरीरी विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और हार्वर्ड केनेडी स्कूल में एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन (ईपीओडी) में सह निदेशक रोहिणी पांडे के हवाले से कहा है कि प्रदूषण की आर्थिक लागत बहुत अधिक है और इसका कोई आसान समाधान नहीं है। फिलहाल भारत में हो रहे नवाचारों के प्रयोग के मद्देनजर आशांवित हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 66 करोड़ से अधिक भारतीय ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जो सूक्ष्म कण पदार्थ (पीएम 2.5) के सुरक्षित संपर्क के लिए माने जाने वाले देश के मानक से अधिक है।
रफीक हरीरी विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और हार्वर्ड केनेडी स्कूल में एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन (ईपीओडी) में सह निदेशक रोहिणी पांडे के हवाले से कहा है कि प्रदूषण की आर्थिक लागत बहुत अधिक है और इसका कोई आसान समाधान नहीं है। फिलहाल भारत में हो रहे नवाचारों के प्रयोग के मद्देनजर आशांवित हैं।
क्या है विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के गुणवत्ता मानकों के तहत, सूक्ष्म कण पदार्थ (पीएम 2.5) के लिए 10 माइक्रोग्राम/घन मीटर वार्षिक माध्य (मीन) और 25 माइक्रोग्राम/घन मीटर 24 घंटे का माध्य होना चाहिए जबकि मोटे कण पदार्थ (पीएम 10) के लिए 20 माइक्रोग्राम/घन मीटर वार्षिक माध्य और 50 माइक्रोग्राम/घन मी 24 घंटे का माध्य होना चाहिए।